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खाद की बढ़ती वैश्विक कीमतों से भारत पर दबाव

  • भारत का उर्वरक आयात खर्च 14.5 अरब डॉलर के पार, होर्मुज संकट से आपूर्ति और ढुलाई महंगी होने का जोखिम, किसानों को सस्ती खाद देने के लिए बढ़ सकता है सरकारी सब्सिडी का बोझ

भारत 19 डेस्क। पश्चिम एशिया में संघर्ष और होर्मुज जलडमरूमध्य से व्यापार बाधित होने का असर वैश्विक खाद बाजार पर दबाव बढ़ा रहा है। भारत के लिए यह स्थिति इसलिए अहम है, क्योंकि देश यूरिया, डीएपी और पोटाश जैसे उर्वरकों के साथ इनके उत्पादन में इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल का भी आयात करता है। वित्त वर्ष 2025-26 में भारत ने 14.5 अरब डॉलर से अधिक के उर्वरक आयात किए। अंतरराष्ट्रीय कीमतें ऊंची रहने और समुद्री ढुलाई महंगी होने पर खाद की आपूर्ति लागत बढ़ सकती है। इसका असर किसानों को सस्ती खाद उपलब्ध कराने के सरकारी प्रयासों और सब्सिडी बजट पर पड़ने का जोखिम है। हालांकि, वैश्विक बाजार में कीमतें बढ़ने से भारत में किसानों के लिए खाद की खुदरा कीमतें तत्काल बढ़ना तय नहीं है।

भारत का खाद आयात खर्च 14.5 अरब डॉलर के पार

भारत ने वित्त वर्ष 2025-26 में करीब 2.82 करोड़ टन उर्वरकों का आयात किया, जिसकी कीमत 14.5 अरब डॉलर से अधिक थी। इसमें 1.12 करोड़ टन यूरिया, 64 लाख टन डीएपी और 37 लाख टन म्यूरेट ऑफ पोटाश (एमओपी) शामिल थे। उर्वरकों के आयात पर खर्च पिछले वित्त वर्ष के 8.2 अरब डॉलर से काफी अधिक रहा। भारत की निर्भरता केवल तैयार खाद के आयात तक सीमित नहीं है।

उर्वरक बनाने के लिए इस्तेमाल होने वाले फॉस्फोरिक एसिड, रॉक फॉस्फेट, अमोनिया, सल्फर और सल्फ्यूरिक एसिड जैसे कच्चे माल का भी बड़ा हिस्सा विदेशों से आता है। तैयार उर्वरकों के साथ उत्पादन में इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल को जोड़ने पर वित्त वर्ष 2025-26 में भारत का कुल उर्वरक आयात खर्च करीब 27.2 अरब डॉलर रहा। यही निर्भरता वैश्विक संकट के दौरान भारत के लिए चुनौती बनती है। कच्चे माल की कीमत बढ़ने पर घरेलू उत्पादन करने वाली कंपनियों की लागत भी बढ़ सकती है।

होर्मुज संकट से उर्वरक आपूर्ति पर जोखिम

होर्मुज जलडमरूमध्य पश्चिम एशिया के ऊर्जा और समुद्री व्यापार का प्रमुख मार्ग है। इस क्षेत्र में संघर्ष बढ़ने से जहाजों की आवाजाही, बीमा प्रीमियम और माल ढुलाई की लागत प्रभावित हो सकती है। इसका असर उन उर्वरकों और कच्चे माल पर भी पड़ सकता है, जिनकी आपूर्ति खाड़ी क्षेत्र या उससे जुड़े समुद्री मार्गों से होती है। यूरिया उत्पादन में प्राकृतिक गैस प्रमुख कच्चा माल है। गैस की कीमत बढ़ने पर यूरिया बनाने की लागत बढ़ सकती है।

वहीं, डीएपी और अन्य फॉस्फेट उर्वरकों के उत्पादन में इस्तेमाल होने वाले फॉस्फोरिक एसिड, रॉक फॉस्फेट और सल्फर की आपूर्ति प्रभावित होने पर आयात और घरेलू उत्पादन दोनों महंगे पड़ सकते हैं। हालांकि, हर उर्वरक की आपूर्ति और कीमत पर असर समान नहीं होगा। यह संबंधित कच्चे माल के स्रोत, उपलब्ध भंडार, वैकल्पिक आपूर्तिकर्ताओं और समुद्री मार्गों की स्थिति पर निर्भर करेगा।

