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गेहूं के भूसे से तैयार जेल मुंहासों के बैक्टीरिया को करेगा काबू

CSJMU कानपुर के छात्र का शोध अंतरराष्ट्रीय जर्नल में प्रकाशित, भूसे से तैयार सामग्री और पोस्टबायोटिक्स से बने जेल ने प्रयोगशाला में मुंहासों से जुड़े बैक्टीरिया की बढ़त रोकने के संकेत दिए

भारत 19

कानपुर। खेत में गेहूं की फसल कटने के बाद बचने वाला भूसा अब सिर्फ कृषि कचरा नहीं रह गया है। छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय (CSJMU), कानपुर के एक शोध में इसी भूसे से ऐसी सामग्री तैयार की गई है, जिसका प्रयोग मुंहासों से जुड़े बैक्टीरिया को नियंत्रित करने के लिए किया गया। एमएससी बायोटेक्नोलॉजी के छात्र सुब्रत पाण्डेय का यह शोध अंतरराष्ट्रीय जर्नल Frontiers in Materials में प्रकाशित हुआ है। शोध में गेहूं के भूसे से निकाले गए लिग्निन के बेहद छोटे कणों, एक खास तरह के पोस्ट बायोटिक्स और एलोवेरा को मिलाकर जेल तैयार किया गया। प्रयोगशाला में किए गए परीक्षणों में इस जेल ने मुंहासों से जुड़े प्रमुख बैक्टीरिया Cutibacterium acnes की बढ़त को रोकने की क्षमता दिखाई।

भूसे से निकाली गई सामग्री से बना जेल

यह शोध CSJMU के School of Life Science and Biotechnology में एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. राकेश कुमार शर्मा के निर्देशन में हुआ। शोधकर्ताओं ने सबसे पहले गेहूं के भूसे में मौजूद लिग्निन को अलग किया। इसके बाद उसे बेहद छोटे कणों यानी नैनोपार्टिकल्स में बदला गया। इन कणों को Lactiplantibacillus plantarum नामक बैक्टीरिया से मिले पोस्टबायोटिक्स के साथ मिलाया गया। आसान भाषा में कहें तो पोस्टबायोटिक्स ऐसे उपयोगी पदार्थ हैं, जो अच्छे बैक्टीरिया की गतिविधियों से बनते हैं। इसके बाद इस मिश्रण को एलोवेरा आधारित जेल में तैयार किया गया।

मुंहासों से जुड़े बैक्टीरिया पर हुआ परीक्षण

शोधकर्ताओं ने तैयार जेल का प्रयोगशाला में Cutibacterium acnes पर परीक्षण किया। यह उन बैक्टीरिया में शामिल है, जिनका मुंहासों से संबंध माना जाता है। परीक्षण के दौरान जेल ने इस बैक्टीरिया की बढ़त को नियंत्रित करने की क्षमता दिखाई। शोधकर्ताओं ने यह भी देखा कि इसका असर बायोफिल्म पर कैसा है। बायोफिल्म को आसान भाषा में बैक्टीरिया की ऐसी परत समझ सकते हैं, जिसमें बैक्टीरिया एक जगह चिपककर टिके रहते हैं और उन्हें हटाना अपेक्षाकृत मुश्किल हो सकता है। अध्ययन में तैयार जेल ने बायोफिल्म बनने की प्रक्रिया को भी नियंत्रित करने के संकेत दिए।

एक शोध, दो फायदे की संभावना

इस प्रयोग की खास बात सिर्फ मुंहासों से जुड़े बैक्टीरिया पर इसका असर नहीं है। शोध में ऐसे गेहूं के भूसे का इस्तेमाल किया गया, जिसे आमतौर पर कृषि अपशिष्ट माना जाता है। यानी गेहूं के भूसे से उपयोगी सामग्री तैयार करने की संभावना भी सामने आई है। दूसरी ओर, इसी सामग्री को पोस्टबायोटिक्स और एलोवेरा के साथ मिलाकर त्वचा संबंधी समस्या के लिए इस्तेमाल करने का रास्ता तलाशा गया है। यही वजह है कि शोध कृषि अपशिष्ट के बेहतर इस्तेमाल और जैव-प्रौद्योगिकी, दोनों के लिहाज से महत्वपूर्ण है।

एंटीबायोटिक के बिना इलाज की उम्मीद, लेकिन अभी इंतजार

शोध के नतीजे उत्साह बढ़ाने वाले जरूर हैं, लेकिन इन्हें अभी मुंहासों का इलाज नहीं कहा जा सकता। फिलहाल यह प्रयोग प्रयोगशाला स्तर पर किया गया है। यानी जेल का असर मानव शरीर पर नहीं, बल्कि नियंत्रित परिस्थितियों में बैक्टीरिया पर देखा गया है। इसे मरीजों के इलाज में इस्तेमाल करने से पहले यह देखना होगा कि जेल त्वचा के लिए कितना सुरक्षित है, कितनी मात्रा में इस्तेमाल किया जा सकता है, इसके घटक त्वचा पर कैसे काम करते हैं और वास्तविक मरीजों में इसका असर कैसा रहता है। इसके लिए आगे जानवरों और फिर मनुष्यों पर जरूरी परीक्षण करने होंगे।

अंतरराष्ट्रीय जर्नल में प्रकाशित हुआ शोध
सुब्रत पाण्डेय का शोध Frontiers in Materials में प्रकाशित हुआ है। उन्होंने अपनी सफलता का श्रेय परिवार, मित्रों और शिक्षकों को दिया। उनका कहना है कि यह उपलब्धि ग्रामीण और छोटे शहरों से आने वाले उन युवाओं के लिए भी प्रेरणा है, जो सीमित संसाधनों के बावजूद विज्ञान और शोध के क्षेत्र में आगे बढ़ने का सपना देखते हैं।

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