- बरखा ऋतु संगीत उत्सव में राग मेघ और दुर्गा का जसरंगी संगम, कुलपति ने युवाओं से शास्त्रीय संगीत की विरासत आगे बढ़ाने का किया आह्वान
भारत 19/ कानपुर। छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय (सीएसजेएमयू) के रानी लक्ष्मीबाई सभागार में शनिवार की शाम बांसुरी के मधुर सुरों और शास्त्रीय रागों की जुगलबंदी से संगीतमय हो उठी। प्रख्यात बांसुरी वादक पं. रोनू मजूमदार की प्रस्तुति ने श्रोताओं को बांधे रखा, तो जसरंगी गायन में राग मेघ और राग दुर्गा के अनूठे संगम ने संगीत संध्या को खास बना दिया। ‘बरखा ऋतु’ संगीत उत्सव में कलाकारों ने भारतीय शास्त्रीय संगीत की समृद्ध परंपरा और उसकी विविधता की झलक पेश की।
पं. रोनू मजूमदार की बांसुरी ने बांधा समां
‘बरखा ऋतु: संगीत के उस्तादों के साथ एक संगीतमय उत्सव’ की प्रमुख प्रस्तुतियों में पं. रोनू मजूमदार का बांसुरी वादन आकर्षण का केंद्र रहा। बांसुरी से निकले मधुर स्वरों, रागों के सहज विस्तार और लयकारी ने सभागार में ऐसा वातावरण रचा कि श्रोता संगीत की धुनों में डूबे नजर आए। तबले पर मिथिलेश झा ने प्रभावशाली संगत से प्रस्तुति को और जीवंत बनाया।
जसरंगी गायन में राग मेघ और दुर्गा का संगम
संगीत संध्या में डॉ. अविनाश कुमार और डॉ. रिंदाना रहस्य की जसरंगी गायन प्रस्तुति भी खास रही। डॉ. रिंदाना रहस्य ने राग मेघ, जबकि डॉ. अविनाश कुमार ने राग दुर्गा प्रस्तुत किया। दोनों कलाकारों ने अपने-अपने स्वर और स्केल में अलग-अलग रागों का एक साथ गायन कर शास्त्रीय संगीत की विशिष्टता और सौंदर्य को सामने रखा। तबले पर जाहीन खान और आनंद मिश्रा तथा हारमोनियम पर जाकिर ढोलपुरी ने संगत की। अलग-अलग रागों के एक साथ गायन ने श्रोताओं को शास्त्रीय संगीत की इस विशिष्ट शैली का अनुभव कराया।
पं. जसराज की परंपरा से जुड़ी है जसरंगी शैली
जसरंगी गायन की विशेषता बताते हुए डॉ. अविनाश कुमार ने कहा कि इस शैली को पं. जसराज ने स्थापित किया था। यह भारतीय संगीत की प्राचीन मूर्छना पद्धति पर आधारित है। इसमें पुरुष और महिला कलाकार अपने-अपने स्वर और स्केल में अलग-अलग रागों का एक साथ गायन करते हैं। यही विशेषता जसरंगी शैली को विशिष्ट पहचान देती है।
युवाओं से शास्त्रीय संगीत की विरासत आगे बढ़ाने की अपील
विश्वविद्यालय के संगीत विभाग, स्वामी हरिदास संगीत एवं नाट्य अकादमी तथा स्मृति, कानपुर के सहयोग से आयोजित कार्यक्रम के अध्यक्ष और विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. विनय कुमार पाठक ने कहा कि भारतीय संगीत की समृद्ध परंपरा को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी युवा पीढ़ी की है। संयोजक डॉ. राजेंद्र कुमार मिश्रा ने कहा कि स्मृति ऐसे आयोजनों से संगीत साधना कर रही है। इस अवसर पर वरिष्ठ आयुर्वेदाचार्या डॉ. वंदना पाठक, संगीत विभाग की अध्यक्ष प्रो. रश्मि गोरे, स्मृति संस्थान के विनीत मिश्रा सहित विश्वविद्यालय के शिक्षक, विद्यार्थी और अनेक संगीत प्रेमी मौजूद रहे।


