- पार्टी कार्यकर्ताओं ने बांकीपुर और दतिया के चुनाव नतीजों से दे दिया संदेश कि सम्मान से बढ़कर नहीं है निष्ठा
- बिहार और मध्य प्रदेश के उपचुनावों ने संगठन बनाम नेतृत्व की खाई उजागर की, यूपी में टिकट बंटवारे, कार्यकर्ता असंतोष और लोकसभा 2024 के सबक ने बढ़ाई भाजपा की चुनौती
भारत 19 न्यूज
राजीव सक्सेना/ कानपुर। उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनाव में अभी कई महीने बाकी हैं, लेकिन बिहार की बांकीपुर और मध्य प्रदेश की दतिया सीट के नतीजों ने भारतीय जनता पार्टी के सामने एक बड़ा राजनीतिक सवाल खड़ा कर दिया है—क्या संगठन की नाराजगी अब चुनाव जिताने के बजाय हराने लगी है?
दोनों राज्यों की घटनाएं अलग-अलग जरूर हैं, लेकिन संदेश एक जैसा है। यदि कार्यकर्ता और स्थानीय नेतृत्व की अनदेखी होगी तो सबसे मजबूत मानी जाने वाली सीट भी हाथ से निकल सकती है। यही वजह है कि इन नतीजों को उत्तर प्रदेश भाजपा भी बेहद गंभीरता से देख रही है।
बांकीपुर ने तोड़ दिया ‘अजेय गढ़’ का मिथक
पटना की शहरी बांकीपुर सीट वर्षों से भाजपा का मजबूत किला मानी जाती रही है। यहां से लगातार पांच बार जीत दर्ज करने वाले नितिन नवीन के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद हुए उपचुनाव को भाजपा ने प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया था। केंद्र और राज्य—दोनों सरकारों की पूरी ताकत चुनाव में झोंकी लेकिन चुनाव परिणाम ने एक अलग ही कहानी लिख दी।
चुनाव प्रचार के दौरान भाजपा के एक वरिष्ठ नेता का यह बयान कि “पार्टी यहां किसी कुत्ते-बिल्ली को भी टिकट दे दे तो कार्यकर्ता जिता देंगे” कार्यकर्ताओं को नागवार गुजरा। वर्षों से कार्यकर्ता को यही समझाया जाता रहा कि “प्रत्याशी नहीं, कमल का निशान देखिए।” इस बार कार्यकर्ताओं ने मानो संदेश दे दिया कि सम्मान के बिना निष्ठा टिकाऊ नहीं होती।
सबसे बड़ा राजनीतिक संदेश यह रहा कि पार्टी का शीर्ष नेतृत्व अपने प्रभाव वाले बूथों पर भी अपेक्षित बढ़त नहीं दिला सका। भाजपा की बूथ प्रबंधन वाली राजनीति के लिए यह प्रतीकात्मक झटका माना जा रहा है।
दतिया में भी फूटा टिकट बंटवारे का असंतोष
मध्य प्रदेश की दतिया सीट पर भी कहानी लगभग यही रही। वरिष्ठ नेता नरोत्तम मिश्रा ने टिकट चयन को लेकर सार्वजनिक असहमति जताई। समर्थक सड़कों पर उतर आए। परिणाम यह हुआ कि संगठन की अंदरूनी नाराजगी विपक्ष के लिए अवसर बन गई।
इन दोनों घटनाओं ने भाजपा के सामने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या टिकट चयन में स्थानीय समीकरणों और कार्यकर्ताओं की राय की अनदेखी अब भारी पड़ने लगी है?
