- तीन साल के आंकड़ों की पड़ताल में घोषित कारोबार और विदेश भेजी रकम का नहीं कोई मेल, 394 संस्थाएं और 36 पेशेवर जांच के दायरे में
भारत 19 डेस्क
कानपुर। कारोबार कागजों पर छोटा, लेकिन विदेश भेजी गई रकम बड़ी, आयकर विभाग को विदेश धन भेजने के ऐसे मामलों ने चौंकाया है। तीन वर्षों के लेनदेन और आयकर रिकॉर्ड के विश्लेषण में कई संस्थाओं के घोषित कारोबार और विदेश भेजी गई रकम के बीच स्पष्ट संबंध नहीं मिला। इसके बाद विभाग ने 18 अगस्त से देशभर में विशेष सत्यापन अभियान शुरू किया है। जांच में 394 संस्थाएं और 36 पेशेवर शामिल हैं। इनमें सीमावर्ती राज्यों की 117 संस्थाएं भी हैं।
विभाग ने इन संस्थाओं को केवल विदेशी रकम भेजने के आधार पर संदिग्ध नहीं माना है, बल्कि उनके कारोबार, आयकर रिकॉर्ड, रकम भेजने के उद्देश्य और उससे जुड़े दस्तावेजों का मिलान किया जा रहा है। जांच का एक अहम हिस्सा उन पेशेवरों की भूमिका भी है, जिन्होंने इन विदेशी प्रेषणों से जुड़े प्रमाणपत्र जारी किए।
रिटर्न में कम कारोबार, विदेश में बड़ी रकम
प्रारंभिक सत्यापन में सामने आया कि कुछ संस्थाएं आयकर रिटर्न दाखिल नहीं कर रही थीं, जबकि कुछ ने रिटर्न में बेहद कम कारोबार दिखाया। इसके बावजूद उनके जरिए बड़ी मात्रा में धन विदेश भेजा गया। आयकर विभाग को इन लेनदेन में घोषित कारोबार और विदेश भेजी गई रकम के बीच सीधा संबंध नहीं मिला। रकम भेजने के लिए माल ढुलाई, सॉफ्टवेयर आयात और परामर्श सेवाओं के आयात जैसे उद्देश्य बताए गए थे, लेकिन कुछ मामलों में लेनदेन का वास्तविक स्वरूप इन दावों से मेल नहीं खाता पाया गया। जांच में यह भी सामने आया कि कुछ संस्थाएं आयकर रिकॉर्ड में दर्ज पते पर संचालित ही नहीं हो रही थीं। ऐसे मामलों ने विभाग के संदेह को और बढ़ाया है।
फर्जी ट्रस्ट की जांच से मिला विदेशी लेनदेन का सुराग
इस अभियान की पृष्ठभूमि में एक फर्जी धर्मार्थ ट्रस्ट समूह के खिलाफ हुई तलाशी भी है। इन ट्रस्टों पर फर्जी दान और योगदान के बदले फर्जी प्रविष्टियां करने का मामला सामने आया था। तलाशी के दौरान विदेशों में धन भेजने वाली संस्थाओं के एक नेटवर्क के संकेत मिले। इसके बाद विभाग ने खुफिया सूचनाओं और विदेश भेजे गए धन के आंकड़ों का व्यापक विश्लेषण किया। इसी प्रक्रिया में 394 संस्थाओं को सत्यापन के लिए चिन्हित किया गया। इनमें 117 संस्थाएं सीमावर्ती राज्यों में स्थित हैं।
कुछ पेशेवरों ने जारी किए बड़ी संख्या में प्रमाणपत्र
जांच का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू विदेशी रकम भेजने से पहले जारी होने वाले फॉर्म 15सीबी प्रमाणपत्र हैं। आंकड़ों के विश्लेषण में विभाग को पता चला कि बड़ी संख्या में ऐसे प्रमाणपत्र अपेक्षाकृत कम संख्या में पेशेवरों ने जारी किए। दूसरी ओर, विदेश भेजी गई रकम का बड़ा हिस्सा भी कुछ चुनिंदा संस्थाओं के जरिए गया। इसी पैटर्न के आधार पर 36 पेशेवरों को भी सत्यापन अभियान में शामिल किया गया है। हालांकि किसी पेशेवर को जांच के दायरे में लिए जाने का अर्थ यह नहीं है कि उसके खिलाफ गड़बड़ी साबित हो गई है। विभाग यह जांच रहा है कि प्रमाणपत्र जारी करने से पहले संबंधित लेनदेन और दस्तावेजों की जरूरी पड़ताल की गई थी या नहीं।
फॉर्म 15सीबी में चार्टर्ड अकाउंटेंट की भूमिका अहम
आयकर नियम, 1962 के नियम 37बीबी के तहत विदेश में धन भेजने से जुड़े मामलों में फॉर्म 15सीबी की भूमिका अहम होती है। प्रमाणपत्र जारी करने वाले चार्टर्ड अकाउंटेंट को संबंधित लेनदेन की कर देयता और उससे जुड़े रिकॉर्ड का परीक्षण करना होता है। विभाग ने फॉर्म 15सीबी और नए आयकर नियमों के तहत संबंधित फॉर्म 146 जारी करने वाले पेशेवरों से अधिक सावधानी, सतर्कता और पेशेवर विवेक की अपेक्षा की है। विदेशी प्रेषण को प्रमाणित करने से पहले लेनदेन की प्रकृति, उद्देश्य और उससे जुड़े तथ्यों की पर्याप्त जांच जरूरी है।
जांच अब रकम से आगे पूरी कड़ी पर
इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड अकाउंटेंट्स ऑफ इंडिया की सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल के सदस्य अंकुर गोयल के मुताबिक, विभाग का यह अभियान विदेशी रकम भेजने वाली संस्थाओं के साथ उनके पीछे मौजूद लोगों और प्रमाणपत्र जारी करने वाले पेशेवरों की भूमिका को समझने पर केंद्रित है। उनके अनुसार, प्रमाणपत्र जारी करने से पहले संबंधित दस्तावेजों और लेनदेन की पूरी जांच जरूरी है, ताकि बाद में किसी तरह का विवाद न हो। विभाग अब इस कार्रवाई में सिर्फ यह नहीं देख रहा कि कितनी रकम विदेश भेजी गई, बल्कि यह भी जांच रहा है कि रकम भेजने वाली संस्था का कारोबार कितना था, पैसा किस उद्देश्य से गया, वास्तविक लेनदेन क्या था और उसे प्रमाणित करने की प्रक्रिया कितनी ठोस थी।
यही वजह है कि 394 संस्थाओं और 36 पेशेवरों का सत्यापन अभियान विदेशी प्रेषण की पूरी श्रृंखला की पड़ताल के तौर पर देखा जा रहा है। जांच पूरी होने के बाद ही साफ होगा कि मामलों में सिर्फ रिकॉर्ड और वास्तविक कारोबार के बीच असंगति थी या इसके पीछे कोई बड़ा वित्तीय नेटवर्क भी सक्रिय था।


