- 62,500 करोड़ की नई योजना से सरकार की कोशिश, असेंबली से आगे बढ़कर मोबाइल निर्माण की पूरी आपूर्ति शृंखला देश में खड़ी करना
भारत 19
नई दिल्ली। भारत में मोबाइल फोन बनना अब कहानी का पहला अध्याय भर है। अगली चुनौती उसका कैमरा, डिस्प्ले, उप-असेंबली, डिजाइन और तकनीक को लेकर है। केंद्र की 62,500 करोड़ रुपये की नई मोबाइल फोन विनिर्माण योजना इन्हीं हिस्सों को धीरे-धीरे भारत लाने की कोशिश है। सरकार ने 21 अगस्त को योजना को अधिसूचित किया। यह वित्त वर्ष 2026-27 से 2030-31 तक पांच साल चलेगी। इसके पीछे सीधी सोच है, भारत सिर्फ मोबाइल जोड़ने वाली फैक्ट्री न बने, बल्कि फोन बनाने से जुड़ी बड़ी औद्योगिक शृंखला का भी महत्वपूर्ण हिस्सा उसके भीतर विकसित हो। सरकार को उम्मीद है कि योजना अवधि में करीब 39 लाख करोड़ रुपये का संचयी मोबाइल उत्पादन होगा और लगभग 60 हजार प्रत्यक्ष रोजगार पैदा होंगे।
फोन बन गया, अब बारी उसके भीतर की
भारत उत्पादन के मामले में दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा मोबाइल निर्माता बन चुका है। देश में इस्तेमाल होने वाले 99.2 प्रतिशत मोबाइल अब यहीं बनाए जाते हैं। 2025 में स्मार्टफोन भारत की सबसे बड़ी एकल निर्यात श्रेणी भी बन गए। लेकिन मोबाइल उद्योग की अगली चुनौती उत्पादन की संख्या नहीं, बल्कि यह है कि फोन की कीमत में शामिल अधिक आर्थिक गतिविधि भारत के भीतर कैसे आए। यहीं से नई योजना पुराने माडल से अलग होती है। सरकार कंपनियों को भारत में बने प्रमुख कलपुर्जों और उप-असेंबली के इस्तेमाल पर अतिरिक्त प्रोत्साहन देगी। पात्र मोबाइल निर्माताओं के लिए बिक्री से जुड़े प्रोत्साहन की दर 2.25 से 5 प्रतिशत तक रखी गई है, जबकि घरेलू स्रोतों से प्रमुख घटक और उप-असेंबली लेने पर 1.5 प्रतिशत तक अतिरिक्त प्रोत्साहन का प्रावधान है। मतलब साफ है, अब नीति का जोर केवल इस पर नहीं कि फोन भारत में असेंबल किया जाए, बल्कि यह भी है कि उसे बनाने वाली अधिक से अधिक गतिविधियां यहीं विकसित हों।
एक मोबाइल के पीछे खड़ा होगा बड़ा उद्योग
मोबाइल के कलपुर्जे देश में बनने लगते हैं तो फायदा केवल मोबाइल कंपनियों को नहीं होगा। उनके साथ सप्लायर, उपकरण निर्माता, परीक्षण और गुणवत्ता जांच इकाइयां, इंजीनियरिंग सेवाएं और लॉजिस्टिक्स का दायरा भी बढ़ेगा। सरकार पिछले कुछ वर्षों से इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग को इसी क्रम में आगे बढ़ाने की रणनीति पर काम कर रही है, पहले तैयार उत्पाद, फिर उप-असेंबली और कलपुर्जे, और आगे चलकर मशीनरी और उपकरणों तक घरेलू क्षमता विकसित करना। नई योजना मोबाइल उद्योग को इसी अगली सीढ़ी पर ले जाने का प्रयास है।
भारतीय मोबाइल ब्रांडों को अलग मौका
