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कानपुर में एक जैसी बसावट पर KDA के दो नियम

  • चार मीटर सड़क पर निर्माण और मरम्मत की राहत, समान हालात वाले इलाकों में नौ मीटर की बाध्यता

भारत 19
कानपुर। एक ही शहर। लगभग एक जैसी पुरानी बसावट। संकरी गलियां, घनी आबादी और दशकों पुराने मकान। लेकिन कानपुर विकास प्राधिकरण (KDA) के नियम अलग-अलग। शहर के कुछ पुराने इलाकों में चार मीटर चौड़े रास्ते पर मकान निर्माण और जरूरी मरम्मत का रास्ता खुलता है। वहीं लगभग समान परिस्थितियों, संकरी गलियों और घनी आबादी वाले दूसरे इलाकों में नौ मीटर चौड़ी सड़क की बाध्यता सामने आ जाती है। यानी एक जैसी स्थिति के बावजूद कहीं चार मीटर सड़क पर्याप्त है, तो कहीं नौ मीटर की शर्त। नतीजा यह कि दूसरे दायरे में आने वाले इलाकों में नया मकान बनाना मुश्किल हो सकता है और जर्जर पुराने मकान की मरम्मत या पुनर्निर्माण भी नियमों की बाध्यता में फंस सकता है। यही विरोधाभास अब कानपुर के बिल्डिंग बायलॉज पर बड़ी बहस खड़ी कर रहा है।

चार मीटर सड़क पर राहत, नौ मीटर में अटकाव

निर्मित क्षेत्र में चार मीटर चौड़ी सड़क पर एकल आवासीय भवन के नक्शे की मंजूरी का प्रावधान है। यानी निर्धारित दायरे में आने वाले इलाकों में संकरी सड़क के बावजूद निर्माण का रास्ता मिल सकता है। लेकिन निर्मित क्षेत्र की सीमा से बाहर आते ही तस्वीर बदल जाती है। यहां नौ मीटर चौड़ी सड़क की शर्त नए निर्माण और पुनर्निर्माण के सामने बड़ी बाधा बन सकती है। सड़क संकरी है, बसावट पुरानी है, आबादी घनी है। फर्क केवल उस सीमा का है, जिसके बदलते ही चार मीटर की राहत नौ मीटर की बाध्यता में बदल जाती है।

एक जैसी गलियां, पुराने मकान, फिर अलग नियम

चमनगंज, दलेलपुरवा, बजरिया और चुन्नीगंज जैसे इलाके निर्मित क्षेत्र की सीमा में शामिल बताए जाते हैं। यहां चार मीटर चौड़ी सड़क पर नक्शा मंजूरी की व्यवस्था का आधार मिलता है। दूसरी ओर फीलखाना, हटिया, कमला टावर, बंगाली मोहाल, बादशाही नाका, पटकापुर, शिवाला और जनरलगंज जैसे कई पुराने और घनी आबादी वाले इलाके निर्मित क्षेत्र से बाहर बताए जा रहे हैं। इन इलाकों की तस्वीर भी पुराने कानपुर जैसी ही है। संकरी गलियां, दोनों तरफ बने मकान, घनी आबादी और दशकों पुरानी बसावट। लेकिन नियमों का असर बदल जाता है। एक तरफ चार मीटर सड़क निर्माण और मरम्मत की राह खोलती है। दूसरी तरफ लगभग उसी तरह की बसावट नौ मीटर चौड़ी सड़क की बाध्यता में फंस जाती है।

नया मकान दूर, पुराने घर की मरम्मत पर संकट

इस पूरे मामले की सबसे बड़ी चिंता केवल नया मकान बनाना नहीं है। पुराने कानपुर में हजारों मकान ऐसे हैं, जिनकी उम्र कई दशक हो चुकी है। कहीं छत कमजोर पड़ रही है। कहीं दीवारों में दरारें हैं। कहीं पूरे ढांचे को मरम्मत या पुनर्निर्माण की जरूरत पड़ सकती है। ऐसी स्थिति में निर्माण कार्य केवल सुविधा नहीं, बल्कि घर को सुरक्षित रखने की जरूरत बन जाता है। लेकिन नौ मीटर चौड़ी सड़क की शर्त पुराने शहर की कई गलियों के सामने ऐसी बाध्यता है, जिसे जमीन पर पूरा करना बेहद मुश्किल है। घनी बसावट के बीच सड़क चौड़ी करने के लिए दोनों ओर बने मकानों और संपत्तियों पर असर पड़ेगा। ऐसे में पुराने मकान की सुरक्षा और सड़क चौड़ाई की शर्त आमने-सामने खड़ी दिखाई देती है।

