- 5,340 मेगावाट उत्पादन क्षमता प्रभावित; बारिश से कोयला आपूर्ति बाधित, रात में ग्रामीण इलाकों में कटौती से लघु-कुटीर उद्योग भी प्रभावित
भारत 19
लखनऊ। उत्तर प्रदेश में बिजली की मांग और उपलब्धता के बीच बढ़ते अंतर ने बिजली संकट को गहरा दिया है। प्रदेश की 10 उत्पादन इकाइयों के बंद होने से करीब 5,340 मेगावाट क्षमता प्रभावित बताई गई है। दूसरी ओर, कोयला खदान क्षेत्रों में बारिश और जलभराव से आपूर्ति प्रभावित होने का असर तापीय बिजलीघरों पर पड़ा है। उत्पादन में कमी के कारण खासकर शाम और रात के समय ग्रामीण इलाकों में कटौती बढ़ी है। इसका असर बिजली पर निर्भर लघु-कुटीर उद्योगों और छोटे कारोबार पर भी पड़ रहा है। मौजूदा स्थिति में परेशानी सिर्फ कोयले की उपलब्धता तक सीमित नहीं है। कुछ उत्पादन इकाइयां तकनीकी कारणों से भी बंद हैं। ऐसे में उत्पादन क्षमता की कमी और कोयला आपूर्ति में व्यवधान ने बिजली व्यवस्था पर एक साथ दबाव बढ़ा दिया है।
5,340 मेगावाट क्षमता बंद होने से बढ़ा दबाव
प्रदेश में कई उत्पादन इकाइयों के बंद होने से उपलब्ध बिजली की मात्रा प्रभावित हुई है। करीब 5,340 मेगावाट उत्पादन क्षमता फिलहाल प्रभावित बताई गई है। उत्पादन इकाइयों के जल्द चालू होने पर ही आपूर्ति व्यवस्था पर बना दबाव कम होने की उम्मीद है। बिजली की मांग बढ़ने के समय उपलब्ध उत्पादन कम होने से वितरण व्यवस्था पर सबसे ज्यादा दबाव शाम और रात के पीक आवर्स में पड़ रहा है। दिन में सौर ऊर्जा समेत दूसरे स्रोतों से कुछ राहत मिल रही है, लेकिन रात में विकल्प सीमित हो जाते हैं।
बारिश से कोयला आपूर्ति में भी आई बाधा
कोयला खदान क्षेत्रों में भारी बारिश और जलभराव से कोयले के उत्पादन और परिवहन पर असर पड़ा है। गीला कोयला तापीय बिजलीघरों के लिए भी चुनौती बन रहा है। इससे कुछ संयंत्रों में उत्पादन प्रभावित होने की बात सामने आई है। हालांकि मौजूदा संकट को केवल भीगे कोयले से जोड़ना पूरी तस्वीर नहीं है। उत्पादन इकाइयों में तकनीकी दिक्कत और कोयले की आपूर्ति में व्यवधान दोनों ने मिलकर उपलब्ध बिजली पर दबाव बढ़ाया है।
रात में ग्रामीण इलाकों में बढ़ी बिजली कटौती
बिजली संकट का सबसे ज्यादा असर ग्रामीण क्षेत्रों में दिखाई दे रहा है। दिन में स्थिति अपेक्षाकृत संभली रहने के बावजूद रात में बिजली की मांग बढ़ने पर उपलब्धता कम पड़ रही है। इसके चलते ग्रामीण क्षेत्रों में रोस्टर के अनुसार आपूर्ति बनाए रखने में परेशानी आ रही है। पीक समय में बिजली की कमी बढ़ने पर कटौती करनी पड़ रही है। इसका असर उन उपभोक्ताओं पर भी पड़ रहा है, जो खेती, छोटे कारोबार और घरेलू जरूरतों के लिए बिजली पर निर्भर हैं।
लघु-कुटीर उद्योगों का कामकाज भी हुआ प्रभावित
बिजली कटौती का असर ग्रामीण अर्थव्यवस्था से जुड़े छोटे कारोबारों पर भी पड़ रहा है। आटा चक्की, स्पेलर और बिजली से चलने वाली दूसरी छोटी इकाइयों में काम प्रभावित हो रहा है। बार-बार बिजली जाने से मशीनों का संचालन बाधित होता है और काम पूरा करने में ज्यादा समय लगता है। जिन कारोबारियों के लिए बिजली ही उत्पादन का मुख्य आधार है, उनके लिए लंबी कटौती सीधे आय और कारोबार पर असर डाल रही है।
