- कम बारिश से पैदावार पर असर, उत्पादन करीब एक करोड़ टन घटकर 14.4 करोड़ टन रहने का अनुमान; सरकारी भंडार पर्याप्त होने से फिलहाल घरेलू उपलब्धता पर बड़ा संकट नहीं
भारत 19
नई दिल्ली। भारत में इस साल चावल उत्पादन में करीब 6.5 प्रतिशत की गिरावट का अनुमान है। उद्योग विशेषज्ञों के मुताबिक उत्पादन पिछले साल के रिकॉर्ड करीब 15.4 करोड़ टन से घटकर लगभग 14.4 करोड़ टन रह सकता है। यह करीब दो दशक में सबसे बड़ी सालाना गिरावट होगी। धान की फसल के दौरान कई प्रमुख उत्पादक क्षेत्रों में बारिश कम रहने और मानसून की कमजोरी को इसकी बड़ी वजह माना जा रहा है।
एक करोड़ टन तक घट सकता है उत्पादन
राइस एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष बीवी कृष्ण राव के मुताबिक इस साल चावल उत्पादन करीब एक करोड़ टन घट सकता है। एक जून से शुरू हुए मानसून सीजन में देशभर में बारिश सामान्य से करीब 15 प्रतिशत कम रही है। कुछ प्रमुख चावल उत्पादक राज्यों में कमी इससे काफी अधिक रही। गर्मियों में बोई जाने वाली धान की फसल का रकबा भी 11 सितंबर तक करीब 4.27 करोड़ हेक्टेयर रहा, जो पिछले साल की समान अवधि से लगभग चार प्रतिशत कम है। देश के कुल चावल उत्पादन में इस फसल की हिस्सेदारी 80 प्रतिशत से अधिक है, इसलिए रकबे और उपज में कमी का सीधा असर कुल उत्पादन पर पड़ सकता है।
दक्षिण और पूर्वी राज्यों में ज्यादा असर
लंबे समय तक बारिश कम रहने से दक्षिण और पूर्वी भारत के कई चावल उत्पादक क्षेत्रों में फसल की उपज प्रभावित होने की आशंका है। जलाशयों में पानी का स्तर भी चिंता का विषय है। इसका असर आगे सर्दियों में बोई जाने वाली धान की फसल के रकबे पर भी पड़ सकता है। हालांकि, अंतिम उत्पादन का आंकड़ा अभी सामने नहीं आया है। मौसम की आगे की स्थिति और फसल कटाई के बाद वास्तविक उत्पादन अनुमान में बदलाव संभव है।
चावल की कीमतों में बढ़ोतरी शुरू
कम पैदावार की आशंका का असर बाजार में दिखाई देने लगा है। उपभोक्ता मामलों के विभाग के आंकड़ों के मुताबिक 16 सितंबर को चावल की अखिल भारतीय औसत खुदरा कीमत 46.48 रुपये प्रति किलो रही, जबकि एक महीने पहले यह 44.96 रुपये थी। यानी करीब 3.4 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई। इसी अवधि में औसत थोक कीमत भी 4038.15 रुपये प्रति 100 किलो से बढ़कर 4172.31 रुपये हो गई। उत्पादन में वास्तविक कमी बढ़ती है तो कीमतों पर आगे भी दबाव बन सकता है।
सरकारी भंडार से फिलहाल राहत
उत्पादन घटने के बावजूद तत्काल घरेलू उपलब्धता को लेकर बड़ा संकट नहीं माना जा रहा है। एक सितंबर तक सरकारी स्तर पर चावल और बिना मिलाए धान समेत करीब 5.96 करोड़ टन का भंडार था। यह एक अक्टूबर के लिए निर्धारित करीब 1.03 करोड़ टन के बफर लक्ष्य से काफी अधिक है। इस बड़े स्टॉक के कारण सरकार के पास घरेलू बाजार में आपूर्ति बनाए रखने और जरूरत पड़ने पर कीमतों को नियंत्रित करने के लिए पर्याप्त गुंजाइश है।
कम पैदावार का आम लोगों पर असर
अगर उत्पादन अनुमान के मुताबिक घटता है तो इसका सबसे सीधा असर चावल की कीमतों पर पड़ सकता है। खुले बाजार में आपूर्ति कम होने पर खुदरा और थोक कीमतें बढ़ सकती हैं। हालांकि सरकारी भंडार पर्याप्त होने के कारण तत्काल बड़े पैमाने पर चावल की कमी की संभावना कम है। दूसरी ओर, किसानों को खुले बाजार में बेहतर कीमत मिलने की संभावना बन सकती है, लेकिन सरकारी खरीद के लिए उपलब्ध धान की मात्रा घट सकती है।
निर्यात पर भी पड़ेगा असर
भारत दुनिया के प्रमुख चावल उत्पादकों और निर्यातकों में शामिल है। मौजूदा बड़े सरकारी भंडार के कारण उत्पादन में गिरावट के बावजूद तत्काल निर्यात पर बड़ा असर पड़ना जरूरी नहीं है। लेकिन घरेलू कीमतों में बढ़ोतरी से भारतीय चावल की कीमत और प्रतिस्पर्धा पर दबाव पड़ सकता है।


