- कांग्रेस कार्यसमिति ने 1937 के फैसले के तहत दो पद गाने का रुख दोहराया; अमित शाह के तीखे जवाब से संकेत, भाजपा राष्ट्रवाद और मुस्लिम तुष्टीकरण के मुद्दे पर बढ़ाएगी हमला
भारत 19
राजीव सक्सेना, कानपुर। वंदे मातरम् को लेकर कांग्रेस और भाजपा के बीच शुरू हुआ विवाद अब केवल दो या छह पद गाने की बहस तक सीमित नहीं रहने वाला है। कांग्रेस कार्यसमिति ने 1937 में तय अपने उस रुख को दोहराया है, जिसके तहत पार्टी कार्यक्रमों में राष्ट्रगीत के शुरुआती दो पद गाए जाते हैं। लेकिन गृह मंत्री अमित शाह की प्रतिक्रिया ने संकेत दे दिया है कि भाजपा इस मुद्दे को राष्ट्रवाद की व्यापक राजनीतिक बहस में बदलकर कांग्रेस को घेरने की तैयारी में है।
कांग्रेस का कहना है कि उसका मौजूदा रुख कोई नया फैसला नहीं है। पार्टी 1937 में कांग्रेस कार्यसमिति द्वारा तय की गई उस परंपरा का पालन कर रही है, जिसमें वंदे मातरम् के शुरुआती दो पदों को राष्ट्रीय आयोजनों के लिए स्वीकार किया गया था। लेकिन भाजपा इस फैसले को कांग्रेस के पुराने राजनीतिक रुख से जोड़कर सवाल खड़े कर रही है।
1937 का फैसला फिर राजनीतिक बहस के केंद्र में
वंदे मातरम् स्वतंत्रता आंदोलन के सबसे प्रभावशाली प्रतीकों में रहा है। हालांकि इसके बाद के कुछ पदों में देवी-रूपक और धार्मिक संदर्भों को लेकर उस दौर में आपत्तियां भी सामने आई थीं। इसी पृष्ठभूमि में कांग्रेस कार्यसमिति ने 1937 में शुरुआती दो पदों के गायन का रुख अपनाया। कांग्रेस आज भी इसी इतिहास का हवाला दे रही है। पार्टी का तर्क है कि पहले दो पद गाना वंदे मातरम् के प्रति सम्मान कम करना नहीं, बल्कि लंबे समय से चली आ रही ऐतिहासिक परंपरा का पालन है। कांग्रेस के लिए यह फैसला स्वतंत्रता आंदोलन के दौर की उस सोच से जुड़ा है, जिसमें राष्ट्रीय एकता के साथ अलग-अलग समुदायों की संवेदनाओं को भी ध्यान में रखा गया था। लेकिन भाजपा इसी बिंदु को राजनीतिक हमले का आधार बना सकती है।
अमित शाह के जवाब से भाजपा की रणनीति के संकेत
अमित शाह की तीखी प्रतिक्रिया के बाद साफ है कि भाजपा इस विवाद को केवल सांस्कृतिक या ऐतिहासिक बहस के रूप में छोड़ने के मूड में नहीं है। पार्टी इसे कांग्रेस की राष्ट्रवाद की अवधारणा से जोड़कर बड़ा राजनीतिक मुद्दा बना सकती है। भाजपा का संभावित तर्क यह होगा कि वंदे मातरम् जैसे राष्ट्रीय चेतना से जुड़े प्रतीक को सीमित करने के पीछे कांग्रेस की कौन-सी राजनीतिक मजबूरी थी। पार्टी 1937 के फैसले को कांग्रेस की बाद की राजनीति के साथ जोड़ते हुए यह सवाल उठा सकती है कि क्या राष्ट्रीय प्रतीकों के मामले में भी पार्टी ने राजनीतिक समीकरणों को प्राथमिकता दी। यहीं से यह बहस इतिहास से निकलकर मौजूदा राजनीति के केंद्र में पहुंच जाती है।
मुस्लिम तुष्टीकरण के आरोप को फिर धार
