- मुजफ्फरनगर के अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश रविकुमार दिवाकर की फास्ट ट्रैक अदालत में लंबित करीब 100 हत्या के मुकदमे जिला एवं सत्र न्यायाधीश की अदालत में स्थानांतरित, चार महीने में 10 मामलों में 22 दोषियों को सुनाई गई थी मृत्युदंड की सजा
भारत 19
लखनऊ। मुजफ्फरनगर की एक अदालत में पिछले कुछ महीनों से लगातार सुनाई जा रही कड़ी सजाओं के बीच करीब 100 हत्या के मुकदमे अब दूसरी अदालत में पहुंच गए हैं। अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश रवि कुमार दिवाकर की फास्ट ट्रैक अदालत में लंबित इन मुकदमों को जिला एवं सत्र न्यायाधीश वीरेंद्र कुमार सिंह की अदालत में स्थानांतरित किया गया है। मामलों का स्थानांतरण प्रशासनिक आदेश के तहत हुआ है। घटनाक्रम इसलिए सुर्खियों में है क्योंकि इसी अवधि में न्यायाधीश दिवाकर की अदालत ने हत्या के 10 मामलों में 22 दोषियों को मृत्युदंड सुनाया था।
करीब 100 मुकदमों का बदला अदालत का पता
सरकारी अधिवक्ता कुलदीप कुमार के हवाले से रिपोर्टों में बताया गया है कि फास्ट ट्रैक अदालत में लंबित करीब 100 हत्या के मुकदमों को अब जिला एवं सत्र न्यायाधीश की अदालत में स्थानांतरित किया गया है। इन मुकदमों की सुनवाई आगे नई अदालत में होगी। यह किसी फैसले को पलटने या पहले सुनाई गई सजा पर रोक लगाने की कार्रवाई नहीं है। स्थानांतरण उन मुकदमों का हुआ है जिनमें अभी सुनवाई पूरी नहीं हुई है।
दस मामलों में 22 मौत की सजाएं
न्यायाधीश रविकुमार दिवाकर की अदालत पिछले चार महीनों में दिए गए मृत्युदंड के फैसलों के कारण चर्चा में रही। रिपोर्टों के अनुसार 10 अलग-अलग हत्या मामलों में अदालत ने कुल 22 दोषियों को मृत्युदंड सुनाया। 12 अगस्त को फिरौती के लिए हत्या के एक मामले में एक दोषी को मृत्युदंड सुनाया गया था। इसके अगले दिन, 13 अगस्त को एक पुराने हत्या मामले में चार आरोपियों को मृत्युदंड की सजा दी गई। इससे पहले भी कई गंभीर हत्या मामलों में इसी अदालत से कड़ी सजाएं सुनाई गई थीं।
स्थानांतरण और सजाओं के बीच सीधा संबंध नहीं
100 मामलों के स्थानांतरण और 22 मृत्युदंड के फैसलों का एक साथ सामने आना इस घटनाक्रम को असामान्य जरूर बनाता है, लेकिन इसे दोनों घटनाओं के बीच कारण-परिणाम के संबंध के रूप में पेश करना अभी उचित नहीं होगा। प्रशासनिक आदेश में यदि स्थानांतरण का कोई विस्तृत कारण दर्ज है तो वही इसकी आधिकारिक वजह मानी जाएगी। फिलहाल सामने आई जानकारी में ऐसा कोई आधिकारिक बयान नहीं है जो इसे न्यायाधीश के फैसलों से जोड़ता हो।
मृत्युदंड के फैसलों की अपनी न्यायिक प्रक्रिया
फांसी की सजा सुनाए जाने के बाद मामला वहीं खत्म नहीं होता। सत्र अदालत द्वारा सुनाए गए मृत्युदंड की पुष्टि उच्च न्यायालय से होना आवश्यक है। दोषी को कानून के तहत अपील और अन्य वैधानिक उपायों का अधिकार भी रहता है। इसलिए न्यायाधीश दिवाकर की अदालत से पहले सुनाए गए मृत्युदंड के फैसले और अब लंबित मामलों के स्थानांतरण को दो अलग न्यायिक प्रक्रियाओं के रूप में देखना होगा।
वकीलों के बीच भी चर्चा तेज
मामलों के स्थानांतरण के बाद मुजफ्फरनगर के न्यायिक हलकों में भी इसकी चर्चा तेज हुई है। जिला बार एसोसिएशन के अध्यक्ष प्रमोद त्यागी ने बताया कि कुछ वकीलों और वादकारियों के बीच अदालत में मृत्युदंड की आशंका को लेकर चर्चा थी। हालांकि, यह प्रतिक्रिया प्रशासनिक आदेश का आधिकारिक कारण नहीं है। इसलिए इसे आदेश के पीछे की वजह के रूप में प्रस्तुत करना तथ्यात्मक रूप से सुरक्षित नहीं होगा।
न्यायाधीश पहले भी बड़े मामलों से चर्चा में रहे
रवि कुमार दिवाकर का नाम इससे पहले 2022 में वाराणसी के ज्ञानवापी परिसर से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान भी राष्ट्रीय स्तर पर सामने आया था। उस समय वह वाराणसी में न्यायिक अधिकारी के रूप में कार्यरत थे। मुजफ्फरनगर में पिछले कुछ महीनों में उनके न्यायालय से आए लगातार मृत्युदंड के फैसलों ने भी उन्हें चर्चा में ला दिया।
अब नई अदालत में होगी हत्या के मुकदमों की सुनवाई
करीब 100 लंबित हत्या के मामलों के स्थानांतरण के बाद इन मुकदमों की आगे की सुनवाई जिला एवं सत्र न्यायाधीश वीरेंद्र कुमार सिंह की अदालत में होगी। इससे इन मामलों की अगली सुनवाई, गवाही और फैसलों की प्रक्रिया अब नई अदालत के समक्ष आगे बढ़ेगी।