निर्मित क्षेत्र की सीमा ने बदल दिया नियम

इस पूरे विवाद की जड़ निर्मित क्षेत्र की वह सीमा है, जो शहर के कुछ हिस्सों को चार मीटर सड़क की व्यवस्था में लाती है और दूसरे पुराने मोहल्लों को नौ मीटर की शर्त के दायरे में पहुंचा देती है। यही सीमा अब विवाद के केंद्र में है। एक तरफ पुराने और घनी आबादी वाले इलाके को चार मीटर सड़क की व्यवस्था मिलती है। दूसरी तरफ लगभग वैसी ही बसावट वाले दूसरे मोहल्ले नौ मीटर सड़क की बाध्यता में आ जाते हैं। नियम का यह अंतर अब केवल तकनीकी मामला नहीं रह गया है। इसका सीधा असर उन परिवारों पर पड़ सकता है, जिनके घर पुरानी और संकरी गलियों में बने हैं।

पुराने कानपुर के सामने नौ मीटर की दीवार

पुराने शहर की ज्यादातर गलियां उस दौर में बसीं, जब आज की तरह सड़क की चौड़ाई और भवन निर्माण के मानक लागू नहीं थे। कई गलियों में आज भी दोपहिया और पैदल आवाजाही तक सीमित है। दोनों तरफ मकान बने हैं और घनी आबादी के बीच सड़क को नौ मीटर चौड़ा करना व्यावहारिक रूप से बेहद कठिन है। ऐसे में नौ मीटर सड़क की शर्त कागज पर नियम हो सकती है, लेकिन जमीन पर उसके अनुपालन की अपनी सीमाएं हैं। इसका असर नए निर्माण के साथ उन पुराने मकानों पर भी पड़ सकता है, जिन्हें भविष्य में पुनर्निर्माण या बड़े स्तर पर मरम्मत की जरूरत होगी।

KDA के सामने नियम नहीं, समाधान की चुनौती

अब मामला केवल नक्शा मंजूरी का नहीं है। मुद्दा उन एक जैसी परिस्थितियों वाले इलाकों का है, जहां सड़क की चौड़ाई, बसावट और आबादी लगभग समान होने के बावजूद नियमों का असर अलग पड़ रहा है। निर्मित क्षेत्र की सीमा तय करने का आधार, चार और नौ मीटर की अलग व्यवस्था और इससे बाहर रह गए पुराने मोहल्लों के लिए संभावित राहत अब चर्चा के केंद्र में है। फीलखाना, हटिया, बंगाली मोहाल, शिवाला और जनरलगंज जैसे इलाकों में पुराने मकानों और संकरी गलियों की वास्तविक स्थिति को देखते हुए व्यावहारिक समाधान की जरूरत सामने आ रही है।

चार और नौ मीटर की बहस पहुंची घरों तक

यह सिर्फ सड़क की चौड़ाई का मामला नहीं है। यह पुराने शहर में रहने वाले हजारों परिवारों के घरों की सुरक्षा और भविष्य से जुड़ा मुद्दा है। आज किसी परिवार को नया मकान बनाने की जरूरत नहीं हो सकती। लेकिन समय के साथ छत कमजोर पड़ सकती है, दीवार जर्जर हो सकती है और पूरा मकान पुनर्निर्माण मांग सकता है। उस समय सड़क की चौड़ाई का नियम सीधे तय करेगा कि घर को सुरक्षित बनाने का रास्ता कितना आसान या मुश्किल होगा।

एक शहर, एक जैसी बसावट, दो नियमों का विरोधाभास

कानपुर के पुराने शहर में अब विरोधाभास साफ दिखाई दे रहा है। एक इलाके में चार मीटर चौड़ी सड़क निर्माण और मरम्मत की राह खोलती है। दूसरे इलाके में लगभग एक जैसी पुरानी और घनी बसावट के बावजूद नौ मीटर चौड़ी सड़क की बाध्यता खड़ी हो जाती है। नतीजा यह कि कुछ लोगों के लिए संकरी गली बाधा नहीं बनती, जबकि उसी तरह की दूसरी गली में रहने वालों के लिए वही संकरी सड़क मकान के भविष्य पर अड़चन बन सकती है।

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