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चाइल्ड पोर्न पर SC सख्त, सोशल मीडिया के लिए गाइड-लाइन

  • सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को आखिरी मौका दिया, 2024 के आदेश लागू करने पर मांगी रिपोर्ट; याचिका में सभी प्लेटफॉर्म के लिए समान SOP, अनिवार्य रिपोर्टिंग और डिजिटल सबूत सुरक्षित रखने की मांग

Bharat 19/ नई दिल्ली। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर बच्चों के यौन शोषण से जुड़ी सामग्री यानी Child Sexual Exploitation and Abuse Material (CSEAM) की रोकथाम को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से जवाब मांगा है। जस्टिस जेबी पार्डीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने केंद्र को आखिरी मौका देते हुए पूछा कि सितंबर 2024 के सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों को लागू करने और सोशल मीडिया पर CSEAM के प्रसार को रोकने के लिए अब तक क्या कदम उठाए गए हैं। मामले की सुनवाई Just Rights for Children Alliance की याचिका पर हुई। याचिकाकर्ता का कहना है कि सोशल मीडिया इंटरमीडियरी सुप्रीम कोर्ट के 2024 के निर्देशों का समान रूप से पालन नहीं कर रहे हैं। याचिका में ऐसे प्लेटफॉर्म के खिलाफ कार्रवाई की मांग की गई है जो CSEAM की जानकारी भारतीय कानून प्रवर्तन एजेंसियों को रिपोर्ट नहीं करते।

केंद्र को बताना होगा, 2024 के आदेश पर क्या किया

सुप्रीम कोर्ट ने 14 अगस्त को केंद्र सरकार से इस मामले में जवाब मांगा था, लेकिन 24 सितंबर की सुनवाई तक इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय और कानून एवं न्याय मंत्रालय की रिपोर्ट रिकॉर्ड पर नहीं आई। इस पर पीठ ने दोनों मंत्रालयों को आखिरी अवसर देते हुए जवाब और अब तक उठाए गए कदमों का विवरण देने को कहा। केंद्र की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल केएम नटराज ने अदालत को बताया कि सरकार मामले को गंभीरता से ले रही है और एक कंपनी के खिलाफ नोटिस जारी कर कार्रवाई शुरू की जा चुकी है। सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से यह भी बताने को कहा कि भविष्य में सोशल मीडिया इंटरमीडियरी की ओर से ऐसी चूक रोकने के लिए क्या एहतियाती व्यवस्था तैयार की गई है। मामले की अगली सुनवाई 15 अक्टूबर 2026 को होगी।

सभी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के लिए समान SOP की मांग

मौजूदा याचिका में केंद्र सरकार को एक समान Standard Operating Procedure (SOP) तैयार कर अधिसूचित करने का निर्देश देने की मांग की गई है। प्रस्तावित SOP में CSEAM की पहचान, रिपोर्टिंग, संबंधित पुलिस या कानून प्रवर्तन एजेंसी को सूचना देने, रिपोर्ट के लिए समयसीमा और इलेक्ट्रॉनिक सबूत सुरक्षित रखने की व्यवस्था शामिल करने की मांग है। याचिका में IP एड्रेस, डिवाइस संबंधी जानकारी, अकाउंट की पहचान, अपलोड लॉग, मेटाडेटा और अन्य डिजिटल साक्ष्यों को सुरक्षित रखने तथा जांच एजेंसियों के साथ साझा करने के लिए भी एक समान प्रोटोकॉल की मांग की गई है। साथ ही पीड़ित बच्चों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए व्यवस्था बनाने की मांग की गई है।

CSEAM मिलने पर भारतीय एजेंसियों को रिपोर्ट जरूरी

याचिका का एक प्रमुख मुद्दा यह है कि सोशल मीडिया कंपनियां CSEAM से जुड़ी सामग्री की रिपोर्ट अमेरिका स्थित National Center for Missing & Exploited Children (NCMEC) को करती हैं, लेकिन भारत में संबंधित पुलिस अथॉरिटी को रिपोर्टिंग की प्रक्रिया को लेकर सवाल उठाए गए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने सितंबर 2024 के अपने फैसले में स्पष्ट किया था कि सोशल मीडिया इंटरमीडियरी को POCSO Act की धारा 19 और 20 तथा POCSO Rules के तहत संबंधित Special Juvenile Police Unit (SJPU) या स्थानीय पुलिस को भी ऐसी सामग्री की रिपोर्ट करनी होगी। केवल NCMEC को रिपोर्ट करना पर्याप्त नहीं है।

