- राजभर ने यूपी को पूर्वांचल, मध्यांचल, बुंदेलखंड और हरित प्रदेश में बांटने की बात कही; अखिलेश ने किया पलटवार, 1955 में आंबेडकर ने तीन राज्यों का दिया था प्रस्ताव, 2011 में मायावती सरकार ने चार राज्यों का प्रस्ताव विधानसभा से पारित कराया
भारत 19
लखनऊ। उत्तर प्रदेश को छोटे राज्यों में बांटने की बहस एक बार फिर सियासी चर्चा के केंद्र में है। कैबिनेट मंत्री और सुभासपा अध्यक्ष ओम प्रकाश राजभर ने सोमवार को कहा कि आने वाले समय में उत्तर प्रदेश चार हिस्सों में बंटेगा। उन्होंने पूर्वांचल, मध्यांचल, बुंदेलखंड और हरित प्रदेश का जिक्र किया। राजभर ने यह भी कहा कि पूर्वांचल अलग राज्य बना तो राजभर समाज का बेटा उसका पहला मुख्यमंत्री बनेगा। इसके बाद सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने राज्य के बंटवारे की मांग पर पलटवार किया।
राजभर बोले, चार हिस्सों में बंटेगा उत्तर प्रदेश
राजभर ने अपने बयान में कहा कि उत्तर प्रदेश देश का बड़ा राज्य है और लंबे समय से इसे छोटे राज्यों में बांटने की मांग उठती रही है। उन्होंने चार प्रस्तावित हिस्सों के तौर पर पूर्वांचल, मध्यांचल, बुंदेलखंड और हरित प्रदेश का उल्लेख किया। उनका दावा है कि जातीय जनगणना और 27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण में हिस्सेदारी का मुद्दा आगे बढ़ने के बाद राज्य के पुनर्गठन की दिशा में भी बात आगे बढ़ सकती है। राजभर ने पूर्वांचल के संभावित मुख्यमंत्री को लेकर भी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि यदि पूर्वांचल अलग राज्य बनता है तो राजभर समाज का बेटा उसका पहला मुख्यमंत्री बनेगा। यह उनका राजनीतिक दावा है, न कि राज्य गठन की कोई वर्तमान संवैधानिक प्रक्रिया।
अखिलेश बोले, देश को मजबूत बनाने पर ध्यान दें
राजभर के बयान पर अखिलेश यादव ने कहा कि जो लोग देश के बंटवारे की बात करते हैं, वे राज्य के बंटवारे की भी बात कर रहे हैं। उन्होंने जर्मनी का उदाहरण देते हुए कहा कि देश को मजबूत बनाने पर ध्यान दिया जाना चाहिए। यूपी के बंटवारे के मुद्दे पर उनका बयान राजभर की मांग के सीधे जवाब के तौर पर सामने आया। अखिलेश की सोमवार की प्रेस कॉन्फ्रेंस में यूपी के बंटवारे के अलावा AI के इस्तेमाल, PDA, आरक्षित सीटों, PDA Audit, पेपर लीक, बाबा साहब की मूर्तियों, अधिकारियों के तबादलों और चुनाव प्रक्रिया से जुड़े मुद्दे भी उठे। उन्होंने AI के इस्तेमाल को सकारात्मक रखने और नकारात्मक प्रचार से बचने की बात कही।
1955 में आंबेडकर ने तीन राज्यों का दिया था प्रस्ताव
यूपी के पुनर्गठन की बहस नई नहीं है। डॉ. बीआर आंबेडकर ने 1955 में अपनी पुस्तक ‘Thoughts on Linguistic States’ में उत्तर प्रदेश को तीन राज्यों में बांटने का प्रस्ताव दिया था। उनके प्रस्ताव में तीन राज्यों की प्रस्तावित राजधानियां मेरठ, कानपुर और इलाहाबाद थीं। आंबेडकर का मूल प्रस्ताव चार राज्यों का नहीं, बल्कि तीन राज्यों का था। आंबेडकर ने बड़े राज्यों को छोटे प्रशासनिक इकाइयों में बांटने की जरूरत पर विचार रखा था। यूपी के संदर्भ में उन्होंने लगभग दो-दो करोड़ की आबादी वाले तीन राज्यों का खाका सुझाया था।
मायावती सरकार ने 2011 में चार राज्य का प्रस्ताव भेजा
उत्तर प्रदेश को चार हिस्सों में बांटने का औपचारिक राजनीतिक प्रस्ताव मायावती सरकार के दौर में सामने आया। 21 नवंबर 2011 को यूपी विधानसभा ने उत्तर प्रदेश को पूर्वांचल, बुंदेलखंड, अवध प्रदेश और पश्चिम प्रदेश में बांटने का प्रस्ताव पारित किया था। राज्य सरकार ने यह प्रस्ताव 23 नवंबर 2011 को केंद्र सरकार को भेजा था। केंद्र सरकार ने दिसंबर 2011 में उत्तर प्रदेश सरकार से इस संबंध में अतिरिक्त जानकारी मांगी थी। 2014 में केंद्र ने लोकसभा में बताया कि उत्तर प्रदेश से नए राज्य बनाने का कोई प्रस्ताव उस समय केंद्र के विचाराधीन नहीं था।
आंबेडकर के तीन और मायावती के चार राज्य में फर्क
यूपी के विभाजन के इतिहास में दोनों प्रस्तावों का अंतर महत्वपूर्ण है। आंबेडकर का 1955 का प्रस्ताव तीन राज्यों का था, जबकि मायावती सरकार का 2011 का प्रस्ताव चार राज्यों का था। दोनों के पीछे बड़े राज्य के प्रशासन और विकास से जुड़े अलग-अलग तर्क रखे गए थे। मायावती सरकार के प्रस्ताव में पूर्वांचल, बुंदेलखंड, अवध प्रदेश और पश्चिम प्रदेश शामिल थे। वहीं राजभर का मौजूदा खाका पूर्वांचल, मध्यांचल, बुंदेलखंड और हरित प्रदेश का है। यानी वर्तमान राजनीतिक प्रस्ताव 2011 के चार-राज्य प्रस्ताव से नामों के स्तर पर भी अलग है।
राज्य गठन की प्रक्रिया संसद से पूरी होती है
किसी मौजूदा राज्य को विभाजित कर नए राज्य बनाने की अंतिम संवैधानिक प्रक्रिया संसद के स्तर पर होती है। इसलिए किसी नेता की मांग या राज्य विधानसभा का प्रस्ताव अपने आप नया राज्य नहीं बनाता। 2011 में यूपी विधानसभा से पारित प्रस्ताव भी राज्य गठन में परिवर्तित नहीं हुआ। अब 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले राजभर के ताजा बयान और अखिलेश की प्रतिक्रिया ने यूपी के पुनर्गठन के पुराने मुद्दे को फिर राजनीतिक बहस में ला दिया है। मौजूदा घटनाक्रम में मांग, राजनीतिक बयान और वास्तविक राज्य गठन की संवैधानिक प्रक्रिया इन तीनों को अलग-अलग देखना जरूरी है।


