- 150 किलो वजनी ड्रोन 50 किलो तक सामान ले जाने में सक्षम, लद्दाख में सफल परीक्षण के बाद सेना को सौंपने की तैयारी; दुश्मन के जैमर के बीच भी मिशन पूरा करने के लिए डिजाइन
विक्सन सिकरोड़िया, कानपुर। देश की ऊंची और दुर्गम सीमाओं पर तैनात सैनिकों के लिए रसद पहुंचाने की चुनौती अब कम होने वाली है। सियाचिन ग्लेशियर, साल्टोरो रिज और लद्दाख की बर्फीली चोटियों पर तैनात जवानों तक अब खाना, दवाइयां, ईंधन और जरूरी सैन्य सामग्री ड्रोन के जरिए पहुंचाई जा सकेगी।
भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) कानपुर के एयरोस्पेस स्टार्टअप एंड्योरएयर सिस्टम्स ने भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (BEL) के साथ मिलकर एक ऐसा भारी क्षमता वाला लॉजिस्टिक्स ड्रोन विकसित किया है, जो कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में भी सामान पहुंचाने में सक्षम है। करीब 150 किलोग्राम वजन का ‘BE-50’ ड्रोन एक बार में 50 किलोग्राम तक पेलोड (सामग्री) लेकर उड़ान भर सकता है। हाल ही में लद्दाख की ऊंची पहाड़ियों में इसका परीक्षण किया गया, जो सफल रहा। अब इसे भारतीय सेना को उपलब्ध कराने की तैयारी चल रही है।
घोड़े-खच्चरों की जगह लेगा हाईटेक ड्रोन
हिमालयी क्षेत्रों में सैनिकों तक सामान पहुंचाना हमेशा बड़ी चुनौती रहा है। कई इलाकों में सड़कें नहीं हैं और भारी बर्फबारी के कारण सामान्य वाहन पहुंच नहीं पाते। ऐसे में सेना को कई बार हेलीकॉप्टर, पैदल जवानों और घोड़े-खच्चरों पर निर्भर रहना पड़ता है। BE-50 ड्रोन ऐसे इलाकों में तेज और सुरक्षित विकल्प साबित हो सकता है। यह उन स्थानों तक भी पहुंच सकता है जहां इंसानों या पारंपरिक साधनों से रसद पहुंचाना मुश्किल होता है।
जैमर के बीच भी मिशन पूरा करने की क्षमता
IIT कानपुर के एयरोस्पेस इंजीनियरिंग विभाग के प्रोफेसर और एंड्योरएयर सिस्टम्स के संस्थापक प्रोफेसर अभिषेक ने बताया कि पहाड़ी सीमाओं पर ड्रोन संचालन आसान नहीं होता। उन्होंने कहा कि वहां तापमान माइनस में चला जाता है और दुश्मन की ओर से इलेक्ट्रॉनिक जैमर जैसी चुनौतियां भी रहती हैं। इन्हीं परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए BE-50 को इस तरह डिजाइन किया गया है कि इलेक्ट्रॉनिक बाधाओं के बीच भी यह अपने मिशन को पूरा कर सके।
GPS के बिना भी भर सकता है उड़ान
BE-50 की सबसे बड़ी खासियत इसकी स्वायत्त उड़ान क्षमता है। इसे पहले से प्रोग्राम करने के बाद यह तय स्थान तक खुद पहुंच सकता है। ड्रोन में लगे कैमरे और सेंसर वास्तविक समय में तस्वीरें और जरूरी जानकारी भेजने में सक्षम हैं। खास बात यह है कि यह GPS उपलब्ध न होने की स्थिति में भी अपनी दिशा और स्थान का अनुमान लगाकर उड़ान भर सकता है।
चार रोटर और लंबा बैटरी बैकअप
BE-50 में चार रोटर सिस्टम लगाया गया है। इसमें करीब 30 किलोग्राम क्षमता वाली चार बैटरियां लगी हैं, जो इसे लंबी अवधि तक उड़ान भरने में मदद करती हैं। ड्रोन को विशेष रूप से ऊंचाई वाले क्षेत्रों, कम तापमान और चुनौतीपूर्ण मौसम को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है।
IIT कानपुर का डिफेंस ड्रोन पोर्टफोलियो
IIT कानपुर की एयरोस्पेस टीम इससे पहले भी कई महत्वपूर्ण ड्रोन विकसित कर चुकी है।
सबाल
10 से 70 किलोग्राम तक पेलोड क्षमता वाला भारी लॉजिस्टिक्स ड्रोन। इसे भारतीय सेना की पूर्वी कमान ने अपने बेड़े में शामिल किया है।
विभ्रम
लंबी दूरी तक उड़ान भरने वाला ड्रोन। इसका उपयोग तेलंगाना के ‘मेडिसिन फ्रॉम द स्काई’ कार्यक्रम में किया गया, जिसमें स्वास्थ्य सेवाओं और टीकाकरण सामग्री पहुंचाने का काम शामिल है।
अलख
नैनो-यूएवी ड्रोन, जिसे आपदा राहत अभियानों में इस्तेमाल किया गया है।
रक्षा तकनीक में आत्मनिर्भर भारत की दिशा में बड़ा कदम
ड्रोन तकनीक अब आधुनिक युद्ध और आपदा प्रबंधन का अहम हिस्सा बन चुकी है। भारत में स्वदेशी रूप से विकसित BE-50 जैसे ड्रोन न केवल सेना की लॉजिस्टिक्स क्षमता बढ़ाएंगे, बल्कि कठिन परिस्थितियों में जवानों तक सहायता पहुंचाने के तरीके को भी बदल सकते हैं। रक्षा क्षेत्र में स्वदेशी तकनीक को बढ़ावा देने के अभियान के बीच IIT कानपुर और BEL का यह प्रयास भारत की ड्रोन क्षमताओं को नई ऊंचाई देने वाला माना जा रहा है।


