- 550 मेगावाट उत्पादन क्षमता प्रभावित, अक्टूबर से पहले सितंबर में ही भारत से बिजली आयात की तैयारी; भारत में अतिरिक्त बिजली की मांग पर प्रक्रिया शुरू
भारत 19
नई दिल्ली। नेपाल में आई विनाशकारी बाढ़ ने अब देश के बिजली तंत्र का गणित भी बदल दिया है। बाढ़ और भूस्खलन से जलविद्युत परियोजनाओं और बिजली ढांचे को भारी नुकसान पहुंचने के बाद नेपाल की घरेलू बिजली उत्पादन क्षमता करीब 550 मेगावाट घट गई है। बिजली की कमी से निपटने के लिए नेपाल ने सामान्य समय से करीब एक महीने पहले, सितंबर से ही भारत से अतिरिक्त बिजली आयात करने की मंजूरी मांगी है। भारत में नेपाल के अनुरोध पर मौजूदा बिजली व्यापार व्यवस्था के तहत प्रक्रिया आगे बढ़ाई जा रही है।
नेपाल आम तौर पर सर्दियों में, यानी अक्टूबर के आसपास, भारत से बिजली आयात शुरू करता है। गर्मियों और मानसून में नदियों का जलस्तर बढ़ने से जलविद्युत उत्पादन बढ़ जाता है और वह अपनी जरूरत से अधिक बिजली भारत को बेचता है। इस बार बाढ़ ने यही समीकरण उलट दिया है। जिस मौसम में नेपाल सामान्य तौर पर भारत को अतिरिक्त बिजली बेचता है, उसी समय वह अपनी जरूरत पूरी करने के लिए भारत से बिजली मांगने की स्थिति में पहुंच गया है।
13 से ज्यादा बिजली परियोजनाएं बाढ़ की चपेट में
26 अगस्त को त्रिशूली और ल्हेंडे खोला नदी बेसिन में आई फ्लैश फ्लड ने नेपाल के बिजली ढांचे को बड़ा नुकसान पहुंचाया। नेपाल के ऊर्जा क्षेत्र के अधिकारियों के मुताबिक कई जलविद्युत संयंत्र, सब-स्टेशन और ट्रांसमिशन ढांचे प्रभावित हुए हैं। नेपाल की बिजली व्यवस्था को हुए नुकसान के शुरुआती आकलन में एक दर्जन से अधिक जलविद्युत परियोजनाओं के प्रभावित होने की बात सामने आई है। इनमें रासुवागढ़ी, चिलिमे, त्रिशूली, देविघाट और सान्जेन क्षेत्र की परियोजनाएं शामिल हैं। कुछ परियोजनाओं को सीधे नुकसान पहुंचा है, जबकि कई संयंत्रों से पैदा होने वाली बिजली को ट्रांसमिशन ढांचे के क्षतिग्रस्त होने के कारण राष्ट्रीय ग्रिड से अलग करना पड़ा है। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक 14 मेगावाट की देविघाट जलविद्युत परियोजना, जो भारत को बिजली आपूर्ति करने वाले संयंत्रों में शामिल है, भी बाढ़ से प्रभावित हुई है। इसके अलावा चिलिमे और त्रिशूली जैसे संयंत्रों पर भी असर पड़ा है।
बिजली उत्पादन घटा तो भारत से पहले मांगी मदद
बाढ़ से हुए नुकसान का सीधा असर नेपाल की बिजली उपलब्धता पर पड़ा है। इसी वजह से नेपाल ने भारत से सामान्य समय से पहले बिजली आयात की अनुमति मांगी है। अधिकारियों के मुताबिक नेपाल आमतौर पर अक्टूबर से भारत से बिजली लेना शुरू करता है, लेकिन इस बार सितंबर से ही अतिरिक्त बिजली की जरूरत पड़ सकती है। भारतीय अधिकारी नेपाल की मांग को मौजूदा क्रॉस-बॉर्डर बिजली व्यापार व्यवस्था के तहत पूरा करने के विकल्पों पर काम कर रहे हैं। इसमें भारतीय पावर एक्सचेंज के डे-अहेड मार्केट और रियल-टाइम मार्केट के जरिये बिजली उपलब्ध कराने की व्यवस्था भी शामिल है।
भारत को बिजली निर्यात भी हुआ कम