पावर एक्सचेंज से बिजली खरीद भी सीमित सहारा
उत्पादन में कमी की भरपाई के लिए अतिरिक्त बिजली खरीदना एक विकल्प है, लेकिन पीक आवर्स में बाजार से पर्याप्त बिजली मिलना हमेशा आसान नहीं होता। मांग बढ़ने के साथ एक्सचेंज पर बिजली महंगी होने का असर भी पड़ता है। ऐसे में बाजार से महंगी बिजली खरीदकर तत्काल जरूरत पूरी की जा सकती है, लेकिन लंबे समय तक इस पर निर्भर रहना बिजली व्यवस्था की लागत बढ़ा सकता है। इसलिए बंद उत्पादन इकाइयों को जल्द चालू करना ज्यादा महत्वपूर्ण है।
तीन इकाइयों से जल्द राहत की उम्मीद
बिजली संकट से राहत के लिए बंद उत्पादन इकाइयों को जल्द चालू कराने पर जोर है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार अनपरा-डी, हरदुआगंज-ई और जवाहरपुर की इकाइयों के अगले कुछ दिनों में शुरू होने की उम्मीद है। इन इकाइयों के चालू होने से करीब 1,500 मेगावाट अतिरिक्त बिजली उपलब्ध हो सकती है। इसके अलावा कोयला आपूर्ति बेहतर होने पर उत्पादन में और सुधार की उम्मीद है।
रात की कमी पूरी करना सबसे बड़ी चुनौती
मौजूदा बिजली संकट में दिन और रात की स्थिति में अंतर दिखाई दे रहा है। दिन के समय सौर ऊर्जा की उपलब्धता से कुछ राहत मिलती है, लेकिन सूरज ढलने के बाद बिजली की अतिरिक्त जरूरत बढ़ जाती है। यही वह समय है जब बंद तापीय इकाइयों और सीमित वैकल्पिक बिजली उपलब्धता का असर सबसे ज्यादा दिखाई देता है। इसलिए फिलहाल बिजली विभाग के सामने रात के पीक आवर्स में मांग और उपलब्धता के अंतर को पाटना सबसे बड़ी चुनौती है।
कोयला स्टॉक और उत्पादन व्यवस्था की समीक्षा जरूरी
मौजूदा संकट ने बिजलीघरों के कोयला स्टॉक, परिवहन और उत्पादन इकाइयों के रखरखाव की व्यवस्था पर भी सवाल खड़े किए हैं। मानसून के दौरान कोयला आपूर्ति में व्यवधान की आशंका पहले से रहती है। ऐसे में बिजलीघरों के पास पर्याप्त स्टॉक और बंद इकाइयों को समय पर चालू करने की व्यवस्था जरूरी है। अगर कोयला आपूर्ति सामान्य होती है और तकनीकी कारणों से बंद इकाइयां जल्द उत्पादन शुरू करती हैं तो मौजूदा संकट से राहत मिल सकती है। लेकिन लंबे समय के लिए उत्पादन क्षमता, कोयला आपूर्ति और पीक आवर्स की मांग के बीच बेहतर तालमेल बनाना होगा।
सिर्फ कोयला संकट नहीं
- मौजूदा बिजली समस्या को केवल कोयला भीगने से जोड़ना पूरी स्थिति को नहीं बताता। उत्पादन इकाइयों का बंद होना, तकनीकी दिक्कतें, बारिश से कोयला आपूर्ति में व्यवधान और रात के समय अतिरिक्त बिजली की सीमित उपलब्धता का असर मिलकर संकट बढ़ा रहा है।
- तत्काल राहत के लिए बंद इकाइयों को जल्द चालू करना और कोयला आपूर्ति सामान्य करना जरूरी है। वहीं आगे के लिए मानसून से पहले कोयला स्टॉक, उत्पादन इकाइयों के रखरखाव और पीक आवर्स की अतिरिक्त बिजली जरूरत की बेहतर योजना बनानी होगी।