2024 में सुप्रीम कोर्ट ने तय की थी जिम्मेदारी

इस मामले की पृष्ठभूमि सितंबर 2024 के सुप्रीम कोर्ट के महत्वपूर्ण फैसले से जुड़ी है। Just Rights for Children Alliance बनाम S. Harish मामले में अदालत ने बच्चों से जुड़े यौन शोषण सामग्री के संबंध में POCSO Act और Information Technology Act के प्रावधानों की विस्तृत व्याख्या की थी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि इंटरमीडियरी को मिलने वाली ‘safe harbour’ सुरक्षा इस बात पर निर्भर करती है कि वह कानून के तहत जरूरी due diligence का पालन करे। अदालत ने स्पष्ट किया था कि CSEAM को हटाना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि ऐसी सामग्री की जानकारी संबंधित पुलिस इकाइयों को तत्काल देना भी जरूरी है।

सोशल मीडिया पर पेड विज्ञापनों से भी जुड़ा विवाद

मौजूदा याचिका में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर बच्चों के यौन शोषण से जुड़ी सामग्री को बढ़ावा देने वाले कथित पेड विज्ञापनों का भी उल्लेख किया गया है। याचिकाकर्ता ने ऐसी रिपोर्टों का हवाला देते हुए कहा है कि विज्ञापनों के जरिए यूजर्स को दूसरे प्लेटफॉर्म या वेबसाइटों तक पहुंचाया गया, जहां ऐसी सामग्री उपलब्ध होने का आरोप है। याचिका में कहा गया है कि ऐसे मामलों में केवल सामग्री हटाने के बजाय उसके स्रोत, अकाउंट, IP एड्रेस और अन्य डिजिटल साक्ष्यों को सुरक्षित रखना जरूरी है, ताकि जांच एजेंसियां संबंधित लोगों तक पहुंच सकें।

Meta और Google पर भी भारत में रिपोर्टिंग का दबाव

बच्चों के ऑनलाइन यौन शोषण से जुड़ी सामग्री की रिपोर्टिंग को लेकर भारत में बड़ी टेक कंपनियों की व्यवस्था भी चर्चा में है। हाल में Google ने भारत से जुड़े ऐसे मामलों की रिपोर्ट सीधे भारतीय कानून प्रवर्तन एजेंसियों को करने की व्यवस्था शुरू करने की घोषणा की है। इससे पहले Meta की ओर से भी भारत में सीधे रिपोर्टिंग की व्यवस्था अपनाने की जानकारी सामने आई थी। यह बदलाव इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि अब सवाल केवल सामग्री की पहचान और उसे हटाने तक सीमित नहीं है, बल्कि भारतीय एजेंसियों तक सूचना कितनी जल्दी पहुंचती है और डिजिटल सबूत किस तरह सुरक्षित रहते हैं, यह भी जांच का हिस्सा है।

बच्चों की सोशल मीडिया पहुंच पर भी सुप्रीम कोर्ट में मामला

बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा को लेकर सुप्रीम कोर्ट में एक अलग याचिका भी लंबित है। सितंबर 2026 में तीन जजों की पीठ ने नाबालिगों के सोशल मीडिया इस्तेमाल को लेकर केंद्र से जवाब मांगा था। याचिका में 18 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया अकाउंट बनाने में अभिभावकीय सहमति और उम्र सत्यापन जैसी सुरक्षा व्यवस्था की मांग की गई है। इस मामले में अदालत ने बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा के लिए सुरक्षा उपायों की जरूरत पर जोर दिया था। हालांकि यह याचिका CSEAM की रिपोर्टिंग से जुड़ी मौजूदा कार्यवाही से अलग है।

अब सरकार को बतानी होगी पूरी व्यवस्था

24 सितंबर की सुनवाई के बाद केंद्र सरकार को यह बताना होगा कि 2024 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले को लागू करने के लिए अब तक क्या कदम उठाए गए हैं। साथ ही अदालत ने भविष्य में सोशल मीडिया इंटरमीडियरी की ओर से ऐसी चूक रोकने के लिए अपनाए जाने वाले उपायों की जानकारी भी मांगी है। मौजूदा याचिका में समान SOP की मांग के चलते अब निगाह इस बात पर है कि सरकार सभी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के लिए एक समान व्यवस्था बनाने को लेकर क्या कदम उठाती है। इसमें CSEAM की पहचान, तत्काल रिपोर्टिंग, डिजिटल साक्ष्य सुरक्षित रखने और भारतीय जांच एजेंसियों के साथ समन्वय जैसे मुद्दे प्रमुख हैं। मामले की अगली सुनवाई 15 अक्टूबर 2026 को होगी।

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