उत्तर प्रदेश के बहराइच जिले में घाघरा नदी किनारे हाथ-मुंह धो रहे 12 वर्षीय अनाथ बच्चे सुनील को एक आदमखोर मगरमच्छ ने अपना शिकार बना लिया। ग्रामीणों की भारी मशक्कत के बाद नदी से बच्चे का आधा और क्षत-विक्षत शव बरामद किया गया, जिसके बाद शासन ने पीड़ित परिवार को आर्थिक सहायता देने की घोषणा की है।
बहराइच/ उत्तर प्रदेश के बहराइच जिले से एक बेहद दर्दनाक और रोंगटे खड़े कर देने वाली घटना सामने आई है। जिला मुख्यालय से करीब 45 किलोमीटर दूर स्थित बौंडी थाना क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले सुनील मुरौवा गांव में एक आदमखोर मगरमच्छ ने 12 साल के मासूम बच्चे सुनील को जिंदा निगल लिया। यह घटना गुरुवार दोपहर बाद की बताई जा रही है, जब सुनील अपने चाचा विजय राज सिंह के साथ खेत में धान की रोपाई करने गया था।
करीब 3-4 घंटे तक कड़ी मेहनत करने के बाद, शाम के वक्त दोनों खेत से घर लौट रहे थे। इसी दौरान वे हाथ-पैर धोने के लिए घाघरा नदी के किनारे रुके। सुनील जैसे ही पानी के पास गया, नदी की गहराई से अचानक निकले एक विशालकाय मगरमच्छ ने उस पर हमला कर दिया और उसे अपने मजबूत जबड़ों में जकड़ लिया।
चाचा और ग्रामीणों के सामने तड़पता रहा मासूम
मगरमच्छ के इस अचानक हुए हमले से सुनील के चाचा विजय राज सिंह बुरी तरह घबरा गए। उन्होंने शोर मचाते हुए आसपास के खेतों में काम कर रहे ग्रामीणों को मदद के लिए पुकारा। देखते ही देखते नदी किनारे लोगों की भारी भीड़ जमा हो गई। ग्रामीणों और परिजनों ने बच्चे को दरिंदे के चंगुल से छुड़ाने के लिए नदी में ईंट और पत्थर फेंकने शुरू किए।
सुनील ने भी खुद को बचाने के लिए काफी हाथ-पैर मारे, लेकिन मगरमच्छ की ताकत के आगे मासूम बेबस नजर आया। चश्मदीदों के अनुसार, मगरमच्छ ने खौफनाक तरीके से बच्चे को दो-तीन बार हवा में उछालकर पानी की सतह पर पटका और फिर उसे खींचकर गहरे पानी में ले गया। चंद मिनटों के भीतर ही नदी की लहरों के बीच मगरमच्छ ने बच्चे के आधे शरीर को अपना निवाला बना लिया।
टॉर्च की रोशनी में 5 घंटे चला तलाशी अभियान
घटना की सूचना मिलते ही गांव में कोहराम मच गया। बड़ी संख्या में ग्रामीण बड़े-बड़े बांस के डंडों और लाठियों के साथ नदी किनारे पहुंचे। घाघरा नदी का बहाव काफी तेज होने के कारण तलाशी अभियान में भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ा। ग्रामीणों ने घटनास्थल से करीब 500 मीटर के दायरे में खोजबीन शुरू की।
शाम ढलने और अंधेरा होने के बावजूद ग्रामीणों ने हिम्मत नहीं हारी। वे अपने हाथों में टॉर्च लेकर पानी के भीतर मासूम को ढूंढते रहे। आखिरकार, करीब पांच घंटे की कड़ी मशक्कत के बाद रात लगभग 10 बजे, घटनास्थल से करीब 300 मीटर की दूरी पर नदी की सतह पर बच्चे का आधा शरीर तैरता हुआ दिखाई दिया। ग्रामीणों ने तुरंत शव को नदी से बाहर निकाला और स्थानीय पुलिस को सूचना दी। वन रेंजर साकिब अंसारी के मुताबिक, मगरमच्छ बच्चे का दाहिना पैर और कमर के नीचे का हिस्सा पूरी तरह खा चुका था।
सिर से पहले ही उठ चुका था माता-पिता का साया
इस दर्दनाक हादसे का शिकार हुआ 12 वर्षीय सुनील बेहद गरीब और अनाथ पृष्ठभूमि से आता था। उसके पिता बुधराज की करीब 5 साल पहले और मां की लगभग 7 साल पहले गंभीर बीमारी के कारण मृत्यु हो चुकी थी। माता-पिता के असमय चले जाने के बाद से चारों भाई-बहनों की जिम्मेदारी उनके चाचा विजय राज सिंह पर थी।
सुनील चार भाई-बहनों में दूसरे नंबर पर था। उसकी बड़ी बहन सुमन (14 वर्ष), छोटा भाई संजय (10 वर्ष) और सबसे छोटी बहन सीमा (7 वर्ष) गांव के ही प्राथमिक विद्यालय में पढ़ाई करते हैं। सुनील ने अपने छोटे भाई-बहनों के भरण-पोषण और परिवार की आर्थिक स्थिति को संभालने के लिए पढ़ाई छोड़ दी थी और वह अपने चाचा के साथ खेती-बाड़ी के काम में हाथ बंटाता था।
पुलिस और प्रशासन की त्वरित कार्रवाई
शुक्रवार सुबह बौंडी थाना प्रभारी टीएन मौर्या पुलिस बल के साथ घटनास्थल पर पहुंचे और शव को अपने कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल भेज दिया। थाना प्रभारी ने घटना और सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे वीडियो की पुष्टि की है। वहीं, स्थानीय वन विभाग की टीम को भी क्षेत्र में अलर्ट कर दिया गया है ताकि नदी किनारे दोबारा ऐसा कोई हादसा न हो।
एसडीएम (SDM) प्रकाश सिंह ने इस दुखद घटना पर गहरा शोक व्यक्त करते हुए बताया कि मामले की आधिकारिक जानकारी उच्चाधिकारियों को दे दी गई है। उन्होंने पीड़ित अनाथ परिवार को ढांढस बंधाते हुए आश्वासन दिया कि नियमानुसार दैवीय आपदा राहत कोष के तहत परिवार को 4 लाख रुपये की आर्थिक सहायता राशि जल्द से जल्द प्रदान की जाएगी।
बहराइच की यह हृदयविदारक घटना वन्यजीवों और इंसानों के बीच बढ़ते संघर्ष का एक और भयानक उदाहरण है। घाघरा और सरयू जैसी नदियों के किनारे बसे गांवों में अक्सर मगरमच्छों के हमले की खबरें आती रहती हैं। प्रशासन और वन विभाग को चाहिए कि वे इन संवेदनशील नदी तटों के पास चेतावनी बोर्ड लगाएं और ग्रामीणों को जागरूक करें, ताकि भविष्य में किसी अन्य मासूम को अपनी जान न गंवानी पड़े। इस अनाथ परिवार के लिए सरकार की मदद और ग्रामीणों का सहयोग ही अब एकमात्र सहारा है।

