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नेपाल में ग्लेशियर हादसे से बने क्रेटर में बढ़ा खतरा

  • क्रेटर में 14 लाख घनमीटर पानी जमा, नीचे तीन जल-संचय क्षेत्र; बांध टूटा तो दूसरी बाढ़ का खतरा, नए भूस्खलन ने बढ़ाई चिंता

भारत 19 डेस्क

नेपाल-चीन सीमा पर ग्लेशियर और चट्टानों के बड़े हिस्से के टूटने से आई विनाशकारी बाढ़ के बाद अब ग्लेशियर हादसे से बने इम्पैक्ट क्रेटर ने नई चिंता बढ़ा दी है। इस क्रेटर में करीब 14 लाख घनमीटर पानी जमा है और इसके नीचे तीन अन्य जल-संचय क्षेत्र बने हैं। चीन के जल संसाधन मंत्रालय ने इन सभी क्षेत्रों को जोखिम वाला बताते हुए लगातार निगरानी की जरूरत जताई है। आशंका है कि क्रेटर का प्राकृतिक बांध अचानक टूटा तो नीचे की ओर पानी तेजी से पहुंच सकता है और दूसरी बाढ़ की स्थिति पैदा हो सकती है।

इम्पैक्ट क्रेटर शब्द को उस गड्ढेनुमा भू-क्षेत्र के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है, जो 26 अगस्त को ग्लेशियर और उससे जुड़ी चट्टानी ढलान के बड़े हिस्से के टूटकर नीचे आने के बाद आपदा क्षेत्र में बना। चीन के जल संसाधन मंत्रालय के मुताबिक इम्पैक्ट क्रेटर मुख्य बैरियर लेक से करीब 5.6 किमी ऊपर और लगभग 3,700 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। यह मुख्य बैरियर लेक से करीब 800 मीटर ऊंचाई पर है। 30 अगस्त को सुबह 11:23 बजे क्रेटर का जल-सतह क्षेत्र करीब 1,08,000 वर्गमीटर दर्ज किया गया। सुबह सात बजे के मुकाबले इसमें करीब 19,000 वर्गमीटर की कमी आई थी। इसके बावजूद क्रेटर में अनुमानित 14 लाख घनमीटर पानी मौजूद था। अधिकारियों के मुताबिक क्रेटर के बांध से करीब 180 मीटर नीचे पानी लगातार बाहर निकल रहा था। यानी प्राकृतिक निकास बना हुआ है, लेकिन इससे खतरा पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है।

नीचे बने हैं तीन और जल-संचय क्षेत्र

क्रेटर से करीब 2.5 किलोमीटर नीचे तीन और जल-संचय क्षेत्रों की पहचान की गई है। इन तीनों का संयुक्त जल-सतह क्षेत्रफल 70,000 वर्गमीटर से कम बताया गया है। इन जल-संचय क्षेत्रों की मौजूदगी इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि ऊपर के क्रेटर से अचानक बड़ी मात्रा में पानी नीचे आया तो इन क्षेत्रों पर भी दबाव बढ़ सकता है। चीन के जल संसाधन मंत्रालय ने क्रेटर के साथ इन तीनों क्षेत्रों को भी जोखिम वाले क्षेत्र के तौर पर चिह्नित किया है।

मुख्य बैरियर लेक लगभग खाली, खतरा फिर भी कायम

ग्लेशियर हादसे के बाद बनी मुख्य बैरियर लेक अब लगभग खाली हो चुकी है और वहां नदी का प्रवाह फिर से स्थापित होने लगा है। इससे बड़े पैमाने पर झील टूटने से आने वाली तत्काल बाढ़ का खतरा कम हुआ है। लेकिन क्रेटर में जमा पानी और उसके नीचे बने जल-संचय क्षेत्र नई चुनौती बने हुए हैं। अधिकारियों की निगरानी इसलिए जारी है कि कहीं ऊपर से पानी का प्रवाह अचानक बढ़कर नीचे के अस्थायी जल निकायों को अस्थिर न कर दे।