भाजपा लंबे समय से कांग्रेस पर मुस्लिम तुष्टीकरण और वोट बैंक की राजनीति करने का आरोप लगाती रही है। वंदे मातरम् विवाद इस आरोप को नया राजनीतिक आधार दे सकता है। भाजपा संभवतः 1937 के फैसले और उस समय गीत के कुछ पदों को लेकर उठी आपत्तियों को सामने रखकर यह नैरेटिव बनाने की कोशिश करेगी कि कांग्रेस ने एक वर्ग की संवेदनाओं के नाम पर राष्ट्रीय प्रतीक के साथ समझौता किया। इस तरह वंदे मातरम् का विवाद भाजपा के लिए कांग्रेस पर पुराने तुष्टीकरण के आरोप को दोबारा मजबूत करने का अवसर बन सकता है। राजनीतिक रूप से यह भाजपा के लिए प्रभावी मुद्दा हो सकता है, क्योंकि वंदे मातरम् केवल एक गीत नहीं, बल्कि स्वतंत्रता आंदोलन, राष्ट्रीय भावना और सांस्कृतिक पहचान से जुड़ा भावनात्मक प्रतीक है। ऐसे मुद्दों में ऐतिहासिक तर्कों के साथ भावनात्मक अपील भी राजनीतिक बहस की दिशा तय करती है।
कांग्रेस के सामने दोहरी राजनीतिक चुनौती
कांग्रेस के लिए चुनौती केवल भाजपा के आरोपों का जवाब देना नहीं है। पार्टी को यह भी स्पष्ट करना होगा कि दो पद गाने का फैसला किसी तुष्टीकरण या वोट बैंक की राजनीति का नतीजा नहीं था, बल्कि उस दौर की परिस्थितियों और व्यापक राष्ट्रीय सोच से जुड़ा था। साथ ही कांग्रेस को भाजपा के उस राजनीतिक हमले का जवाब देना होगा, जिसमें दो पदों के रुख को राष्ट्रवाद के प्रति अधूरी प्रतिबद्धता के रूप में पेश किया जा सकता है। कांग्रेस के पास अपना सबसे मजबूत तर्क स्वतंत्रता आंदोलन का इतिहास है। पार्टी यह कह सकती है कि वंदे मातरम् को जन आंदोलन और राष्ट्रीय चेतना का प्रतीक बनाने में कांग्रेस और स्वतंत्रता आंदोलन के नेताओं की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। इसलिए राष्ट्रगीत के सम्मान पर सवाल उठाना राजनीतिक आरोप से ज्यादा कुछ नहीं है।
गीत से आगे राष्ट्रवाद की राजनीतिक लड़ाई
मौजूदा विवाद का असली केंद्र यही है कि भाजपा और कांग्रेस दोनों वंदे मातरम् की राष्ट्रीय महत्ता से इनकार नहीं कर रही हैं। टकराव इस बात पर है कि उसके इतिहास और राजनीतिक अर्थ की व्याख्या किस तरह की जाए। भाजपा इसे राष्ट्रवाद की कसौटी और कांग्रेस के राजनीतिक इतिहास पर सवाल उठाने के अवसर के रूप में देख रही है। वहीं कांग्रेस इसे अपने ऐतिहासिक फैसले और समावेशी राष्ट्रवाद की परंपरा के तौर पर पेश कर रही है। यानी आने वाले दिनों में बहस इस बात पर कम रह सकती है कि वंदे मातरम् के कितने पद गाए जाएं और इस बात पर ज्यादा कि कांग्रेस के अतीत को राष्ट्रवाद और मुस्लिम तुष्टीकरण की राजनीति के आईने में कैसे पेश किया जाए। अमित शाह की प्रतिक्रिया के बाद इतना जरूर साफ है कि भाजपा इस मुद्दे को जल्द खत्म होने देने के बजाय कांग्रेस के खिलाफ एक बड़े राजनीतिक नैरेटिव में बदलने की कोशिश करेगी।
