- जहाजों की आवाजाही दो महीने से अधिक के निचले स्तर पर, भारत के 88.6% कच्चे तेल की जरूरत आयात से पूरी; आपूर्ति में लंबा व्यवधान बढ़ा सकता है तेल आयात बिल, रुपये और महंगाई पर दबाव
भारत 19/ नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में बढ़ते सैन्य तनाव के बीच होर्मुज जलडमरूमध्य से जहाजों की आवाजाही में गिरावट ने भारत की ऊर्जा सुरक्षा से जुड़ी चुनौतियां बढ़ा दी हैं। भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरत का करीब 89 प्रतिशत आयात से पूरा करता है। ऐसे में खाड़ी क्षेत्र से आपूर्ति बाधित होने या टैंकरों की ढुलाई महंगी पड़ने पर देश का तेल आयात बिल बढ़ सकता है। इसका असर विदेशी मुद्रा खर्च, रुपये की विनिमय दर और महंगाई पर भी पड़ने का जोखिम है। हालांकि, पेट्रोल-डीजल की घरेलू कीमतों में तत्काल बढ़ोतरी तय नहीं है।
होर्मुज से घटा जहाजों का आवागमन, तेल आपूर्ति पर जोखिम
रॉयटर्स की 11 अक्टूबर की रिपोर्ट के मुताबिक, टैंकरों पर हमलों और बढ़ते सैन्य तनाव के बीच होर्मुज जलडमरूमध्य से जहाजों की आवाजाही दो महीने से अधिक के निचले स्तर पर पहुंच गई। इससे पहले 8 अक्टूबर की रिपोर्ट में समुद्री रास्ते से कच्चे तेल की आवाजाही घटकर करीब 1.01 करोड़ बैरल प्रतिदिन रहने की जानकारी दी गई थी, जो युद्धकालीन साप्ताहिक उच्च स्तर से 27 प्रतिशत कम थी। होर्मुज जलडमरूमध्य फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी और अरब सागर से जोड़ता है। अमेरिकी ऊर्जा सूचना प्रशासन के अनुसार, 2025 की पहली छमाही में इस रास्ते से प्रतिदिन औसतन 2.09 करोड़ बैरल तेल गुजरा, जो वैश्विक पेट्रोलियम तरल खपत का करीब 20 प्रतिशत था। इस मार्ग से गुजरने वाले कच्चे तेल और कंडेनसेट का लगभग 89 प्रतिशत एशियाई बाजारों के लिए था। भारत भी इसी क्षेत्र से तेल खरीदने वाले प्रमुख देशों में शामिल है।
भारत के आयात बिल और महंगाई पर पड़ सकता है असर
पेट्रोलियम योजना एवं विश्लेषण प्रकोष्ठ के आंकड़ों के मुताबिक, वित्त वर्ष 2025-26 में अप्रैल से जनवरी के दौरान भारत की कच्चे तेल पर आयात निर्भरता 88.6 प्रतिशत रही। इसी अवधि में आयातित कच्चे तेल का 46.9 प्रतिशत पश्चिम एशिया से आया। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम ऊंचे रहने पर भारत को समान मात्रा में तेल खरीदने के लिए अधिक विदेशी मुद्रा खर्च करनी पड़ती है। इससे आयात बिल और चालू खाते के घाटे पर दबाव बढ़ सकता है। महंगे तेल का असर परिवहन, माल ढुलाई और उत्पादन लागत तक पहुंचने पर अन्य वस्तुओं की कीमतों में भी बढ़ोतरी का जोखिम रहता है। इसका असर केवल पेट्रोल-डीजल तक सीमित नहीं है। पश्चिम एशिया से आने वाली गैस और एलपीजी की आपूर्ति में व्यवधान होने पर घरेलू जरूरतों, उद्योगों और व्यावसायिक उपभोक्ताओं की लागत भी प्रभावित हो सकती है।
सितंबर में खाड़ी देशों से बढ़ी थी भारत की तेल खरीद
होर्मुज में मौजूदा तनाव के बीच भारत की हालिया तेल खरीद का रुझान भी महत्वपूर्ण है। द इंडियन एक्सप्रेस की 3 अक्टूबर की रिपोर्ट के अनुसार, सितंबर में इराक, सऊदी अरब, कुवैत और कतर से भारत को होने वाली तेल आपूर्ति बढ़ी। जहाज से जहाज में तेल स्थानांतरित करने की व्यवस्था के जरिए भी खाड़ी क्षेत्र से कच्चे तेल की आवाजाही जारी रही। इसी दौरान रूस से भारत का आयात लगातार दूसरे महीने घटा था। खाड़ी देशों से आपूर्ति में बढ़ोतरी भारतीय रिफाइनरियों के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे उन्हें मध्य पूर्व के कच्चे तेल तक पहुंच मिलती है। लेकिन समुद्री रास्ते पर जोखिम बढ़ने से जहाजों की उपलब्धता, बीमा प्रीमियम और माल ढुलाई की लागत प्रभावित हो सकती है। लंबे व्यवधान की स्थिति में रिफाइनरियों को वैकल्पिक स्रोतों से तेल जुटाने की चुनौती का सामना करना पड़ सकता है।
वैकल्पिक स्रोतों से आपूर्ति संभालने की रणनीति अहम
भारत ने समय के साथ कच्चे तेल की खरीद के स्रोतों में विविधता बढ़ाई है। सरकार ने मार्च 2026 में संसद में बताया था कि भारत 40 देशों से कच्चा तेल खरीदता है और होर्मुज से इतर मार्गों से भी आपूर्ति हासिल करने की व्यवस्था है। सरकार ने उस समय ऊर्जा आपूर्ति की निगरानी और पेट्रोलियम उत्पादों की उपलब्धता सुनिश्चित करने के उपायों की जानकारी दी थी। हालांकि, वैकल्पिक स्रोतों से खरीद समुद्री मार्ग पर लंबे व्यवधान की पूरी भरपाई नहीं कर सकती। सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात की पाइप लाइनें होर्मुज से बाहर तेल पहुंचाने के विकल्प देती हैं, लेकिन उनकी क्षमता सीमित है। ऐसे में भारत के लिए आपूर्ति मार्गों की सुरक्षा, पर्याप्त भंडार, अलग-अलग देशों से खरीद और आयात लागत पर नियंत्रण महत्वपूर्ण रहेगा।
पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर तत्काल असर तय नहीं
कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में बढ़ोतरी घरेलू ईंधन बाजार के लिए दबाव पैदा कर सकती है, लेकिन इसका असर तुरंत और समान अनुपात में दिखाई देना जरूरी नहीं है। पेट्रोल-डीजल की खुदरा कीमतें अंतरराष्ट्रीय दरों के साथ रुपये की विनिमय दर, करों, तेल विपणन कंपनियों की लागत और सरकारी फैसलों से भी प्रभावित होती हैं। भारत के लिए फिलहाल सबसे अहम चुनौती ऊर्जा की नियमित उपलब्धता बनाए रखने के साथ आयात लागत को नियंत्रित करना है। होर्मुज से जहाजों की आवाजाही कितनी जल्दी सामान्य होती है और पश्चिम एशिया से तेल की आपूर्ति किस स्तर पर बनी रहती है, इससे भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले असर की दिशा तय होगी।


