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शाह के सामने दक्षिण ने उठाए अधिकार और हिस्सेदारी के सवाल

  • दक्षिणी क्षेत्रीय परिषद की बैठक में परिसीमन से राजनीतिक प्रतिनिधित्व, कावेरी-मेकेदातु से राज्यों के हित और नीट से शिक्षा में स्वायत्तता तक के मुद्दों ने केंद्र-दक्षिण संबंधों को फिर चर्चा में ला दिया

भारत 19 डेस्क
कानपुर
। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की अध्यक्षता में हुई दक्षिणी क्षेत्रीय परिषद की बैठक केवल राज्यों के बीच तालमेल की औपचारिक कवायद नहीं रही। बैठक में दक्षिणी राज्यों ने केंद्र के सामने उन मुद्दों को प्रमुखता से रखा, जो आने वाले दिनों में देश की राजनीति और संघीय ढांचे पर असर डाल सकते हैं। परिसीमन से संसद में राजनीतिक हिस्सेदारी का सवाल उठा तो कावेरी और मेकेदातु ने राज्यों के बीच पुराने जल विवाद को फिर सामने ला दिया। तमिलनाडु ने नीट का मुद्दा उठाकर शिक्षा नीति में राज्यों की भूमिका पर भी अपनी चिंता दर्ज कराई।
परिसीमन ने उठाया दक्षिण की राजनीतिक हिस्सेदारी का सवाल

बैठक में सबसे अहम मुद्दा परिसीमन रहा। परिसीमन का मुद्दा अब केवल सीटों के गणित तक सीमित नहीं है। दक्षिणी राज्यों के लिए यह राजनीतिक प्रतिनिधित्व और संघीय संतुलन का सवाल बन चुका है। उनकी आशंका है कि परिवार नियोजन और जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन करने वाले राज्यों को भविष्य में संसद में कम हिस्सेदारी के रूप में इसकी कीमत नहीं चुकानी चाहिए। अमित शाह की मौजूदगी में इस मुद्दे का उठना इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि दक्षिणी राज्य भविष्य के परिसीमन पर अपनी राजनीतिक चिंताओं को केंद्र के सामने स्पष्ट रूप से दर्ज कराना चाहते हैं। आने वाले वर्षों में यह बहस उत्तर और दक्षिण के राजनीतिक प्रतिनिधित्व के बड़े सवाल में बदल सकती है।

कावेरी और मेकेदातु पर फिर दिखी पुरानी खींचतान

बैठक में तमिलनाडु और कर्नाटक के बीच कावेरी जल विवाद भी प्रमुख मुद्दों में रहा। कावेरी का पानी दोनों राज्यों के लिए केवल संसाधन का सवाल नहीं, बल्कि किसानों, क्षेत्रीय राजनीति और राज्यों के अधिकारों से जुड़ा संवेदनशील विषय है। इसके साथ मेकेदातु परियोजना को लेकर भी दोनों राज्यों के अलग-अलग हित सामने आए। कर्नाटक परियोजना को आगे बढ़ाने का पक्ष रखता रहा है, जबकि तमिलनाडु को इससे अपने जल अधिकार प्रभावित होने की चिंता है। परिषद की बैठक ने दोनों राज्यों को केंद्र की मौजूदगी में बातचीत का मंच जरूर दिया, लेकिन विवाद के किसी तत्काल समाधान के संकेत नहीं मिले।

नीट पर तमिलनाडु ने फिर उठाया स्वायत्तता का मुद्दा

तमिलनाडु ने बैठक में नीट से छूट की अपनी पुरानी मांग भी दोहराई। राज्य का तर्क है कि मेडिकल प्रवेश की राष्ट्रीय परीक्षा व्यवस्था का असर राज्य बोर्ड और ग्रामीण पृष्ठभूमि से आने वाले विद्यार्थियों पर पड़ता है। राजनीतिक रूप से नीट का मुद्दा परीक्षा से कहीं बड़ा है। इसके केंद्र में यह सवाल है कि शिक्षा जैसे विषयों में राज्यों को अपनी परिस्थितियों के अनुसार नीति तय करने की कितनी स्वतंत्रता होनी चाहिए। यही वजह है कि नीट पर तमिलनाडु का रुख संघीय अधिकारों की व्यापक बहस से जुड़ जाता है।

अलग मुद्दे, लेकिन सवाल एकः केंद्र और राज्यों का अधिकार

परिसीमन, कावेरी और नीट तीन अलग-अलग मुद्दे हैं, लेकिन दक्षिणी क्षेत्रीय परिषद की बैठक में इन सभी के पीछे एक साझा सवाल दिखाई दिया। केंद्र और राज्यों के बीच अधिकारों और हिस्सेदारी का संतुलन कैसे तय होगा। बैठक में अंतरराज्यीय समन्वय, विकास, कानून-व्यवस्था और अन्य प्रशासनिक विषयों पर भी चर्चा हुई। लेकिन राजनीतिक दृष्टि से सबसे महत्वपूर्ण बात यही रही कि दक्षिणी राज्यों ने प्रतिनिधित्व, संसाधनों और नीतिगत स्वायत्तता से जुड़े अपने संवेदनशील मुद्दे केंद्र के सामने एक साथ रखे।
अमित शाह की अध्यक्षता वाली इस बैठक में कोई बड़ा राजनीतिक समाधान भले सामने नहीं आया, लेकिन इतना साफ हो गया कि दक्षिण की राजनीति में अब केवल विकास का सवाल नहीं है। परिसीमन से संसद में हिस्सेदारी, कावेरी से संसाधनों पर अधिकार और नीट से राज्यों की स्वायत्तता तक, केंद्र और दक्षिण के बीच संघीय संतुलन की बहस आने वाले दिनों में और तेज हो सकती है।

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