यूपी के लिए इसलिए ज्यादा अहम हैं ये संकेत
उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव से पहले टिकट को लेकर हर सीट पर कई दावेदार सक्रिय हैं। हाल ही में संगठन की नई टीम घोषित होने के बाद भी कई जिलों में असंतोष की चर्चा रही। सार्वजनिक तौर पर विरोध भले कम दिखे, लेकिन अंदरखाने यह शिकायत सुनाई देती है कि संगठन में चयन योग्यता से ज्यादा समीकरणों के आधार पर हुआ।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि यही स्थिति टिकट वितरण तक पहुंची तो स्थानीय असंतोष चुनावी नतीजों को प्रभावित कर सकता है।
2024 का संदेश भाजपा भूल नहीं सकती
लोकसभा चुनाव 2024 में उत्तर प्रदेश में भाजपा को अपेक्षा से कम सीटें मिलीं, जबकि समाजवादी पार्टी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी। विपक्ष ने इसे सामाजिक समीकरणों और भाजपा के खिलाफ स्थानीय नाराजगी का परिणाम बताया।
भाजपा ने बाद में संगठनात्मक समीक्षा भी की, लेकिन राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि यदि कार्यकर्ता असंतोष दूर नहीं हुआ तो विधानसभा चुनाव में चुनौती और कठिन हो सकती है।
सीसामऊ उपचुनाव भी देता है संकेत
कानपुर की सीसामऊ विधानसभा सीट का उपचुनाव भी भाजपा के लिए ऐसा ही उदाहरण माना गया। टिकट के कई दावेदारों के बीच पुराने चेहरे को मैदान में उतारने से स्थानीय स्तर पर असंतोष की चर्चा रही। सरकार के मंत्री, सांसद और विधायक पूरी ताकत से प्रचार में उतरे, लेकिन पार्टी जीत दर्ज नहीं कर सकी।
यह चुनाव भी इस बात की याद दिलाता है कि केवल संगठनात्मक शक्ति ही पर्याप्त नहीं होती, बल्कि स्थानीय कार्यकर्ता का मनोबल भी उतना ही महत्वपूर्ण होता है।
कार्यकर्ता की सबसे बड़ी शिकायत—सम्मान
भाजपा का सबसे बड़ा संगठनात्मक आधार उसका कार्यकर्ता रहा है। लेकिन पार्टी के भीतर ही अब यह आवाज सुनाई देती है कि कार्यकर्ता को केवल चुनावी मशीन नहीं समझा जाना चाहिए।
कई कार्यकर्ताओं की शिकायत है कि चुनाव के समय उन्हें “देवतुल्य कार्यकर्ता” कहा जाता है, लेकिन चुनाव खत्म होते ही उनकी बात सुनने वाला कोई नहीं रहता। यदि यह भावना मजबूत होती है तो उसका असर मतदान तक पहुंच सकता है।
युवा और सवर्ण वोटर भी चुनौती
भाजपा का पारंपरिक सवर्ण आधार और 2014 से पार्टी के साथ जुड़ा युवा वर्ग, दोनों को लेकर विपक्ष लगातार सवाल उठा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा इन वर्गों को साधने के लिए नए राजनीतिक और संगठनात्मक संदेश देने की तैयारी कर रही है। दूसरी ओर सरकार विकास, कानून-व्यवस्था, बुनियादी ढांचे, निवेश और कल्याणकारी योजनाओं को अपनी सबसे बड़ी ताकत के रूप में सामने रख रही है।
2027 की असली परीक्षा संगठन की होगी
बांकीपुर और दतिया की हार केवल दो सीटों का चुनावी परिणाम नहीं हैं। उन्होंने यह संदेश दिया है कि यदि संगठन और कार्यकर्ता नेतृत्व से भावनात्मक रूप से नहीं जुड़ेंगे तो मजबूत राजनीतिक किले भी कमजोर पड़ सकते हैं।
उत्तर प्रदेश में भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल विपक्ष नहीं, बल्कि अपने संगठन की ऊर्जा, कार्यकर्ताओं के विश्वास और टिकट वितरण के संतुलन को बनाए रखना भी होगी। दूसरी ओर समाजवादी पार्टी लोकसभा चुनाव की सफलता को विधानसभा तक दोहराने की कोशिश करेगी।
ऐसे में 2027 का चुनाव केवल सरकार के कामकाज का जनमत संग्रह नहीं होगा, बल्कि यह भी तय करेगा कि चुनाव जिताने में नेतृत्व का चेहरा बड़ा है या कार्यकर्ता का मन।


