- CSA कानपुर में रबी दलहन अनुसंधान की 31वीं वार्षिक बैठक, जलवायु सहनशील और कम लागत तकनीक विकसित कर किसानों तक पहुंचाने पर जोर, देशभर के करीब 100 वैज्ञानिक जुटे
भारत 19
कानपुर। देश में दालों की बढ़ती मांग के बीच दलहन उत्पादन बढ़ाने के लिए वैज्ञानिक अब उत्पादन में बाधा डालने वाले कारकों की पहचान कर उन्हें दूर करने पर काम करेंगे। इसके लिए अनुसंधान की चुनौतियों की प्राथमिकता तय कर लक्ष्य आधारित कार्ययोजना बनाई जाएगी। जलवायु अनुकूल, तनाव सहनशील और कम लागत वाली तकनीकों को विकसित कर किसानों के खेतों तक पहुंचाने पर भी जोर रहेगा।
चंद्रशेखर आजाद कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (सीएसए), कानपुर में अखिल भारतीय समन्वित रबी दलहन अनुसंधान परियोजना की 31वीं वार्षिक समूह बैठक में कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग (डेयर) के सचिव एवं भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के महानिदेशक डॉ. एमएल जाट ने यह बात कही। उन्होंने कहा कि दलहन उत्पादन में आ रही बाधाओं को दूर करना अनुसंधान की प्राथमिकता होनी चाहिए। किसान के लिए केवल उत्पादन बढ़ाना पर्याप्त नहीं है, उत्पादन के साथ लाभप्रदता को भी प्राथमिकता देनी होगी।
दो दिवसीय बैठक में देशभर के करीब 100 दलहन वैज्ञानिक हिस्सा ले रहे हैं। डॉ. जाट ने कहा कि उत्पादकता में अनिश्चितता का सीधा असर बाजार पर पड़ता है। इसलिए नई तकनीकों के विकास में उत्पादन के साथ बाजार की जरूरतों को भी ध्यान में रखना होगा। उन्होंने दलहन के लिए स्पष्ट लक्ष्य तय करने और उत्पादन प्रभावित करने वाले कारकों को दूर करने पर जोर दिया।

बदलते मौसम में टिकाऊ तकनीक पर जोर
डॉ. जाट ने जैविक और अजैविक तनाव से होने वाले नुकसान को कम करने के लिए जलवायु अनुकूल और तनाव सहनशील तकनीकों के विकास की जरूरत बताई। उन्होंने दलहन फसलों में फास्फोरस के संतुलित और समुचित प्रबंधन के साथ पोषक तत्व उपयोग दक्षता बढ़ाने वाली तकनीकों को अपनाने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि प्रयोगशालाओं में विकसित कृषि पद्धतियों का लाभ किसानों तक तभी पहुंचेगा, जब उन्हें बड़े स्तर पर खेतों में अपनाया जाए। आईसीएआर के उप महानिदेशक (फसल विज्ञान) डॉ. डीके यादव ने कहा कि उपलब्ध नवीन प्रजातियों और सफल तकनीकों को दलहन उत्पादन में शामिल कर पैदावार बढ़ाई जा सकती है।
रबी फसलों से आता है 60 फीसदी दलहन उत्पादन
आईसीएआर के सहायक महानिदेशक (तिलहन एवं दलहन) डॉ. एसके झा ने बताया कि देश के कुल दलहन उत्पादन में रबी दलहनी फसलों की करीब 60 प्रतिशत हिस्सेदारी है। दलहनी फसलें मिट्टी में नाइट्रोजन का यौगिकीकरण कर मृदा स्वास्थ्य सुधारने में भी भूमिका निभाती हैं।
किसानों तक तकनीक पहुंचाने पर फोकस
भारतीय दलहन अनुसंधान संस्थान के निदेशक डॉ. जीपी दीक्षित ने बताया कि वैज्ञानिकों और किसानों के बीच तकनीकी दूरी कम करने के लिए प्रथम पंक्ति प्रदर्शनों के जरिए किसानों को नई तकनीकों से जोड़ा जा रहा है। कम लागत वाली तकनीकों, विशेषकर जैविक उर्वरकों, को बढ़ावा दिया जा रहा है। दो दिवसीय बैठक में दलहन उत्पादन में बाधक कारकों, नई प्रजातियों, पोषक तत्व प्रबंधन, जलवायु और तनाव सहनशील तकनीकों तथा कम लागत वाली कृषि पद्धतियों पर चर्चा की जा रही है। अनुसंधान को किसानों की आय और लाभप्रदता से जोड़ने के साथ ‘उपज बाधा टूटे, दलहन उपज बढ़े’ के लक्ष्य पर काम करने पर जोर दिया गया।


