- 12 अगस्त तक यूरोपीय संघ में 5.84 लाख हेक्टेयर क्षेत्र आग से प्रभावित; 2025 रहा रिकॉर्ड अग्निकांड वाला साल, गर्मी-सूखे के बीच बेल्जियम तक पहुंची आग ने बढ़ाई चिंता
भारत 19
कानपुर। यूरोप इस समय जंगल की आग के ऐसे दौर से गुजर रहा है, जिसका दायरा अब केवल भूमध्यसागरीय देशों तक सीमित नहीं रह गया है। ग्रीस, स्पेन, फ्रांस और पुर्तगाल से लेकर बेल्जियम तक जंगल और झाड़ियां आग की चपेट में हैं। यूरोपीय आयोग के संयुक्त अनुसंधान केंद्र (JRC) की यूरोपीय वन अग्नि सूचना प्रणाली (EFFIS) के 12 अगस्त तक के आंकड़ों के मुताबिक, यूरोपीय संघ में 5,84,266 हेक्टेयर क्षेत्र आग से प्रभावित हो चुका था। यह 2006-2025 के इसी अवधि के दीर्घकालिक औसत 2,43,189 हेक्टेयर से करीब 2.4 गुना है। यानी इस साल की आग को केवल कुछ देशों में लगी बड़ी घटनाओं के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा। आग का फैलाव, उसकी तीव्रता और प्रभावित होने वाले भौगोलिक क्षेत्र तीनों यूरोप के लिए बढ़ते जोखिम का संकेत दे रहे हैं।
2025 का रिकॉर्ड, 2026 में भी खतरा बरकरार
तुलना करने पर स्थिति और गंभीर दिखाई देती है। यूरोपीय आयोग के अनुसार 2025 यूरोपीय संघ में 2006 से शुरू हुए EFFIS रिकॉर्ड का सबसे विनाशकारी अग्निकांड वर्ष रहा। पूरे साल 10,79,538 हेक्टेयर क्षेत्र आग से जला। इसके मुकाबले 2024 में 3,83,317 हेक्टेयर क्षेत्र जला था, जबकि 2006-2024 का औसत 3,54,185 हेक्टेयर रहा। इस लिहाज से 2026 अभी पूरे साल के आंकड़े में 2025 के रिकॉर्ड से पीछे है, लेकिन अगस्त के मध्य तक ही दीर्घकालिक औसत के दोगुने से ज्यादा क्षेत्र का प्रभावित होना बताता है कि आग का मौसम सामान्य नहीं है। यूरोपीय आयोग के आंकड़े यह भी बताते हैं कि जंगल की आग का मौसम लंबा और ज्यादा तीव्र होने का रुझान बना हुआ है। 2025 में यूरोपीय संघ के अलावा EFFIS द्वारा निगरानी किए जाने वाले अन्य यूरोपीय क्षेत्रों को शामिल करें तो कुल जला क्षेत्र 22 लाख हेक्टेयर से अधिक था।
बेल्जियम की आग ने बदला जोखिम का भूगोल
इस साल की सबसे चौंकाने वाली घटनाओं में बेल्जियम का हाई फेंस नेचर रिजर्व है। Reuters की 17 अगस्त की रिपोर्ट के मुताबिक यहां आग करीब 3,000 हेक्टेयर क्षेत्र में फैल चुकी थी और जर्मनी की सीमा की ओर बढ़ रही थी। करीब 500 अग्निशमनकर्मी, सैनिक, किसान और अन्य कर्मचारी आग पर काबू पाने में जुटे थे। बारिश से कुछ राहत मिली, लेकिन पीट वाली जमीन के भीतर आग सुलगते रहने से खतरा पूरी तरह खत्म नहीं हुआ। यूरोपीय मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक यह बेल्जियम की अब तक की सबसे बड़ी जंगल की आग है। इस आग ने आसपास के इलाकों से लोगों को निकालने और पड़ोसी देशों से मदद लेने की स्थिति पैदा कर दी। यही घटना यूरोप के बदलते अग्नि-भूगोल की ओर संकेत करती है। जहां बड़े जंगलों की आग लंबे समय से दक्षिणी यूरोप की समस्या मानी जाती रही है, वहीं अब मध्य और उत्तरी यूरोप के हिस्से भी गंभीर आग की चपेट में आ रहे हैं।
