- अमेरिका-इजरायल समेत सात अरब देशों के सैन्य प्रमुखों की जर्मनी में बैठक; ईरान, होर्मुज और हूती मोर्चे पर बढ़ते तनाव के बीच भारत के सामने तेल, शिपिंग और नागरिकों की सुरक्षा की चुनौती
भारत 19 डेस्क
पश्चिम एशिया में चल रहे युद्ध के बीच अमेरिका, इजरायल और सात अरब देशों के सैन्य प्रमुखों की जर्मनी में हुई बैठक ने क्षेत्रीय तनाव की गंभीरता को सामने ला दिया है। अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) की मेजबानी में हुई बैठक में अमेरिका और इजरायल के साथ सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, बहरीन, कुवैत, कतर, जॉर्डन और मिस्र के सैन्य प्रमुख शामिल हुए। बैठक में ईरान के साथ जारी संघर्ष, क्षेत्रीय सुरक्षा और समुद्री यातायात बढ़ाने के उपायों पर चर्चा हुई। बैठक ऐसे समय हो रही है जब ईरान के साथ संघर्ष, यमन के हूती हमले और होर्मुज जलडमरूमध्य तथा बाब-अल-मंदेब जैसे अहम समुद्री मार्गों की सुरक्षा बड़ा मुद्दा है। अमेरिकी पक्ष ने क्षेत्र में अपनी सैन्य मौजूदगी रखने और होर्मुज में समुद्री यातायात बढ़ाने की योजनाओं पर भी सैन्य प्रमुखों को जानकारी दी।
सात अरब देशों के सैन्य प्रमुखों की मौजूदगी अहम
जर्मनी में हुई बैठक में अमेरिकी CENTCOM प्रमुख एडमिरल ब्रैड कूपर और इजरायली सेना प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल एयाल जमीर के साथ सात अरब देशों के सैन्य प्रमुख शामिल हुए। इनमें सऊदी अरब, यूएई, बहरीन, कुवैत, कतर, जॉर्डन और मिस्र शामिल हैं। CENTCOM ने बैठक की पुष्टि करते हुए कहा कि वरिष्ठ सैन्य नेताओं ने मध्य पूर्व में सुरक्षा सहयोग बढ़ाने के अवसरों पर चर्चा की। रिपोर्टों के मुताबिक इजरायली सेना प्रमुख ने क्षेत्र के विभिन्न मोर्चों पर चल रहे सैन्य अभियानों की जानकारी भी दी। इस बैठक को क्षेत्रीय सुरक्षा समन्वय के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है, लेकिन इससे सभी सहभागी देशों के किसी नए सैन्य अभियान में शामिल होने की पुष्टि नहीं होती।
ईरान और होर्मुज पर अमेरिका का फोकस
बैठक का सबसे संवेदनशील हिस्सा ईरान और होर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़ा है। अमेरिकी पक्ष ने क्षेत्र में सैन्य मौजूदगी बनाए रखने और होर्मुज में समुद्री यातायात बढ़ाने की योजनाओं की जानकारी दी। होर्मुज वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति का प्रमुख समुद्री मार्ग है। यहां सैन्य तनाव बढ़ने या जहाजों की आवाजाही प्रभावित होने पर इसका असर तेल की कीमतों, शिपिंग लागत और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला तक पहुंच सकता है।
हूती मोर्चे से खाड़ी की सुरक्षा चुनौती बढ़ी
यमन का हूती मोर्चा भी क्षेत्रीय तनाव का महत्वपूर्ण हिस्सा बना हुआ है। हूती हमलों और लाल सागर क्षेत्र में समुद्री सुरक्षा की चुनौती ने खाड़ी देशों के लिए जोखिम बढ़ाया है। बाब-अल-मंदेब वैश्विक व्यापार और ऊर्जा परिवहन का महत्वपूर्ण समुद्री रास्ता है। ईरान, होर्मुज और हूती मोर्चे से जुड़े घटनाक्रम एक-दूसरे से जुड़े होने के कारण पश्चिम एशिया का सैन्य तनाव अब ऊर्जा और समुद्री व्यापार के लिए भी बड़ा जोखिम बन गया है।
भारत के लिए सबसे संवेदनशील मुद्दा तेल