योजना का दूसरा बड़ा पहलू भारतीय स्वामित्व वाले मोबाइल ब्रांड हैं। सरकार चाहती है कि भारत केवल वैश्विक कंपनियों के लिए उत्पादन केंद्र बनकर न रहे, बल्कि यहां से अपने ब्रांड, डिजाइन और तकनीकी क्षमता भी विकसित हो। ऐसे भारतीय ब्रांडों के लिए पात्र बिक्री पर 5 प्रतिशत तक प्रोत्साहन और भारत में किए गए उत्पाद डिजाइन तथा अनुसंधान एवं विकास के लिए 3 प्रतिशत अतिरिक्त प्रोत्साहन का प्रावधान है। सरकार का जोर इस बात पर है कि ब्रांड, डिजाइन और बौद्धिक संपदा पर वास्तविक भारतीय नियंत्रण हो। यह पहल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि मोबाइल उद्योग में केवल फैक्ट्री लगाने से पूरी आर्थिक हिस्सेदारी हासिल नहीं होती। उत्पाद का डिजाइन कौन करता है, तकनीक और पेटेंट किसके पास हैं और ब्रांड किसका है, इन सवालों से भी तय होता है कि सबसे अधिक मूल्य कहां पैदा होगा।
अर्थव्यवस्था को क्या मिलेगा
अगर योजना अपने लक्ष्य के मुताबिक आगे बढ़ती है तो इसका असर तीन स्तरों पर पड़ सकता है। पहला, कलपुर्जा निर्माण बढ़ने से इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र में नया निवेश आएगा। दूसरा, उत्पादन के साथ डिजाइन और अनुसंधान बढ़ने से तकनीकी तथा कुशल रोजगार के अवसर तैयार होंगे। तीसरा, मोबाइल और इलेक्ट्रॉनिक्स निर्यात में वृद्धि से भारत की वैश्विक आपूर्ति शृंखला में भूमिका मजबूत हो सकती है। सरकार का अनुमान है कि पांच वर्षों में करीब 39 लाख करोड़ रुपये का संचयी मोबाइल उत्पादन और लगभग 60 हजार प्रत्यक्ष रोजगार इस योजना से जुड़े होंगे। हालांकि इसका वास्तविक आर्थिक असर इस बात पर निर्भर करेगा कि कितने नए कलपुर्जा निर्माता भारत में उत्पादन शुरू करते हैं और घरेलू आपूर्ति शृंखला कितनी तेजी से विकसित होती है।
पुरानी पीएलआई ने दरवाजा खोला, अब अगला कदम
बड़े पैमाने पर इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण की उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजना ने भारत में मोबाइल उत्पादन और निर्यात को बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई। उसकी अवधि 31 मार्च 2026 को समाप्त हुई। नई मोबाइल फोन विनिर्माण योजना उसी उपलब्धि को आगे बढ़ाने के लिए लाई गई। फर्क इतना है कि पहले फोकस था, भारत में ज्यादा मोबाइल बनें। अब लक्ष्य है, मोबाइल बनाने की सप्लाई चेन भारत में विकसित हो।
असली नतीजा पांच साल बाद दिखेगा
62,500 करोड़ रुपये की इस योजना का महत्व रकम से कहीं बड़ा है। यह भारत की मोबाइल नीति के अगले चरण का संकेत है। देश ने असेंबली और बड़े पैमाने के उत्पादन में अपनी जगह बनाई है, अब उसे यह साबित करना है कि वह कलपुर्जों, डिजाइन और तकनीक में भी अपनी क्षमता बढ़ा सकता है। अगर अगले पांच वर्षों में मोबाइल की आपूर्ति शृंखला का बड़ा हिस्सा भारत में विकसित होता है, तो देश सिर्फ दुनिया के बड़े मोबाइल निर्माताओं में शामिल नहीं रहेगा। वह उस पूरी व्यवस्था में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाएगा, जहां फोन के साथ निवेश, रोजगार, तकनीक और आर्थिक मूल्य भी बनता है।


