- करीब 30 हजार उपग्रहों वाले जेन-2 नेटवर्क के लिए दोबारा आवेदन, सीधे मोबाइल उपकरणों को सैटेलाइट से जोड़ने की तकनीक शामिल; स्पेक्ट्रम और सुरक्षा मंजूरी अब भी अहम पड़ाव
भारत 19 डेस्क
कानपुर। एलन मस्क की कंपनी स्पेसएक्स की सैटेलाइट इंटरनेट सेवा स्टारलिंक ने भारत में अपनी दूसरी पीढ़ी के सैटेलाइट नेटवर्क यानी जेन-2 के लिए फिर नियामकीय मंजूरी मांगी है। रायटर्स की रिपोर्ट के अनुसार कंपनी ने भारतीय अंतरिक्ष नियामक भारतीय राष्ट्रीय अंतरिक्ष संवर्धन और प्राधिकरण केंद्र (इन-स्पेस) के पास नया आवेदन दाखिल किया है। इसमें करीब 30 हजार निम्न-पृथ्वी कक्षा वाले सैटेलाइटों के नेटवर्क के लिए अनुमति मांगी गई है। रॉयटर्स ने भी इस घटनाक्रम की रिपोर्ट की है, हालांकि आवेदन से जुड़े विवरणों की उसने स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं की है।
जेन-2 नेटवर्क के जरिए बड़ा दांव
स्टारलिंक के नए आवेदन में करीब 30 हजार सैटेलाइटों वाले जेन-2 नेटवर्क को भारत में संचालित करने की अनुमति मांगी गई है। ये सैटेलाइट पृथ्वी की निचली कक्षा में करीब 340 से 615 किलोमीटर की ऊंचाई पर काम करने की योजना का हिस्सा हैं। कंपनी की वैश्विक योजना जेन-2 नेटवर्क में करीब 42 हजार सैटेलाइटों तक पहुंचने की है, जबकि भारत के लिए फिलहाल करीब 30 हजार सैटेलाइटों की अनुमति मांगी गई है। यह आवेदन इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि जेन-2 नेटवर्क केवल पारंपरिक सैटेलाइट ब्रॉडबैंड तक सीमित नहीं है। इसमें डायरेक्ट-टू-डिवाइस यानी सीधे मोबाइल उपकरण से सैटेलाइट संपर्क जैसी नई सुविधा भी शामिल है।
सीधे मोबाइल फोन तक पहुंचेगा सैटेलाइट नेटवर्क
डायरेक्ट-टू-डिवाइस तकनीक स्टारलिंक की नई योजना का सबसे अहम पहलू है। इसके जरिए अनुकूल मोबाइल फोन और दूसरे उपकरण सीधे सैटेलाइट से संपर्क कर सकेंगे। ऐसे क्षेत्रों में इसका इस्तेमाल खास तौर पर महत्वपूर्ण हो सकता है जहां मोबाइल टावर या जमीन आधारित इंटरनेट नेटवर्क की पहुंच कमजोर है। इस तकनीक का विस्तार होने पर पहाड़ी, सीमावर्ती, समुद्री और दूरदराज के इलाकों में मोबाइल कनेक्टिविटी का एक वैकल्पिक रास्ता तैयार हो सकता है। आपदा या प्राकृतिक संकट के दौरान भी ऐसी तकनीक संचार व्यवस्था को बनाए रखने में उपयोगी साबित हो सकती है।
पहले आवेदन को नहीं मिली थी मंजूरी
स्टारलिंक ने इससे पहले भारत में पहली और दूसरी पीढ़ी के सैटेलाइट नेटवर्क के लिए आवेदन किया था। इन-स्पेस ने जुलाई 2025 में 4,408 निम्न-पृथ्वी कक्षा वाले सैटेलाइटों वाले जेन-1 नेटवर्क को मंजूरी दी थी। यह नेटवर्क पारंपरिक सैटेलाइट ब्रॉडबैंड सेवा के लिए है। वहीं जेन-2 के पुराने आवेदन को कुछ तकनीकी विशेषताओं और इस्तेमाल किए जाने वाले आवृत्ति बैंड के भारत की आवश्यकताओं के अनुरूप नहीं होने के कारण मंजूरी नहीं मिली थी। नए आवेदन में इन्हीं नियामकीय आवश्यकताओं के अनुरूप बदलाव किए जाने की बात सामने आई है।
