- अयोध्या में कच्चे घर के मलबे में 20 वर्षीय बंदना की मौत के बाद परिवार को पक्का आवास और सरकारी योजनाओं से जोड़ने के निर्देश
भारत 19
लखनऊ। बरसात में कच्चा मकान गिरा और उसके मलबे में दबकर 20 वर्षीय बंदना की मौत हो गई। हादसा अयोध्या के हरिंगटनगंज विकासखंड के निधियावा गांव में हुआ। बंदना की मां कमलेश देवी के पति का पहले ही निधन हो चुका है और अब बेटी को खोने के बाद परिवार पर नया संकट आ गया है। घटना का पता चलने पर उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य के निर्देश पर अधिकारी गांव पहुंचे, परिवार को तत्काल आर्थिक सहायता दी गई और कमलेश देवी को मुख्यमंत्री आवास योजना, विधवा पेंशन, किसान सम्मान निधि समेत पात्रता आधारित दूसरी योजनाओं का लाभ दिलाने की कार्रवाई शुरू की गई।
हादसे ने खड़ी की आवास व्यवस्था की पड़ताल
सरकारी आवास योजनाओं का उद्देश्य आर्थिक रूप से कमजोर और कच्चे या असुरक्षित मकानों में रहने वाले परिवारों को सुरक्षित छत उपलब्ध कराना है। ऐसे में निधियावा की घटना केवल एक प्राकृतिक हादसा नहीं, बल्कि जरूरतमंद परिवारों की पहचान और योजनाओं के जमीनी क्रियान्वयन की पड़ताल का विषय भी बनती है। कमलेश देवी का नाम आवास योजना की पात्रता सूची में था या नहीं, उन्होंने कभी आवास के लिए आवेदन किया था या नहीं और यदि परिवार पात्र था तो उसे अब तक लाभ क्यों नहीं मिला, इन सवालों का जवाब प्रशासनिक रिकॉर्ड से सामने आएगा। यहीं इस घटना की सबसे बड़ी विडंबना भी है। जिस परिवार को हादसे के बाद मुख्यमंत्री आवास योजना से जोड़ने की कार्रवाई हो रही है, उसकी आवासीय जरूरत का आकलन पहले क्यों नहीं हो सका।
अब सिर्फ राहत नहीं, गांव की पड़ताल जरूरी
उपमुख्यमंत्री के हस्तक्षेप के बाद पीड़ित परिवार को सहायता और योजनाओं का लाभ मिलना तत्काल राहत का कदम है। लेकिन निधियावा की घटना के बाद प्रशासन के सामने इससे बड़ा दायित्व भी है। गांव और आसपास के क्षेत्रों में ऐसे परिवारों की पहचान की जरूरत है, जो आज भी कच्चे, कमजोर या जर्जर मकानों में रह रहे हैं। बरसात के मौसम में ऐसे घरों का जोखिम किसी एक परिवार तक सीमित नहीं होता। जरूरत इस बात की है कि बंदना की मौत को केवल एक हादसे के रूप में दर्ज करने के बजाय यह भी देखा जाए कि सरकारी आवास की जरूरत वाले परिवारों की पहचान में कहीं और भी ऐसी खामियां तो नहीं हैं।
एक हादसा, कई सवाल
बंदना की मौत के बाद कमलेश देवी के परिवार तक सरकारी मदद पहुंच गई है। लेकिन निधियावा की यह घटना एक अहम सवाल छोड़ती है— क्या जरूरतमंद तक सरकारी योजना समय पर पहुंच रही है या फिर व्यवस्था को उसकी जरूरत तब दिखाई देती है, जब कोई हादसा उसे खबर बना देता है?

