KANPUR/ कानपुर नगर की विशेष पॉक्सो अदालत ने थाना बिधनू क्षेत्र से जुड़े एक मामले में आरोपी अंकित कुमार को दोषमुक्त कर दिया। विशेष न्यायाधीश पॉक्सो एक्ट/अपर सत्र न्यायाधीश, कोर्ट संख्या-20, कानपुर नगर ने उपलब्ध साक्ष्यों और गवाहों के बयानों का परीक्षण करने के बाद यह फैसला सुनाया। मामला भारतीय दंड संहिता की धारा 363, 366, 376 तथा पॉक्सो एक्ट की धारा 3/4 के तहत दर्ज किया गया था। अभियोजन पक्ष की ओर से लगाए गए आरोपों पर सुनवाई के बाद न्यायालय ने पाया कि आरोपों को आपराधिक मामलों में अपेक्षित मानक के अनुरूप संदेह से परे सिद्ध नहीं किया जा सका, जिसके आधार पर आरोपी को दोषमुक्त किया गया।
अभियोजन और बचाव पक्ष के बीच हुई विस्तृत बहस
मामले में अभियोजन पक्ष ने अपने साक्ष्य और गवाह प्रस्तुत किए, जबकि बचाव पक्ष ने प्रस्तुत तथ्यों और परिस्थितियों पर अपना पक्ष रखा। सुनवाई के दौरान न्यायालय ने उपलब्ध अभिलेखों, गवाहों के बयानों तथा अन्य प्रस्तुत साक्ष्यों का परीक्षण किया। मामले में बचाव पक्ष की ओर से अधिवक्ता ओम नारायण द्विवेदी ने पैरवी की। न्यायालय के अंतिम निर्णय के बाद यह मामला कानूनी हलकों में चर्चा का विषय बना हुआ है।
अदालत ने साक्ष्यों के आधार पर सुनाया फैसला
आपराधिक मामलों में न्यायालय का स्थापित सिद्धांत है कि आरोपों को संदेह से परे सिद्ध किया जाना आवश्यक होता है। न्यायालय ने उपलब्ध सामग्री का परीक्षण करने के बाद आरोपी को संदेह का लाभ देते हुए दोषमुक्त करने का आदेश दिया।
कानूनी प्रक्रिया में न्यायालय आरोपों, दस्तावेजों, गवाहों और प्रस्तुत साक्ष्यों के समग्र परीक्षण के बाद ही निष्कर्ष पर पहुंचता है। इसी क्रम में इस मामले में भी अदालत ने अपना निर्णय सुनाया।

मामले में बचाव पक्ष की ओर से पैरवी कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता ओम नारायण द्विवेदी ने फैसले के बाद कहा कि न्यायालय केवल आरोप नहीं, बल्कि साक्ष्य देखता है। उन्होंने कहा, “पॉक्सो जैसे कानून बच्चों की सुरक्षा के लिए बेहद जरूरी हैं, लेकिन किसी भी गंभीर कानून का इस्तेमाल पूरी जिम्मेदारी और ठोस तथ्यों के आधार पर होना चाहिए। केवल आरोप लगा देने से दोष सिद्ध नहीं हो जाता। अदालत में हर तथ्य की कसौटी पर जांच होती है।” उन्होंने कहा कि कई बार सामाजिक या पारिवारिक विवादों में भी गंभीर धाराएं जोड़ दी जाती हैं, लेकिन न्यायालय निष्पक्ष रूप से साक्ष्यों के आधार पर निर्णय देता है।
बचाव पक्ष की पैरवी रही चर्चा में
मामले में बचाव पक्ष की ओर से अधिवक्ता ओम नारायण द्विवेदी की पैरवी भी चर्चा में रही। अदालत में दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद न्यायालय ने अपना फैसला सुरक्षित रखते हुए अंततः आदेश पारित किया।
भारतीय आपराधिक न्याय व्यवस्था का मूल सिद्धांत है कि आरोप तब तक सिद्ध नहीं माना जाता जब तक वह संदेह से परे साबित न हो जाए। यही सिद्धांत इस मामले में भी लागू हुआ और अदालत ने आरोपी को दोषमुक्त कर दिया। यह फैसला याद दिलाता है कि कानून का उद्देश्य न्याय है न कि केवल आरोपों के आधार पर किसी को दोषी मान लेना।
कानूनी जानकारों का मानना है कि पॉक्सो कानून बच्चों की सुरक्षा के लिए बना अत्यंत महत्वपूर्ण कानून है। लेकिन किसी भी कानून की विश्वसनीयता तभी बनी रहती है जब उसका उपयोग वास्तविक मामलों में मजबूती से और जिम्मेदारी के साथ हो। विशेषज्ञों के अनुसार झूठे या कमजोर मामलों में गंभीर धाराओं का उपयोग होने पर वास्तविक पीड़ितों के मामलों की गंभीरता पर भी असर पड़ सकता है।



