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जंक फूड चेतावनी पर FSSAI और कंपनियों में टकराव

  • Reuters की ताजा रिपोर्ट से फिर चर्चा में आया मुद्दा, ज्यादा चीनी, नमक और वसा वाले खाद्य पदार्थों पर साफ चेतावनी को लेकर उद्योग और उपभोक्ता हित आमने-सामने

भारत 19 डेेस्क
नई दिल्ली।
चिप्स, नमकीन, कोल्ड ड्रिंक, इंस्टैंट नूडल्स और दूसरे पैकेटबंद खाद्य उत्पादों पर ज्यादा चीनी, नमक और सैचुरेटेड फैट की साफ चेतावनी लगाने का मुद्दा एक बार फिर गरमा गया है। Reuters की 25 अगस्त की विस्तृत रिपोर्ट में सामने आया है कि भारत में रंग-आधारित चेतावनी लेबल के प्रस्ताव को खाद्य उद्योग के विरोध का सामना करना पड़ा। बहस अब केवल पैकेट पर लिखी जानकारी तक सीमित नहीं रही, बल्कि FSSAI की नियामक भूमिका, खाद्य कंपनियों के कारोबारी हित और करोड़ों भारतीय उपभोक्ताओं के जानने के अधिकार तक पहुंच गई है। भारत में पैकेटबंद खाद्य पदार्थों पर पोषण संबंधी जानकारी पहले से दी जाती है। लेकिन असली विवाद यह है कि क्या उपभोक्ता को आंकड़े पढ़कर खुद तय करना चाहिए कि उत्पाद में चीनी या नमक कितना ज्यादा है, या फिर पैकेट के सामने ही साफ चेतावनी मिलनी चाहिए।

FSSAI ने जानकारी बढ़ाई, चेतावनी पर फैसला अटका

FSSAI ने जुलाई 2024 में पैकेटबंद खाद्य उत्पादों पर कुल चीनी, नमक और सैचुरेटेड फैट की जानकारी को अधिक प्रमुखता से दिखाने के प्रस्ताव को मंजूरी दी थी। इसका उद्देश्य उपभोक्ताओं को खाद्य उत्पाद के पोषण संबंधी तत्वों की बेहतर जानकारी देना था। लेकिन जानकारी को बड़े अक्षरों में दिखाने और किसी उत्पाद पर सीधे “हाई शुगर”, “हाई सॉल्ट” या “हाई फैट” की चेतावनी लगाने में बड़ा अंतर है। यहीं से फ्रंट-ऑफ-पैक न्यूट्रिशन लेबलिंग का विवाद शुरू होता है। स्वास्थ्य और उपभोक्ता समूह चाहते हैं कि खरीदते समय ही ग्राहक को एक नजर में उत्पाद के संभावित पोषण जोखिम का संकेत मिल जाए। दूसरी तरफ खाद्य उद्योग का तर्क है कि हर उत्पाद को कुछ पोषक तत्वों के आधार पर लाल या चेतावनी चिह्न देना जरूरत से ज्यादा सरलीकरण हो सकता है।

रेड लेबल से कंपनियों की कारोबारी चिंता

Reuters की रिपोर्ट के अनुसार, मार्च में नियामक और खाद्य उद्योग के प्रतिनिधियों के बीच हुई चर्चा में रंग-आधारित चेतावनी प्रणाली को लेकर कंपनियों ने गंभीर आपत्तियां जताईं। उद्योग की बड़ी चिंता यह है कि भारत के विशाल पैकेटबंद खाद्य और पेय बाजार के बड़ी संख्या में उत्पाद हाई फैट, शुगर या सॉल्ट की श्रेणी में आ सकते हैं। यदि ऐसे उत्पादों पर पैकेट के सामने लाल या कोई अन्य स्पष्ट चेतावनी अनिवार्य होती है, तो उसका असर केवल पैकेजिंग तक सीमित नहीं रहेगा। कंपनियों के सामने उत्पादों की ब्रांड छवि पर असर, उपभोक्ताओं की खरीदारी की आदतों में बदलाव और चीनी, नमक और वसा कम करने के लिए उत्पादों के फॉर्मूले में बदलाव की बड़ी चुनौती है। यही वजह है कि उद्योग ऐसी व्यवस्था के पक्ष में है जिसमें पोषण संबंधी जानकारी उपलब्ध रहे, लेकिन उत्पाद को सीधे किसी चेतावनी श्रेणी में न रखा जाए।

उद्योग का तर्क, हर उत्पाद को एक तराजू से नहीं तौल सकते

खाद्य कंपनियों की दलील को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। उनका कहना है कि भारतीय खान-पान की प्रकृति बेहद विविध है और किसी खाद्य पदार्थ को केवल उसमें मौजूद चीनी, नमक या वसा की मात्रा के आधार पर अस्वास्थ्यकर बताना हमेशा वैज्ञानिक रूप से पर्याप्त नहीं होगा। Reuters की रिपोर्ट में उद्योग की ओर से यह चिंता भी सामने आई कि प्राकृतिक रूप से मौजूद शुगर और उत्पाद में अलग से मिलाई गई शुगर के बीच अंतर किया जाना चाहिए। कंपनियों का कहना है कि उपभोक्ता को संतुलित आहार और सीमित मात्रा में सेवन के बारे में जागरूक करना अधिक उपयुक्त तरीका है। लेकिन उपभोक्ता समूहों का जवाब भी उतना ही सीधा है—अगर उत्पाद में किसी तत्व की मात्रा स्वास्थ्य के लिहाज से अधिक है तो ग्राहक को यह समझने के लिए पैकेट के पीछे लिखे आंकड़ों का गणित क्यों करना पड़े?

