- निर्धारित सीमा से अधिक आरक्षण देकर दाखिले का मामला; समाज कल्याण विभाग के अपर मुख्य सचिव तलब, सरकार के पुराने आश्वासन पर अदालत ने उठाए सवाल
भारत 19/ लखनऊ। उत्तर प्रदेश के चार सरकारी मेडिकल कॉलेजों में आरक्षण की निर्धारित सीमा से अधिक दाखिले दिए जाने के मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने राज्य सरकार के रुख पर नाराजगी जताई है। अदालत ने समाज कल्याण विभाग के अपर मुख्य सचिव को संबंधित अभिलेखों के साथ मंगलवार को पेश होने का निर्देश दिया। न्यायमूर्ति राजन रॉय और न्यायमूर्ति मंजीव शुक्ला की खंडपीठ ने सवाल उठाया कि जब सरकार पिछले वर्ष शैक्षिक सत्र 2026-27 से आरक्षण कानून लागू करने का आश्वासन दे चुकी थी, तो निर्धारित सीमा से अधिक आरक्षण देकर दाखिले देने की स्थिति कैसे बनी।
चार मेडिकल कॉलेजों में 91 प्रतिशत तक आरक्षण का विवाद
यह मामला अंबेडकरनगर, कन्नौज, सहारनपुर और जालौन के सरकारी मेडिकल कॉलेजों में एमबीबीएस दाखिलों से जुड़ा है। इन कॉलेजों में नीट-यूजी दाखिलों के लिए करीब 91 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था को हाईकोर्ट ने स्थगित कर दिया था। अदालत ने अन्य सरकारी मेडिकल कॉलेजों में लागू आरक्षण प्रतिशत के आधार पर काउंसलिंग जारी रखने की अनुमति दी थी। हालांकि, इस प्रक्रिया से होने वाले दाखिले मुकदमे के अंतिम परिणाम के अधीन रखे गए थे।
आरक्षण कानून में 50 प्रतिशत की सीमा
उत्तर प्रदेश शैक्षणिक संस्थानों में प्रवेश के लिए अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के आरक्षण संबंधी कानून, 2006 के तहत क्रमशः 21 प्रतिशत, दो प्रतिशत और 27 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान है। इस तरह इन तीन श्रेणियों का कुल आरक्षण 50 प्रतिशत होता है। हाईकोर्ट के सामने सवाल यह है कि चारों कॉलेजों में इस वैधानिक व्यवस्था के बजाय अधिक आरक्षण देने का आधार क्या था। इससे पहले भी अदालत ने राज्य सरकार की ओर से जारी व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए निर्धारित सीमा के अनुरूप प्रवेश प्रक्रिया संचालित करने के निर्देश दिए थे।
विभागीय मतभेद पर सरकार से जवाब तलब
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार के वकील ने कहा कि समाज कल्याण विभाग पिछले वर्ष अदालत में दिए गए आश्वासन से सहमत नहीं था। इस पर खंडपीठ ने सवाल किया कि यदि विभागों के बीच मतभेद था, तो इसकी जानकारी अदालत को पहले क्यों नहीं दी गई। अदालत ने यह भी पूछा कि सरकार ने पिछले शैक्षिक सत्र में अदालत के आदेश का लाभ क्यों लिया, जबकि अब आश्वासन को लेकर विभागीय असहमति की बात कही जा रही है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि राज्य सरकार एक इकाई है। विभागों के बीच मतभेद का हवाला देकर न्यायिक आदेशों और अदालत में दिए गए आश्वासन का पालन नहीं करने को उचित नहीं ठहराया जा सकता। अदालत ने पिछली कार्यवाही से संबंधित रिकॉर्ड भी पेश करने का निर्देश दिया है।
दाखिलों पर आगे की सुनवाई से तय होगी स्थिति
अदालत ने समाज कल्याण विभाग के अपर मुख्य सचिव को 13 अक्टूबर को संबंधित रिकॉर्ड के साथ उपस्थित होने के निर्देश दिए थे। उपलब्ध रिपोर्टों में इस सुनवाई के बाद का अंतिम आदेश या अधिकारी के जवाब का विस्तृत विवरण नहीं मिला है। इसलिए फिलहाल यह कहना उचित नहीं होगा कि अदालत ने दाखिले रद्द करने या किसी अधिकारी के खिलाफ अवमानना की कार्यवाही शुरू करने का अंतिम फैसला सुना दिया है। मामले का अगला घटनाक्रम इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसका सीधा संबंध चार सरकारी मेडिकल कॉलेजों में एमबीबीएस प्रवेश प्रक्रिया और आरक्षण कानून के अनुपालन से है। सरकार को अदालत के सामने यह स्पष्ट करना होगा कि निर्धारित सीमा से अधिक आरक्षण देने की व्यवस्था किस आधार पर बनाई गई और पूर्व में दिए गए आश्वासन का पालन क्यों नहीं हुआ।

