-‘शेडो ट्रांसशिपमेंट’ नेटवर्क पर अमेरिका की कार्रवाई से भारतीय एक्सपोर्टर्स की चिंता बढ़ी, अब मेड इन इंडिया के साथ उत्पादन और ओरिजिन ओरिजिन का प्रमाण भी जरूरी
भारत 19 डेस्क
कानपुर। अमेरिका-चीन टैरिफ युद्ध का अगला असर भारतीय उद्योग के लिए कस्टम्स और कंप्लायंस के मोर्चे पर दिखाई दे सकता है। अमेरिका ने चीन के सामान पर लगाए गए टैरिफ से बचने के लिए तीसरे देशों के इस्तेमाल को लेकर जांच तेज कर दी है। 13 अगस्त की अमेरिकी रिपोर्ट में भारत को भी उन देशों की सूची में रखा गया है जहां चीन से जुड़े संभावित ट्रांसशिपमेंट का जोखिम अधिक माना गया है। यह भारत पर किसी भारतीय कंपनी की टैरिफ चोरी का सीधा आरोप नहीं है। लेकिन इससे अमेरिकी बाजार में निर्यात करने वाली भारतीय कंपनियों के लिए एक नई चुनौती जरूर पैदा हुई है, उन्हें अपने उत्पाद के भारतीय ओरिजिन और मैन्युफैक्चरिंग प्रोसेस को पहले से ज्यादा मजबूती से साबित करना पड़ सकता है।
‘ट्रांसशिपमेंट’ और ‘मेड इन इंडिया’ का फर्क
सामान्य ट्रांसशिपमेंट पूरी तरह वैध व्यापारिक प्रक्रिया हो सकती है। समस्या तब पैदा होती है जब किसी देश का सामान केवल रास्ता बदलकर दूसरे देश का दिखाया जाए और इस तरह ऊंचे टैरिफ से बचने की कोशिश की जाए। उदाहरण के लिए चीन में बना उत्पाद सीधे अमेरिका भेजने पर ऊंचे शुल्क के दायरे में आता है। अगर वही उत्पाद भारत भेजा जाए, वहां केवल मामूली बदलाव किया जाए और फिर उसे भारतीय मूल का बताकर अमेरिका भेजा जाए, तो अमेरिकी सीमा शुल्क इसे टैरिफ इवेजन के रूप में देख सकता है। लेकिन यदि चीन से कोई कंपोनेंट भारत आता है और भारत में उसके आधार पर वास्तविक मैन्युफैक्चरिंग, असेंबली और पर्याप्त वैल्यू एडीशन होता है तो केवल चायनीज कंपोनेंट के इस्तेमाल से पूरा उत्पाद स्वतः चायनीज ओरिजिन नहीं हो जाता। यही अंतर भारतीय उद्योग के लिए सबसे महत्वपूर्ण है।
अब अमेरिकी जांच किन बातों पर हो सकती है
अमेरिका की नई नीति का जोर केवल शिपमेंट के अंतिम लेबल पर नहीं बल्कि पूरी सप्लाई चेन को देखने पर है। भारतीय एक्सपोर्टर्स को भविष्य में इन सवालों के जवाब देने पड़ सकते हैं।
- कच्चा माल और कंपोनेंट्स कहां से आए?
- भारत में मैन्युफैक्चरिंग की वास्तविक प्रक्रिया क्या हुई?
- उत्पाद में कितना वैल्यू एडीशन भारत में हुआ?
- कंपनी की उत्पादन क्षमता कितनी है?
- जिस मात्रा में अमेरिका को माल भेजा गया, क्या उतनी उत्पादन क्षमता भारत में है?
- इन्वॉयसेस और परचेज रिकॉर्ड्सक्या बताते हैं?
- शिपमेंट का रूट क्या रहा?
- उत्पाद के घोषित कंट्री आफ ओरिजिन को साबित करने वाले दस्तावेज कौन से हैं?
