- टेंडर अनियमितता, मंगल भवन और वार्ड सीमा पर बहस के बीच भाजपा-सपा पार्षद आमने-सामने; कार्यकारिणी के छह सदस्य सर्वसम्मति से चुने गए
भारत 19
कानपुर। नगर निगम सदन की शनिवार की बैठक कार्यकारिणी के छह सदस्यों के चुनाव के लिए बुलाई गई थी, लेकिन सदन में विकास कार्यों से ज्यादा टेंडर, कमेटियों और वार्ड सीमा के विवाद गूंजे। बहस के दौरान भाजपा पार्षद विकास जायसवाल और सपा पार्षद रजत बाजपेयी आमने-सामने आ गए। तीखी कहासुनी के बाद गाली-गलौज हुई और मामला मारपीट तक पहुंचने की नौबत आ गई। आसपास मौजूद पार्षदों ने बीच-बचाव कर स्थिति संभाली।
वार्ड सीमा और बरातशाला पर आमने-सामने आए पार्षद
विवाद की शुरुआत वार्ड सीमा और बरातशाला से जुड़े मुद्दे को लेकर हुई। बहस बढ़ने पर विकास जायसवाल ने सदन में सरकार को बदनाम करने का प्रयास किए जाने का सवाल उठाया। जवाब में रजत बाजपेयी ने शासन की रिपोर्ट का हवाला दिया। इसके बाद दोनों के बीच तीखी टिप्पणियां हुईं और माहौल गर्म हो गया। महापौर ने स्थिति संभालते हुए पार्षदों को शांत रहने की हिदायत दी। उन्होंने कहा, “यह सदन है, दंगल नहीं। बाहर जाकर लड़ो।” विवाद बढ़ने के बाद विकास जायसवाल सदन से बाहर चले गए।
टेंडर पर सवाल, 594 करोड़ के काम फिर चर्चा में
सदन में नगर निगम के टेंडर और विकास कार्यों में अनियमितता का मुद्दा भी जोरदार तरीके से उठा। करीब 594 करोड़ रुपये के 765 विकास कार्यों के आवंटन को लेकर पहले से पार्षद सवाल उठाते रहे हैं। उपलब्ध रिपोर्ट के मुताबिक करीब 350 काम पूरे हो चुके हैं, जबकि बाकी कार्य अलग-अलग चरणों में हैं। करीब 125 करोड़ रुपये के कुछ टेंडर रद्द कर उन्हें दोबारा कराने की प्रक्रिया भी सामने आ चुकी है। मामला अब केवल आरोपों तक सीमित नहीं है। सीडीओ की जांच रिपोर्ट शासन को भेजी जा चुकी है। रिपोर्ट के अनुसार 15 से अधिक फर्मों के दस्तावेजों में गड़बड़ियां मिली हैं। टेंडर हासिल करने के लिए फर्जी दस्तावेज और नियमों की अनदेखी से जुड़े मामलों की भी जांच हुई है।
कांग्रेस ने पूछा, नियम अधिकारी बनाते तो पार्षद दोषी क्यों
कांग्रेस पार्षद दल के नेता सुहेल अहमद ने सदन में टेंडर मामले पर अधिकारियों और पार्षदों की भूमिका स्पष्ट करने की मांग की। उनका सवाल था कि यदि टेंडर की प्रक्रिया और नियम अधिकारी तय करते हैं तो अनियमितता होने पर पार्षदों की जिम्मेदारी किस आधार पर तय की जा रही है। सपा पार्षद रजत बाजपेयी ने नाला सफाई समेत विकास कार्यों की जवाबदेही का मुद्दा उठाते हुए कहा कि समस्या आने पर ठेकेदार और पार्षदों पर जिम्मेदारी डाली जाती है, जबकि अधिकारियों की भूमिका भी स्पष्ट होनी चाहिए।
मंगल भवन की कमेटियां भंग होने पर भी बवाल
सदन में मंगल भवन की कमेटियों को भंग करने का मुद्दा भी उठा। पार्षदों ने सवाल किया कि यदि मंगल भवनों की व्यवस्था में खामियां हैं तो पहले व्यवस्था सुधारने की जरूरत है। उनका कहना था कि शहर में ऐसे और मंगल भवन विकसित किए जाने चाहिए। इस मुद्दे की पृष्ठभूमि में महापौर और नगर आयुक्त के बीच मतभेद भी सामने आ चुके हैं। महापौर प्रमिला पांडेय ने कमेटी भंग करने के नगर आयुक्त के फैसले पर आपत्ति जताते हुए कहा था कि कार्यकारिणी और सदन की मंजूरी के बिना ऐसा निर्णय लिया गया।
पार्षद बोले, दो साल से नहीं आई कूड़ा गाड़ी
बैठक में नगर निगम की जमीनी कार्यप्रणाली को लेकर भी पार्षदों ने सवाल उठाए। पार्षद गोविंद ने अपने क्षेत्र में दो साल से कूड़ा गाड़ी नहीं होने का मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि नगर आयुक्त की ओर से कमेटियां तो बनाई जाती हैं, लेकिन उनका असर जमीन पर दिखाई नहीं देता। इससे सदन में यह सवाल भी उठा कि जब शहर के कई हिस्सों में बुनियादी सुविधाओं को लेकर शिकायतें हैं, तो समितियों और बैठकों के फैसलों का वास्तविक असर वार्डों तक क्यों नहीं पहुंच रहा।
छह सदस्य चुने गए, चुनाव सर्वसम्मति से हुआ
हंगामे और तीखी बहस के बावजूद कार्यकारिणी के छह सदस्यों का चुनाव सर्वसम्मति से पूरा हुआ। सपा से रजत बाजपेयी और भाजपा से आदर्श गुप्ता, सतीश यादव, जितेंद्र चौरसिया, कौशल मिश्रा और वंदना शर्मा चुने गए। बैठक से पहले भी छह रिक्त पदों पर निर्विरोध चुनाव कराने की कोशिश की जा रही थी।
बागी पार्षदों की भूमिका पर भी रही नजर
कार्यकारिणी चुनाव से पहले भाजपा के छह बागी पार्षदों की रणनीति भी चर्चा में थी। इनमें पवन गुप्ता, लक्ष्मी कोरी, विकास जायसवाल, हरिस्वरूप निक्कू तिवारी, अंकित मौर्य और आलोक पांडे के नाम सामने आए थे। चुनाव से पहले इन पार्षदों की भूमिका और मतदान को लेकर पार्टी के भीतर खींचतान की खबरें थीं।
चुनाव खत्म, लेकिन नगर निगम के सवाल बाकी
शनिवार की बैठक का सबसे दिलचस्प पहलू यही रहा कि कार्यकारिणी चुनाव निर्विरोध निपट गया, लेकिन सदन का राजनीतिक तापमान कम नहीं हुआ। टेंडर की जांच, 594 करोड़ रुपये के विकास कार्यों का आवंटन, मंगल भवन की कमेटियां, वार्ड सीमा और नगर निगम की जमीनी व्यवस्था—इन सभी सवालों ने सदन की कार्यवाही को चुनाव से कहीं ज्यादा चर्चा में ला दिया।


