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नेपाल फ्लड: पर्यटक क्यों बने सबसे आसान शिकार

  • हिमालय का मिजाज बदला, पुराने यात्रा नियमों के साथ बढ़ता गया खतरा

भारत 19
नेपाल-तिब्बत सीमा पर आई फ्लैश फ्लड ने एक बार फिर हिमालयी पर्यटन की सबसे बड़ी कमजोरी उजागर कर दी। खतरा केवल वहां नहीं था जहां लोग मौजूद थे, बल्कि कई किलोमीटर ऊपर पहाड़ों में पैदा हुआ और नदी के रास्ते नीचे पहुंच गया। यही वजह है कि नदी किनारे, सड़क मार्गों और संवेदनशील घाटियों में मौजूद पर्यटक और यात्री अचानक ऐसी आपदा की चपेट में आ गए, जिसके लिए पारंपरिक मौसम चेतावनी पर्याप्त नहीं थी।

मौसम साफ था, खतरा पहाड़ के ऊपर पैदा हो रहा था

हिमालयी यात्रा की मौजूदा व्यवस्था काफी हद तक मौसम पूर्वानुमान, बारिश, बर्फबारी और सड़क की स्थिति पर आधारित रहती है। लेकिन नेपाल की इस घटना ने दिखाया कि हर खतरा बादल फटने या भारी बारिश के साथ नहीं आता। ऊपरी हिमालय में ग्लेशियर, बर्फ-चट्टान या ढलान में होने वाली हलचल नीचे यात्रा कर रहे लोगों को कुछ ही समय में प्रभावित कर सकती है। यानी जिस जगह पर्यटक खड़े हों, वहां मौसम सामान्य हो सकता है, लेकिन खतरा कई किलोमीटर दूर ऊंचाई पर पैदा हो रहा होता है। यही हिमालयी पर्यटन का नया जोखिम है।

पर्यटक को खतरे की शुरुआत दिखाई ही नहीं देती

स्थानीय निवासी अक्सर नदी के व्यवहार, पहाड़ की आवाज और मौसम में अचानक बदलाव को बेहतर तरीके से समझते हैं। पर्यटक के पास न तो उस भूगोल का अनुभव होता है और न ही उसे पता होता है कि वह किस नदी, ग्लेशियर या भूस्खलन संभावित ढलान के नीचे यात्रा कर रहा है। कई हिमालयी मार्गों पर यात्री होटल, सड़क, कैंप या वाहनों में होते हैं। अगर ऊपर से अचानक मलबे और पानी का तेज प्रवाह आता है तो उनके पास खतरे को पहचानने का समय बेहद कम रह जाता है। नेपाल की त्रासदी ने यही स्थिति सामने रखी कि पर्यटक उस खतरे के सबसे करीब थे, जिसके पैदा होने की सूचना शायद उन्हें सबसे आखिर में मिलती है।

पुराने यात्रा नियम अब नए खतरे के सामने कमजोर

अब तक हिमालयी यात्रा को रोकने या नियंत्रित करने के फैसले मुख्य रूप से भारी बारिश, भूस्खलन, बर्फबारी और सड़क बंद होने जैसी परिस्थितियों पर लिए जाते रहे हैं। लेकिन ग्लेशियर टूटने, भूस्खलन से नदी रुकने या अचानक मलबे के बहाव जैसे खतरे अलग तरह की निगरानी मांगते हैं। ऐसी स्थिति में केवल यह बताना काफी नहीं कि आज बारिश होगी या नहीं। यह जानना भी जरूरी है कि यात्रा मार्ग के ऊपर की ढलान कितनी स्थिर है, नदी के ऊपरी हिस्से में कोई असामान्य बदलाव तो नहीं हुआ और ग्लेशियर या मलबे से जुड़ा कोई नया खतरा तो पैदा नहीं हो रहा।

कैलाश मानसरोवर जैसे मार्गों के लिए बड़ा सबक

नेपाल और तिब्बत के रास्ते कैलाश मानसरोवर सहित कई अंतरराष्ट्रीय और धार्मिक यात्रा मार्ग हिमालय की बेहद संवेदनशील घाटियों से गुजरते हैं। यहां हजारों यात्री ऐसे इलाकों में पहुंचते हैं, जहां संचार सीमित है और सुरक्षित स्थान तक पहुंचने में समय लग सकता है। ऐसे मार्गों के लिए अब यात्रा परमिट और मौसम बुलेटिन से आगे बढ़कर मल्टी-हैजर्ड ट्रैकिंग की जरूरत है। संवेदनशील क्षेत्रों में रियल टाइम नदी निगरानी, सैटेलाइट आधारित ढलान और ग्लेशियर मॉनिटरिंग, मोबाइल अलर्ट, सायरन और यात्रा समूहों की डिजिटल लोकेशन व्यवस्था जैसी प्रणालियां भविष्य में महत्वपूर्ण हो सकती हैं।

सबसे कमजोर कड़ी वही, जिसे खतरे की जानकारी सबसे कम

नेपाल की फ्लैश फ्लड ने साफ कर दिया कि हिमालय में पर्यटक केवल मौसम के भरोसे सुरक्षित नहीं रह सकते। पहाड़ का खतरा अब कई रूपों में सामने आ रहा है और उसकी शुरुआत उस जगह से हो सकती है जहां तक यात्री की नजर या मोबाइल नेटवर्क दोनों नहीं पहुंचते। इसलिए भविष्य की हिमालयी यात्रा व्यवस्था का सबसे बड़ा बदलाव यही होना चाहिए कि पर्यटक को केवल रास्ता खुला है या बंद, इतनी जानकारी न दी जाए, बल्कि उसे यह भी बताया जाए कि उसके ऊपर के पहाड़ और नदी तंत्र में खतरे की स्थिति क्या है।

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