महंगी खाद का असर सरकारी सब्सिडी पर पड़ सकता है

केंद्र सरकार ने केंद्रीय बजट 2026-27 में उर्वरक विभाग के लिए लगभग 1.71 लाख करोड़ रुपये का शुद्ध बजटीय आवंटन किया है। इसका उद्देश्य किसानों को सस्ती खाद उपलब्ध कराने, घरेलू उत्पादन को समर्थन देने और आयात के जरिए मांग तथा उपलब्धता के बीच अंतर पूरा करने में मदद करना है। यूरिया की कीमत सरकार नियंत्रित करती है। उत्पादन और आयात की लागत तथा किसानों से मिलने वाली कीमत के बीच अंतर की भरपाई सब्सिडी के जरिए की जाती है।

डीएपी और अन्य फॉस्फेट-पोटाश उर्वरकों के मामले में भी सरकार पोषक तत्व आधारित सब्सिडी के माध्यम से किसानों के लिए कीमतें वहनीय रखने का प्रयास करती है। रॉयटर्स के अनुसार वैश्विक कीमतों में तेजी और ईरान युद्ध से आपूर्ति शृंखला प्रभावित होने के बीच उर्वरक मंत्रालय ने चालू वित्त वर्ष के लिए सब्सिडी आवंटन दोगुना करने का अनुरोध किया था।

मंत्रालय से अनुरोध तो हुआ पर बजट का बंदोबस्त नहीं हुआ। वैश्विक कीमतें लंबे समय तक ऊंची बनी रहती हैं, तो किसानों को सस्ती खाद उपलब्ध कराने के लिए सरकार को अतिरिक्त वित्तीय संसाधनों की जरूरत पड़ सकती है। इससे उर्वरक सब्सिडी और अन्य सरकारी खर्चों के बीच संतुलन बनाए रखने की चुनौती बढ़ सकती है।

वैकल्पिक आयात समझौतों से आपूर्ति संभालने की कोशिश

भारत ने उर्वरकों की नियमित उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए घरेलू उत्पादन और दीर्घकालीन आयात समझौतों पर जोर दिया है। रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय के 21 जुलाई 2026 के बयान के मुताबिक, भारतीय कंपनियों ने सऊदी अरब, जॉर्डन, मोरक्को और रूस जैसे देशों के साथ डीएपी, टीएसपी, एमओपी और एनपीके उर्वरकों की आपूर्ति के लिए समझौते किए हैं। इन व्यवस्थाओं का उद्देश्य वैश्विक अनिश्चितता के बीच आपूर्ति शृंखला को मजबूत रखना है। 

सरकार फसल सीजन से पहले उर्वरकों की जरूरत का आकलन करती है और राज्यों के साथ समन्वय कर घरेलू उत्पादन, आयात तथा वितरण की योजना बनाती है। यह व्यवस्था अचानक पैदा होने वाली कमी का जोखिम घटा सकती है। लेकिन लंबे समय तक समुद्री व्यापार बाधित रहने या कच्चे माल की कीमतें ऊंची बने रहने पर आयात की लागत बढ़ने की आशंका बनी रहती है।

किसानों की लागत और खाद्य कीमतों पर भी नजर

उर्वरकों की वैश्विक कीमतों में तेजी का पहला असर आयातकों, विनिर्माताओं और सरकारी सब्सिडी के खर्च पर पड़ सकता है। यदि आपूर्ति बाधित होती है या किसानों को समय पर खाद उपलब्ध नहीं हो पाती, तो खेती की लागत और फसल उत्पादन पर भी असर पड़ने का जोखिम है। खाद की लागत बढ़ने से खाद्य कीमतें तुरंत बढ़ेंगी, ऐसा निष्कर्ष निकालना सही नहीं होगा। इसका वास्तविक असर फसल, मौसम, सिंचाई, खाद के इस्तेमाल, उत्पादन और बाजार में उपलब्धता जैसे कई कारकों पर निर्भर करेगा। फिर भी लंबे समय तक महंगी खाद और सीमित आपूर्ति कृषि लागत के लिए चुनौती बन सकती है।

भारत के लिए प्राथमिकता पर्याप्त उर्वरक भंडार बनाए रखना, आयात के वैकल्पिक स्रोत तैयार रखना और किसानों को सस्ती खाद उपलब्ध कराने की व्यवस्था को मजबूत करना है। होर्मुज क्षेत्र में समुद्री व्यापार की स्थिति और अंतरराष्ट्रीय उर्वरक कीमतों का रुख आने वाले महीनों में आयात लागत तथा सब्सिडी की जरूरत पर असर डाल सकता है।

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