सुरक्षा मंजूरी अभी बड़ी अड़चन
स्टारलिंक के नए आवेदन का मतलब यह नहीं है कि भारत में उसकी वाणिज्यिक सेवा तुरंत शुरू हो जाएगी। कंपनी के सामने अभी कई नियामकीय पड़ाव हैं। 20 अगस्त की एक अलग रिपोर्ट के अनुसार स्टारलिंक और यूटेलसैट वनवेब जैसे सैटेलाइट संचार प्रदाताओं को वाणिज्यिक सेवा शुरू करने से पहले सुरक्षा से जुड़ी कुछ आवश्यकताओं को पूरा करना बाकी है। गृह मंत्रालय और सुरक्षा एजेंसियों की ओर से उठाई गई चिंताओं का समाधान अंतिम मंजूरी की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इसके अलावा सैटेलाइट संचार सेवाओं के लिए स्पेक्ट्रम आवंटन और उसकी कीमत से जुड़े फैसले भी अभी महत्वपूर्ण हैं। डायरेक्ट-टू-डिवाइस सेवाओं को लेकर दूरसंचार नियामक की प्रक्रिया भी चल रही है।
भारत के सैटेलाइट इंटरनेट बाजार में बढ़ेगी प्रतिस्पर्धा
स्टारलिंक की नई कोशिश ऐसे समय हुई है जब भारत में सैटेलाइट इंटरनेट और सीधे मोबाइल उपकरणों तक सैटेलाइट कनेक्टिविटी को लेकर गतिविधियां तेज हो रही हैं। यूटेलसैट वनवेब और जियो की सैटेलाइट संचार कंपनी भी इस क्षेत्र में मौजूद हैं, हालांकि वाणिज्यिक सेवाओं की शुरुआत के लिए नियामकीय और सुरक्षा प्रक्रियाएं अभी अहम हैं। स्टारलिंक को जेन-2 नेटवर्क की मंजूरी मिलने पर इसकी बड़ी सैटेलाइट क्षमता उसे बाजार में मजबूत स्थिति दे सकती है। खासकर डायरेक्ट-टू-डिवाइस सुविधा के कारण प्रतिस्पर्धा केवल सैटेलाइट डिश के जरिये इंटरनेट उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं रहेगी।
दूरदराज इलाकों के लिए बढ़ेगा कनेक्टिविटी विकल्प
भारत जैसे बड़े और भौगोलिक रूप से विविध देश में सैटेलाइट इंटरनेट को उन इलाकों के लिए उपयोगी माना जाता है जहां फाइबर या मोबाइल टावर पहुंचाना कठिन और महंगा है। स्टारलिंक का जेन-2 नेटवर्क इस जरूरत को बड़े पैमाने पर पूरा करने का दावा करता है। हालांकि इसकी सफलता केवल उपग्रहों की संख्या पर निर्भर नहीं करेगी। सुरक्षा मानक, स्पेक्ट्रम आवंटन, स्थानीय नियामकीय शर्तें और सेवा की कीमत यह तय करेंगे कि भारतीय उपभोक्ताओं के लिए यह सेवा कितनी व्यावहारिक बन पाती है।
स्टारलिंक की भारत रणनीति में नया मोड़
भारत में स्टारलिंक की यह दूसरी कोशिश बताती है कि कंपनी देश के सैटेलाइट संचार बाजार को लेकर गंभीर है। पहले जेन-1 नेटवर्क को मिली मंजूरी के बाद अब जेन-2 के लिए दोबारा आवेदन कंपनी को ज्यादा उन्नत सेवाओं के साथ बाजार में उतरने का रास्ता दे सकता है। फिलहाल स्टारलिंक के लिए अगली चुनौती आवेदन की मंजूरी से आगे बढ़कर सुरक्षा अनुपालन, स्पेक्ट्रम और अंतिम नियामकीय स्वीकृतियां हासिल करना है। इन प्रक्रियाओं के पूरी होने के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि कंपनी भारत में अपने नए सैटेलाइट नेटवर्क और सीधे मोबाइल उपकरणों तक कनेक्टिविटी की योजना को कितनी जल्दी व्यावसायिक रूप दे पाती है।