नए भूस्खलन से फिर बन सकती है झील

आपदा के बाद अब नए भूस्खलन भी चिंता का बड़ा कारण हैं। अस्थिर पहाड़ी ढलानों से बड़े पैमाने पर मलबा नदी में गिरने पर उसका रास्ता दोबारा बंद हो सकता है। इससे नदी के पीछे पानी जमा होकर नई अस्थायी झील बन सकती है। ऐसी झील का प्राकृतिक बांध कमजोर हुआ तो उसके अचानक टूटने से नीचे के इलाकों में तेज बाढ़ आ सकती है। यही वजह है कि राहत और बचाव अभियान के साथ आसपास की पहाड़ियों और नदी तंत्र की निगरानी भी बढ़ाई गई है।

दूसरी बाढ़ का खतरा क्यों बना हुआ

26 अगस्त की पहली आपदा के बाद नदी तंत्र में हुए बदलावों के कारण अब खतरा सिर्फ एक स्थान तक सीमित नहीं है। ऊपर के क्रेटर में जमा पानी, नीचे के तीन जल-संचय क्षेत्र और संभावित नए भूस्खलन एक-दूसरे से जुड़े जोखिम पैदा कर रहे हैं। यदि किसी एक स्थान पर बड़ा अवरोध बनता है और फिर अचानक टूटता है तो नीचे की ओर पानी और मलबे का तेज प्रवाह पैदा हो सकता है। इसीलिए प्रभावित इलाकों में नदी के जलस्तर और पहाड़ी गतिविधियों पर लगातार नजर रखी जा रही है।

900 से ज्यादा मौतें, हजारों लोग लापता

26 अगस्त की ग्लेशियर-जनित आपदा ने नेपाल और चीन के सीमावर्ती क्षेत्रों में भारी तबाही मचाई है। 31 अगस्त तक उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक नेपाल में 903 लोगों की मौत और 4,247 लोगों के लापता होने की सूचना है। चीन के ग्यिरोंग काउंटी में भी 16 लोगों की मौत और 546 लोगों के लापता होने की जानकारी सामने आई है। नेपाल में लापता लोगों में जलविद्युत परियोजनाओं से जुड़े सैकड़ों कर्मचारी भी शामिल हैं। सुरंगों में फंसे लोगों तक पहुंचने के लिए बचाव दल भारी मशीनरी और नियंत्रित विस्फोट जैसी तकनीकों का इस्तेमाल कर रहे हैं। खराब मौसम, मलबे और नए भूस्खलन के खतरे से अभियान लगातार चुनौतीपूर्ण बना हुआ है।

हिमालय में बढ़ती ग्लेशियर अस्थिरता का संकेत

इस घटना ने हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियरों और अस्थिर पहाड़ी ढलानों से जुड़े जोखिम को फिर सामने ला दिया है। शुरुआती वैज्ञानिक आकलन के अनुसार करीब 5,200 मीटर की ऊंचाई पर ग्लेशियर और उसके नीचे की चट्टान का बड़ा हिस्सा टूटकर नीचे आया था। वैज्ञानिक इस घटना के सटीक कारणों का अध्ययन कर रहे हैं। इसलिए इसे सीधे तौर पर केवल जलवायु परिवर्तन का परिणाम बताना अभी जल्दबाजी होगी। हालांकि तेजी से बदलते ग्लेशियर, पिघलती बर्फ और अस्थिर पहाड़ी ढलानों के बीच संबंध हिमालय में आपदा जोखिम को बढ़ाने वाला महत्वपूर्ण कारक माना जाता है।

निगरानी से ही टलेगा अगला खतरा

मुख्य बैरियर लेक का पानी लगभग निकल जाने से एक बड़ा तत्काल खतरा कम हुआ है, लेकिन इम्पैक्ट क्रेटर में जमा पानी, तीन जल-संचय क्षेत्र और नए भूस्खलन अभी भी चिंता का कारण हैं। फिलहाल प्रशासन और विशेषज्ञों का फोकस इन क्षेत्रों की निगरानी, नदी के जलस्तर पर नजर और संभावित नई बाढ़ से निचले इलाकों को बचाने पर है। 26 अगस्त की तबाही के बाद अब चुनौती सिर्फ राहत और बचाव की नहीं, बल्कि दूसरी आपदा को रोकने की भी है।

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