यानि मेड इन इंडिया का लेबल पर्याप्त होने के बजाय उसके पीछे की पूरी मैन्युफैक्चरिंग ट्रेल महत्वपूर्ण हो सकती है।
पुणे-गुजरात-चेन्नई पर खास नजरअमेरिकी रिपोर्ट में भारत के पुणे-गुजरात-चेन्नई को पंप्स और कंप्रेसर के संदर्भ में देखा गया है। यह भारतीय उद्योग के लिए चेतावनी से ज्यादा एक संकेत है। जिन क्षेत्रों में चीन से कंपोनेट्स बड़े पैमाने पर आते हैं और भारत में उनका असेंबली और मैन्युफैक्चरिंग होता है, वहां कंपनियों को अपनी सप्लाई-चेन डॉक्यूमेंटेशन को मजबूत करना होगा। इसका मतलब यह नहीं कि ऐसे सभी उत्पाद या कंपनियां संदिग्ध हैं। बल्कि अमेरिकी प्रशासन अब व्यापार के आंकड़ों और सप्लाई चेन पैटर्न्स में असामान्य बदलाव को अधिक बारीकी से देख सकता है।
AI से होगी संदिग्ध शिपमेंट्स की पहचान
अमेरिका ने सीमा शुल्क निगरानी को अधिक तकनीकी बनाने की दिशा में एआई आधारित ‘डिटेक्टिव बॉर्डर’ व्यवस्था की बात कही है। इसका उद्देश्य अलग-अलग व्यापारिक सूचनाओं को मिलाकर ऐसे मामलों की पहचान करना है जहां घोषित ओरिजिन, शिपिंग रूट, कंपोनेंट सोर्स या उत्पादन क्षमता में असंगति दिखाई दे। भारतीय निर्यातकों के लिए इसका सीधा अर्थ है कि कागजी कम्प्लाइंस अब व्यापार की लागत और प्रतिस्पर्धा का हिस्सा बन सकती है। जिस कंपनी के पास अपने कच्चा माल, उत्पादन, इनवॉइसेस और एक्सपोर्ट रिकॉर्ड्स का व्यवस्थित डिजिटल ट्रेल होगा, उसके लिए अमेरिकी जांच का जवाब देना अपेक्षाकृत आसान होगा।
भारतीय उद्योग को क्या तैयारी होगी करनी
- उत्पत्ति प्रमाणीकरण दस्तावेज : यह स्पष्ट होना चाहिए कि उत्पाद में इस्तेमाल होने वाले प्रमुख कंपोनेट्स कहां से आए और भारत में उनका क्या ट्रांसफॉर्मेशन हुआ।- उत्पादन साक्ष्य : कंपनी की उत्पादन क्षमता, मशीनरी, श्रम, बिजली खपत और उत्पाद रिकॉर्ड जैसे आंकड़े जरूरत पड़ने पर उत्पादन की वास्तविकता साबित कर सकें।
- आपूर्ति स्रोतों का विविधीकरण : महत्वपूर्ण कंपोनेंट्स के लिए एक ही देश पर अत्यधिक निर्भरता कम करनी होगी। चीन से आयात जरूरी हो तो भी वैकल्पिक सप्लायर्स घरेलू उत्पादन क्षमता विकसित करनी होगी।
अमेरिकी जांच भारत के लिए खतरा या सुधार का मौका
भारत के लिए इसे केवल अमेरिकी दबाव के रूप में देखने के बजाय निर्यात प्रणाली को अधिक पारदर्शी और प्रतिस्पर्धी बनाने के अवसर के रूप में भी देखा जा सकता है। अगर भारतीय कंपनियां अपनी सप्लाई चेन को अधिक पारदर्शी बनाती हैं, घरेलू वैल्यू एडीशन बढ़ाती हैं और क्रिटिकल कंपोनेंट्स का उत्पादन देश में करती हैं तो इससे केवल अमेरिका के साथ व्यापार में फायदा नहीं होगा। यूरोप, जापान और दूसरे विकसित बाजारों में भी भारतीय उत्पादों की विश्वसनीयता बढ़ सकती है।
असली चुनौती ‘चीन से दूरी’ नहीं, निर्भरता का संतुलनभारत के लिए चीन से व्यापार पूरी तरह समाप्त करना व्यावहारिक समाधान नहीं है। चुनौती यह है कि चीन से आने वाले जरूरी inputs का इस्तेमाल करते हुए भारत में पर्याप्त वैल्यू एडीशन और विनिर्माण क्षमता विकसित की जाए। अमेरिका-चीन टैरिफ युद्ध भारत को एक ऐतिहासिक अवसर दे रहा है। लेकिन इस अवसर का लाभ वही उद्योग उठा पाएगा जो सस्ता उत्पादन, मजबूत सप्लाई चेन और पारदर्शी ओरिजिन डॉक्यूमेंटेशन तीनों को साथ लेकर चलेगा।