उपभोक्ता के लिए जानकारी नहीं, समझ भी जरूरी

यही इस पूरे विवाद का सबसे बड़ा भारतीय एंगल है। एक सामान्य ग्राहक दुकान या सुपर मार्केट में कई उत्पादों के बीच चुनाव करता है। वह पैकेट पर लिखी प्रति 100 ग्राम मात्रा, सर्विंग साइज और दैनिक अनुशंसित सीमा का हिसाब हमेशा नहीं कर सकता। इसलिए स्पष्ट चेतावनी के समर्थकों का तर्क है कि ‘राइट टू नो’ के साथ ‘राइट टू अंडरस्टैंड’ भी जरूरी है। यानी उपभोक्ता को केवल यह नहीं बताया जाना चाहिए कि पैकेट में कितना नमक या चीनी है, बल्कि जानकारी ऐसी होनी चाहिए जिसे वह तुरंत समझ सके। FSSAI के 2022 के ड्राफ्ट में भी फ्रंट-ऑफ-पैक न्यूट्रिशन लेबलिंग के जरिए पैकेट के सामने पोषण संबंधी जानकारी को अधिक सरल और स्पष्ट बनाने का प्रस्ताव रखा गया था।

FSSAI की सख्ती और चेतावनी पर सवाल

दिलचस्प बात यह है कि FSSAI हाल के वर्षों में भ्रामक खाद्य दावों और लेबलिंग को लेकर कार्रवाई करता रहा है। ‘हेल्थ ड्रिंक’ जैसे शब्दों के इस्तेमाल और उत्पादों की प्रस्तुति को लेकर नियामक ने कंपनियों को निर्देश भी जारी किए हैं। इसलिए अब सवाल यह उठ रहा है कि जब FSSAI भ्रामक दावों पर सख्त रुख अपना रहा है और चीनी, नमक व सैचुरेटेड फैट की जानकारी को प्रमुखता देने की दिशा में बढ़ चुका है, तो स्पष्ट चेतावनी के मॉडल पर अंतिम निर्णय क्यों नहीं हो पा रहा है। Reuters की रिपोर्ट ने इस बहस को इसलिए और महत्वपूर्ण बना दिया है क्योंकि इसमें उद्योग के विरोध और लेबलिंग मॉडल में बदलाव की प्रक्रिया पर विस्तार से सवाल उठाए गए हैं।

सरकार के सामने स्वास्थ्य और बाजार का संतुलन

भारत सरकार के लिए यह फैसला केवल खाद्य पैकेट की डिजाइन तय करने का मामला नहीं है। एक तरफ बढ़ते मोटापे, डायबिटीज और अन्य गैर-संचारी बीमारियों की चुनौती है। दूसरी तरफ देश का तेजी से बढ़ता पैकेटबंद खाद्य और पेय बाजार। स्पष्ट चेतावनी लागू होने पर कंपनियों पर अपने उत्पादों में चीनी, नमक और सैचुरेटेड फैट की मात्रा कम करने का दबाव बढ़ सकता है। दूसरी ओर, यदि नीति केवल विस्तृत पोषण जानकारी तक सीमित रहती है तो उद्योग को बड़े स्तर पर उत्पादों में बदलाव करने की तत्काल जरूरत कम होगी। यानी सरकार के सामने सवाल है कि उपभोक्ता को कितनी स्पष्ट चेतावनी दी जाए और उसका स्वरूप क्या हो।

सुप्रीम कोर्ट की सख्ती ने बढ़ाई अहमियत

मामला सुप्रीम कोर्ट तक भी पहुंच चुका है। शीर्ष अदालत ने फ्रंट-ऑफ-पैक चेतावनी लेबलिंग में देरी को लेकर केंद्र सरकार और FSSAI से सवाल किए हैं। अदालत की चिंता का केंद्र सार्वजनिक स्वास्थ्य और उपभोक्ताओं को खाद्य उत्पादों की स्पष्ट जानकारी उपलब्ध कराना रहा है। अब सरकार और FSSAI के अगले कदम पर नजर रहेगी, क्योंकि इससे यह तय हो सकता है कि भारतीय बाजार में आगे पैकेटबंद खाद्य पदार्थों पर केवल पोषण संबंधी आंकड़े प्रमुखता से दिखेंगे या फिर ज्यादा चीनी, नमक और सैचुरेटेड फैट वाले उत्पादों के लिए कोई सीधी और आसानी से समझ आने वाली चेतावनी भी लागू होगी।

असली सवाल, पैकेट पर कितना साफ दिखेगा सच

इस विवाद में खाद्य कंपनियों का हित साफ है, ऐसा लेबलिंग मॉडल न हो जो बड़ी संख्या में उनके उत्पादों को उपभोक्ता की नजर में सीधे नुकसानदेह बना दे। उपभोक्ताओं का हित भी उतना ही स्पष्ट है—खरीदते समय उन्हें यह समझने में कठिनाई न हो कि पैकेट के भीतर क्या है। यही टकराव अब FSSAI और सरकार के सामने है। फैसला केवल लाल निशान या पोषण तालिका का नहीं होगा, बल्कि यह तय करेगा कि भारतीय उपभोक्ता को जंक फूड के पैकेट पर सिर्फ आंकड़े मिलेंगे या उन्हें समझ आने वाली साफ चेतावनी भी।

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