- दो दिवसीय कार्यशाला में आत्महत्या रोकथाम, सोशल मीडिया पर तुलना और आत्मसम्मान पर चर्चा, विशेषज्ञों ने मानसिक संकट के संकेत पहचानने और समय पर मदद लेने के बताए तरीके
भारत 19/ कानपुर। मोबाइल स्क्रीन पर बढ़ता समय, सोशल मीडिया पर दूसरों से तुलना और डिजिटल दुनिया में लगातार सक्रिय रहने का दबाव युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकता है। इसी चुनौती के प्रति विद्यार्थियों को जागरूक करने के लिए छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय (सीएसजेएमयू), कानपुर और एम्स, नई दिल्ली ने संयुक्त रूप से दो दिवसीय कार्यशाला आयोजित की। 9 और 10 अक्टूबर को हुई इस कार्यशाला का विषय ‘मन, मीडिया और मानसिक स्वास्थ्य: एक स्वस्थ डिजिटल पीढ़ी का निर्माण’ रहा। इसमें आत्महत्या रोकथाम, मानसिक स्वास्थ्य के वैज्ञानिक पहलुओं और डिजिटल लत से निपटने पर विशेषज्ञों ने महत्वपूर्ण सुझाव दिए।
कला, मानविकी एवं सामाजिक विज्ञान संकाय के नैदानिक मनोविज्ञान विभाग की ओर से आयोजित कार्यशाला में विशेषज्ञों ने बताया कि तकनीक का इस्तेमाल आज जीवन का अहम हिस्सा है, लेकिन जरूरत से ज्यादा स्क्रीन इस्तेमाल और सोशल मीडिया पर लगातार सक्रिय रहने की आदत आत्म-छवि, आत्मसम्मान और भावनात्मक संतुलन को प्रभावित कर सकती है। उन्होंने मानसिक स्वास्थ्य के प्रति संवेदनशीलता, समय पर सहायता और तकनीक के संतुलित इस्तेमाल पर जोर दिया।
मानसिक संकट के संकेत पहचानना और समय पर मदद जरूरी
कार्यशाला के पहले दिन एम्स के मनोचिकित्सा विभाग में मानसिक स्वास्थ्य में तंत्रिका-संशोधन संबंधी उन्नत अनुसंधान एवं उत्कृष्टता केंद्र के प्रभारी डॉ. नंद कुमार ने बताया कि मानसिक स्वास्थ्य जैविक, मनोवैज्ञानिक और सामाजिक कारकों की परस्पर क्रिया से प्रभावित होता है। उन्होंने नींद, जैविक घड़ी और तनाव के बीच संबंधों पर भी प्रकाश डाला। एम्स के मनोवैज्ञानिक एवं वैश्विक एकीकृत स्वास्थ्य केंद्र के परियोजना प्रमुख हर्षुल अरोड़ा ने आत्महत्या रोकथाम में सहयोगी की भूमिका समझाई। उन्होंने संकट के चेतावनी संकेत पहचानने, परेशान व्यक्ति की बात संवेदनशीलता से सुनने, बिना पूर्वाग्रह संवाद करने और जरूरत पड़ने पर विशेषज्ञ की सहायता दिलाने पर जोर दिया। प्रश्नोत्तरी के जरिए मानसिक स्वास्थ्य और आत्महत्या से जुड़े मिथकों को दूर करने का प्रयास भी किया गया।
सोशल मीडिया पर दूसरों से तुलना, आत्मसम्मान पर असर
एम्स की वैज्ञानिक-सी डॉ. दीपिका दहिमा ने डिजिटल व्यक्तित्व और वास्तविक जीवन के बीच अंतर से पैदा होने वाले मनोवैज्ञानिक दबावों को समझाया। डॉ. नंद कुमार ने अत्यधिक स्क्रीन इस्तेमाल, सामाजिक तुलना और आत्मसम्मान के संबंधों पर चर्चा की। वहीं, प्रो. संदीप कुमार सिंह ने तकनीक के विवेकपूर्ण इस्तेमाल और विद्यार्थियों के समग्र विकास पर बल दिया। विशेषज्ञों की चर्चा में यह बात प्रमुखता से सामने आई कि डिजिटल दुनिया में दिखाई देने वाली छवि को वास्तविक जीवन से तुलना करने पर व्यक्ति के आत्मसम्मान और भावनात्मक स्थिति पर असर पड़ सकता है। तकनीक से पूरी तरह दूरी बनाने के बजाय उसका संतुलित और सोच-समझकर इस्तेमाल करना जरूरी है।
कविता और नाटक से विद्यार्थियों ने दिखाई डिजिटल लत की चुनौती
कार्यशाला में विद्यार्थियों ने कविता-पाठ और नाट्य प्रस्तुतियों के जरिए डिजिटल लत से जुड़ी चुनौतियों को सामने रखा। इन प्रस्तुतियों के माध्यम से डिजिटल व्यवहार और मानसिक स्वास्थ्य के बीच संबंधों पर ध्यान आकर्षित किया गया। डॉ. अमित कुमार मिश्रा सहित विभिन्न विभागों के शिक्षकों और बड़ी संख्या में विद्यार्थियों ने कार्यशाला में भाग लिया। आयोजन का संदेश रहा कि मानसिक स्वास्थ्य के प्रति संवेदनशीलता, संकट के समय सही सहयोग और डिजिटल दुनिया के साथ संतुलन स्वस्थ युवा पीढ़ी के निर्माण के लिए जरूरी हैं।


