- आराधना मिश्रा को प्रदेश अध्यक्ष बनाकर कांग्रेस ने महिला नेतृत्व को संगठन के केंद्र में रखा; यूपी में 7.20 करोड़ से ज्यादा महिला मतदाता और विधानसभा चुनावों में लगातार पुरुषों से अधिक भागीदारी 2027 के लिए अहम, लेकिन 2024 का महिला समर्थन गठबंधन का था—उसे कांग्रेस के अपने वोट में बदलना सबसे बड़ी चुनौती
भारत 19/राजीव सक्सेना, लखनऊ। उत्तर प्रदेश की चुनावी गणित में महिला मतदाता कोई भी दल नजरअंदाज नहीं कर सकता। 2024 के लोकसभा चुनाव में प्रदेश में 7.20 करोड़ से अधिक महिला मतदाता थीं और उनका मतदान प्रतिशत पुरुषों से ज्यादा रहा। इसी बदलते चुनावी परिदृश्य के बीच कांग्रेस ने आराधना मिश्रा ‘मोना’ को प्रदेश अध्यक्ष बनाया है। पार्टी के संगठनात्मक पुनर्गठन के साथ-साथ महिला नेतृत्व को आगे लाने के प्रयोग के रूप में देखा जा रहा है। कांग्रेस के सामने हालांकि सिर्फ महिला चेहरा सामने रखने की चुनौती नहीं है। असली सवाल यह है कि क्या आराधना मिश्रा की प्रदेश स्तर की भूमिका पार्टी को उस बड़े महिला मतदाता समूह तक पहुंच दिला पाएगी, जहां कांग्रेस का स्वतंत्र आधार अभी सीमित है।
यूपी में महिला वोटर अब चुनावी ताकत
निर्वाचन आयोग के 2024 के आंकड़ों के अनुसार उत्तर प्रदेश में 7,20,56,115 महिला मतदाता थीं। कुल मतदाताओं में महिलाओं की हिस्सेदारी करीब 46.67 प्रतिशत थी। यानी राज्य के चुनावी मैदान में लगभग हर दो मतदाताओं में एक महिला है। पिछले एक दशक में यह हिस्सेदारी लगातार बढ़ी है। 2014 के लोकसभा चुनाव में महिला मतदाताओं की हिस्सेदारी करीब 45.27 प्रतिशत थी। 2024 तक इसमें करीब 1.4 प्रतिशत अंक की बढ़ोतरी हुई। संख्या के लिहाज से भी करीब 93 लाख महिला मतदाता बढ़ीं। यह बदलाव इसलिए अहम है क्योंकि महिला मतदाताओं की बढ़ती संख्या के साथ उनकी चुनावी भागीदारी भी मजबूत रही है।
मतदान में महिलाएं पुरुषों से आगे
2024 के लोकसभा चुनाव में यूपी में महिलाओं का मतदान प्रतिशत 57.22 रहा, जबकि पुरुषों का मतदान 56.46 प्रतिशत था। यानी महिलाओं ने पुरुषों से 0.76 प्रतिशत अंक ज्यादा मतदान किया। विधानसभा चुनावों में यह अंतर और स्पष्ट रहा है। 2017 में महिलाओं का मतदान पुरुषों से अधिक था और 2022 में भी महिला मतदान 62.24 प्रतिशत, जबकि पुरुष मतदान 59.56 प्रतिशत रहा। इसका अर्थ यह नहीं कि महिला मतदाता किसी एक दल के साथ खड़ी हैं। लेकिन इतना जरूर है कि महिलाओं की संख्या और मतदान भागीदारी दोनों उन्हें 2027 के चुनाव में निर्णायक राजनीतिक समूह बनाते हैं।
कांग्रेस के लिए असली परीक्षा 2024 के बाद
यहीं कांग्रेस का गणित जटिल हो जाता है। 2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के गठबंधन को यूपी की महिला मतदाताओं के बीच करीब 45 प्रतिशत समर्थन मिलने का अनुमान लोकनीति-सीएसडीएस के विश्लेषण में सामने आया था। लेकिन इस आंकड़े को कांग्रेस का अकेला महिला वोट मानना गलत होगा। यह कांग्रेस-सपा गठबंधन का संयुक्त समर्थन था। दोनों दल 2019 में अलग-अलग चुनाव लड़े थे, जबकि 2024 में साथ आए थे। इसलिए 2027 में कांग्रेस के सामने दोहरी चुनौती है—एक तरफ महिला मतदाताओं के बीच गठबंधन के दौरान बना समर्थन बरकरार रखना और दूसरी तरफ उसमें अपना स्वतंत्र संगठनात्मक आधार तैयार करना।