ग्रीस से स्पेन तक तबाही
ग्रीस के सलामीना द्वीप में 16 अगस्त को लगी आग में एक बुजुर्ग दंपती की मौत हुई और 500 से अधिक लोगों को सुरक्षित निकाला गया। Reuters के मुताबिक आग तेज हवाओं के बीच तेजी से फैली और कई घर प्रभावित हुए। स्पेन में भी स्थिति गंभीर बनी हुई है। Reuters की 17 अगस्त की रिपोर्ट के अनुसार देश में इस साल 40,000 हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र जल चुका है, जबकि आग बुझाने के दौरान एक अग्निशमनकर्मी की मौत हुई। क्रोएशिया और पुर्तगाल में भी आग ने बड़े इलाकों को प्रभावित किया है।
गर्मी और सूखे ने तैयार किया बारूद
यूरोप में मौजूदा आग के पीछे सबसे बड़ा साझा कारण असामान्य गर्मी, लंबे समय तक सूखे की स्थिति, सूखी वनस्पति और तेज हवाओं का मेल है। Reuters ने भी मौजूदा अग्निकांडों को लंबे समय से चली आ रही गर्मी और सूखे की स्थिति से जोड़ा है, जिसे जलवायु परिवर्तन और अधिक गंभीर बना रहा है। हालांकि हर आग का कारण जलवायु परिवर्तन नहीं है। मानवीय गतिविधियां भी जंगलों में आग का बड़ा कारण हैं। यूरोपीय वन अग्नि सूचना प्रणाली के मुताबिक उसके आंकड़ों में कुछ ऐसी आग भी शामिल हो सकती हैं जो वनस्पति प्रबंधन के लिए जानबूझकर लगाई गई हों। इसलिए किसी एक आग के पीछे जलवायु परिवर्तन को सीधा कारण बताने के बजाय गर्मी और सूखे से आग के लिए अनुकूल परिस्थितियां बनने को ज्यादा वैज्ञानिक निष्कर्ष माना जाएगा।
भविष्य में दक्षिण एशिया के जंगलों को भी खतरा
यूरोप की आग का भारत से संबंध आज के मौसम से ज्यादा भविष्य की जलवायु से जुड़ा है। जंगलों के जलने से कार्बन डाइऑक्साइड और अन्य गैसें वायुमंडल में पहुंचती हैं। साथ ही जो वन क्षेत्र कार्बन को सोखने का काम करते थे, उनकी क्षमता भी कम हो जाती है। इसका असर वैश्विक तापमान और जलवायु व्यवस्था पर पड़ता है। यही कारण है कि यूरोप में आग का लगातार बढ़ता दायरा भारत के लिए भी चेतावनी है। अगर गर्मी, सूखा और अत्यधिक मौसम की घटनाएं बढ़ती रहीं तो दक्षिण एशिया में भी जंगलों की आग का जोखिम बढ़ सकता है।
यूरोप की आग भारत के लिए सबक
पूरे घटनाक्रम का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि 2025 के रिकॉर्ड के बाद 2026 में भी यूरोप का अग्निकांड औसत से बहुत ऊपर बना हुआ है। JRC के अनुसार 12 अगस्त तक 5.84 लाख हेक्टेयर क्षेत्र आग से प्रभावित हो चुका था, जबकि इसी अवधि का 20 साल का औसत 2.43 लाख हेक्टेयर है। इसलिए यूरोप की मौजूदा आग को केवल ग्रीस, स्पेन या बेल्जियम की स्थानीय आपदा मानना पर्याप्त नहीं होगा। यह बढ़ती गर्मी, सूखे और बदलते अग्नि-भूगोल का संकेत भी है। यूरोप की मौजूदा आग सीधे भारतीय मानसून को बदल रही है, ऐसा प्रमाण नहीं है, लेकिन जिस गर्म और अधिक चरम जलवायु में ये आग बढ़ रही हैं, उससे दक्षिण एशिया भी अछूता नहीं रह सकता।