नेपाल के बिजली संकट का असर भारत को होने वाले उसके बिजली निर्यात पर भी पड़ा है। बाढ़ से पहले नेपाल से भारत को बिजली का प्रवाह पीक समय में करीब 950 से 1000 मेगावाट तक पहुंच रहा था। अब यह प्रवाह लगभग 400 मेगावाट कम हो गया है। 26 अगस्त को बाढ़ आने के दिन भी ग्रिड इंडिया के आंकड़ों के मुताबिक भारत ने नेपाल से दिन के पीक समय में 963.4 मेगावाट बिजली आयात की थी। इसके बाद नेपाल की कई परियोजनाओं और ट्रांसमिशन ढांचे को नुकसान पहुंचने से भारत की ओर बिजली का प्रवाह घट गया। हालांकि नेपाल से बिजली आयात घटने का भारत की घरेलू बिजली व्यवस्था पर बड़ा असर पड़ने की संभावना नहीं है। भारतीय अधिकारियों के मुताबिक देश के विशाल राष्ट्रीय ग्रिड में पर्याप्त उत्पादन और रिजर्व क्षमता मौजूद है। करीब 400 मेगावाट की अस्थायी कमी को भारतीय ग्रिड बिना किसी बड़े व्यवधान के संभाल सकता है।
1000 मेगावाट की लाइन अभी भी चालू
नेपाल को अतिरिक्त बिजली पहुंचाने में भारत-नेपाल के बीच मौजूद सीमा-पार ट्रांसमिशन ढांचा महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। 400 केवी ढलकेबर-मुजफ्फरपुर ट्रांसमिशन लिंक करीब 1000 मेगावाट की ट्रांसफर क्षमता वाला प्रमुख गलियारा है और फिलहाल चालू है। भारत और नेपाल ने हाल के वर्षों में बिजली व्यापार और ट्रांसमिशन नेटवर्क को विस्तार देने पर भी काम किया है। जुलाई में दोनों देशों ने ढलकेबर-मुजफ्फरपुर और ढलकेबर-सितामढ़ी 400 केवी लाइनों के जरिये बिजली के आयात-निर्यात की संयुक्त क्षमता बढ़ाने पर सहमति जताई थी। इससे भविष्य में दोनों देशों के बीच बिजली कारोबार बढ़ाने का आधार और मजबूत हुआ है।
हाइड्रो पावर क्षेत्र को भारी नुकसान की आशंका
नेपाल की बिजली समस्या सिर्फ तत्काल बिजली की कमी तक सीमित नहीं है। बाढ़ ने देश के हाइड्रोपावर क्षेत्र के सामने पुनर्निर्माण की बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है। नेपाल विद्युत प्राधिकरण के शुरुआती आकलन के मुताबिक जलविद्युत परियोजनाओं और ट्रांसमिशन ढांचे को हुआ नुकसान सैकड़ों अरब नेपाली रुपये तक पहुंच सकता है। रसुवागढी हाइड्रो पावर परियोजना के पूरी तरह बह जाने और चिलिमे परियोजना के मलबे में दबने की जानकारी सामने आई है। नेपाल के बिजली अधिकारियों का कहना है कि अभी प्राथमिकता बचाव अभियान, लापता लोगों की तलाश और बिजली आपूर्ति बहाल करने की है। विस्तृत नुकसान का आकलन होने के बाद ही पुनर्निर्माण की वास्तविक लागत और समय सीमा स्पष्ट होगी।
भारत के लिए क्यों अहम है नेपाल का बिजली संकट
नेपाल और भारत के बीच बिजली कारोबार पिछले कुछ वर्षों में तेजी से बढ़ा है। नेपाल मानसून के दौरान अपनी अतिरिक्त जलविद्युत भारत को बेचता है, जबकि सर्दियों में उत्पादन घटने पर भारत से बिजली खरीदता है। भारत के लिए नेपाल की जलविद्युत क्षेत्रीय ऊर्जा सहयोग और स्वच्छ ऊर्जा आपूर्ति की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। मौजूदा संकट ने दोनों देशों की ऊर्जा निर्भरता का दूसरा पहलू सामने ला दिया है। बाढ़ से नेपाल की बिजली परियोजनाएं प्रभावित हुईं तो भारत को होने वाला बिजली निर्यात घट गया और अब वही नेपाल अपनी जरूरत पूरी करने के लिए भारत से अतिरिक्त बिजली मांग रहा है।
भारत के लिए फिलहाल यह स्थिति प्रबंधनीय है, लेकिन नेपाल के लिए चुनौती लंबी हो सकती है। क्षतिग्रस्त बिजली परियोजनाओं, ट्रांसमिशन लाइनों और दूसरे ऊर्जा ढांचे को दोबारा खड़ा करने में समय और बड़ा निवेश लगेगा। आने वाले दिनों में नेपाल की बिजली आपूर्ति कितनी जल्दी सामान्य होती है, यह बाढ़ से प्रभावित परियोजनाओं की बहाली और भारत से मिलने वाली अतिरिक्त बिजली पर काफी हद तक निर्भर करेगा।