आराधना मिश्रा क्यों हैं महत्वपूर्ण
आराधना मिश्रा प्रतापगढ़ की रामपुर खास सीट से विधायक हैं। वरिष्ठ कांग्रेस नेता प्रमोद तिवारी की बेटी आराधना प्रदेश अध्यक्ष बनने से पहले वह विधानसभा में कांग्रेस विधायक दल की नेता थीं। कांग्रेस ने उनके साथ इमरान मसूद को कार्यकारी अध्यक्ष तथा देवेंद्र निषाद और आलोक प्रसाद को वरिष्ठ उपाध्यक्ष बनाया है। इससे पार्टी की नई टीम में महिला नेतृत्व के साथ सामाजिक और क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व का संतुलन बनाने की कोशिश भी दिखती है। आराधना को केवल इसलिए महिला मतदाताओं में प्रभावी मानना जल्दबाजी होगी कि वह महिला हैं। चुनावी राजनीति में महिला नेतृत्व तभी वोट में बदलता है, जब उसके साथ संगठन, स्थानीय मुद्दे, उम्मीदवारों की विश्वसनीयता और मतदाताओं से लगातार संपर्क भी जुड़ता है।
महिला उम्मीदवार को लेकर मतदाताओं की राय क्या कहती है
2022 के लोकनीति-सीएसडीएस पोस्ट-पोल सर्वे में मतदाताओं से पूछा गया था कि उम्मीदवार का महिला होना उनके मतदान निर्णय में कितना अहम है। 18.1 प्रतिशत ने इसे बहुत अधिक, 9.7 प्रतिशत ने काफी और 13 प्रतिशत ने कुछ हद तक महत्वपूर्ण बताया। यानी कुल 40.8 प्रतिशत ने किसी न किसी स्तर पर महिला उम्मीदवार की पहचान को महत्व दिया। लेकिन दूसरी तरफ 35.4 प्रतिशत ने कहा कि उम्मीदवार का महिला होना उनके लिए अहम नहीं था। नेतृत्व महिला का होना राजनीतिक लाभ में सहायक तो है पर वोट की गारंटी नहीं।यही अंतर कांग्रेस की रणनीति की वास्तविक परीक्षा बनेगा।
प्रियंका की पहचान, आराधना की संगठनात्मक भूमिका
कांग्रेस के पास महिला मतदाताओं के बीच संवाद के लिए प्रियंका गांधी के रूप में पहले से राष्ट्रीय स्तर पर पहचाना जाने वाला चेहरा है। अब प्रदेश संगठन के शीर्ष पर आराधना मिश्रा की मौजूदगी पार्टी को राज्य स्तर पर भी महिला नेतृत्व का चेहरा देती है। दूसरी ओर समाजवादी पार्टी के पास डिंपल यादव और बहुजन समाज पार्टी के पास मायावती जैसे स्थापित महिला चेहरे हैं। इसलिए 2027 में महिला नेतृत्व की प्रतिस्पर्धा केवल चेहरों की नहीं होगी; असली मुकाबला महिला मतदाताओं के मुद्दों और संगठनात्मक पहुंच को चुनावी समर्थन में बदलने का होगा।
आधी आबादी का वोट, किसी एक दल की जागीर नहीं
उत्तर प्रदेश में महिला मतदाताओं की संख्या करीब आधे चुनावी समूह तक पहुंच चुकी है और मतदान में उनकी सक्रियता भी लगातार दिखाई देती है। कांग्रेस ने आराधना मिश्रा को प्रदेश अध्यक्ष बनाकर इस बदलते चुनावी समीकरण में अपना महिला चेहरा आगे किया है। लेकिन 7.20 करोड़ महिला मतदाता किसी एक पार्टी का वोट बैंक नहीं हैं। कांग्रेस के लिए 2027 की असली परीक्षा यह होगी कि आराधना मिश्रा की प्रदेश अध्यक्ष के रूप में भूमिका क्या पार्टी को महिलाओं के बीच केवल दृश्यता देती है या उसे वास्तविक संगठनात्मक समर्थन में भी बदल पाती है।