भारत के नजरिए से इस घटनाक्रम का सबसे महत्वपूर्ण पहलू ऊर्जा सुरक्षा है। भारत सरकार ने बताया है कि संकट से पहले भारतीय कच्चे तेल के आयात का एक बड़ा हिस्सा होर्मुज मार्ग से आता था। संकट के दौरान भारत ने गैर-होर्मुज मार्गों से आपूर्ति बढ़ाई और कच्चे तेल के स्रोतों में भी विविधता लाई। भारत अब कई देशों से कच्चा तेल हासिल कर रहा है। इससे किसी एक समुद्री मार्ग पर निर्भरता कम करने में मदद मिली है, लेकिन लंबे समय तक पश्चिम एशिया में सैन्य तनाव रहने पर तेल की कीमत, जहाजों का बीमा, माल ढुलाई और आपूर्ति की लागत प्रभावित हो सकती है।
भारत ने वैकल्पिक तेल मार्गों पर बढ़ाया जोर
होर्मुज में जोखिम बढ़ने के बीच भारत ने तेल आपूर्ति के वैकल्पिक स्रोतों और मार्गों पर जोर दिया है। सरकार के अनुसार गैर-होर्मुज स्रोतों से कच्चे तेल की आपूर्ति बढ़ाई गई है और खरीद को कई देशों तक विविध किया गया है। इस रणनीति से भारत को किसी एक समुद्री मार्ग में अचानक व्यवधान से बचाव मिलता है। हालांकि वैश्विक तेल बाजार में कीमतों में तेज उछाल की स्थिति में भारत का आयात बिल बढ़ सकता है और इसका व्यापक आर्थिक असर पड़ सकता है।
समुद्री तनाव से भारतीय व्यापार पर असर
पश्चिम एशिया का तनाव भारत के लिए केवल तेल का मामला नहीं है। समुद्री मार्गों में जोखिम बढ़ने से जहाजों की यात्रा लंबी हो सकती है और बीमा तथा माल ढुलाई की लागत बढ़ सकती है। इसका असर भारत के आयात और निर्यात दोनों पर पड़ सकता है। होर्मुज और लाल सागर क्षेत्र में लंबे समय तक अस्थिरता रहने पर वैश्विक सप्लाई चेन पर भी दबाव बढ़ सकता है। भारत के लिए यह स्थिति ऊर्जा के साथ-साथ व्यापारिक लागत की चुनौती भी पैदा कर सकती है।
खाड़ी में भारतीय नागरिकों की सुरक्षा भी अहम
भारत की चिंता का एक बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों में रहने और काम करने वाले भारतीय नागरिकों की सुरक्षा से जुड़ा है। पश्चिम एशिया में सैन्य तनाव बढ़ने पर भारत सरकार को नागरिकों, नाविकों और जहाजों की सुरक्षा पर अतिरिक्त निगरानी रखनी पड़ सकती है। भारत पहले ही प्रभावित समुद्री क्षेत्रों में भारतीय नाविकों और जहाजों की सुरक्षा के लिए निगरानी और विभिन्न एजेंसियों के बीच समन्वय बढ़ा चुका है।
भारत-अमेरिका संबंधों पर भी पड़ सकता है असर
पश्चिम एशिया का सैन्य संकट भारत-अमेरिका संबंधों के लिए भी संवेदनशील है। अमेरिका क्षेत्र में सैन्य गतिविधियों का प्रमुख पक्ष है, जबकि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों, समुद्री सुरक्षा और खाड़ी देशों के साथ व्यापक आर्थिक संबंधों को ध्यान में रखते हुए संतुलित नीति अपनाता है। भारत के लिए अमेरिका, इजरायल, ईरान और खाड़ी देशों के साथ संबंध अलग-अलग रणनीतिक महत्व रखते हैं। इसलिए क्षेत्रीय सैन्य तनाव बढ़ने की स्थिति में नई दिल्ली के सामने कूटनीतिक संतुलन बनाए रखने की चुनौती भी बढ़ सकती है।
अगले दिनों में इन घटनाक्रमों पर नजर
आने वाले दिनों में ईरान की सैन्य गतिविधियां, अमेरिकी सैन्य तैनाती, होर्मुज में जहाजों की आवाजाही और हूती गतिविधियां क्षेत्र की स्थिति के प्रमुख संकेतक रहेंगे। यदि इन मोर्चों पर तनाव बढ़ता है तो भारत को तेल आपूर्ति, समुद्री सुरक्षा और भारतीय नागरिकों की सुरक्षा के लिए अतिरिक्त कदम उठाने पड़ सकते हैं। इसके विपरीत तनाव कम होने और समुद्री यातायात सामान्य होने से भारत पर आर्थिक दबाव भी घट सकता है।


