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70 साल से रह रहे परिवारों को मिलेगा घर का हक या चलेगा बुलडोजर? श्रमिक कॉलोनियों पर बड़ा खुलासा

70 साल से बसे हजारों परिवारों की जिंदगी बदल सकता है सरकार का फैसला।श्रमिक कॉलोनियों में अब तय होगा असल मालिक कौन और किसे मिलेगा घर का अधिकार।ओडिशा मॉडल के बाद यूपी में श्रमिक बस्तियों पर शुरू हुई सबसे बड़ी कार्रवाई।

कानपुर। उत्तर प्रदेश की श्रमिक कॉलोनियां आज केवल जर्जर मकानों या सरकारी फाइलों का विषय नहीं हैं, बल्कि यह आज़ादी के बाद देश के औद्योगिक विकास, मजदूर राजनीति और सरकारी नीतियों की पूरी कहानी अपने भीतर समेटे हुए हैं। कानपुर की श्रमिक बस्तियों में रहने वाले हजारों परिवार पिछले कई दशकों से उस दिन का इंतजार कर रहे हैं जब उन्हें अपने घरों का कानूनी मालिकाना हक मिल सके। अब सरकार द्वारा शुरू किए गए नए सर्वे और ओडिशा मॉडल के अध्ययन के बाद यह मुद्दा फिर सुर्खियों में है।

आज़ादी के बाद क्यों पड़ी श्रमिक कॉलोनियों की जरूरत

1947 में देश आजाद होने के बाद सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक थी तेजी से बढ़ते उद्योगों के लिए श्रमिकों की व्यवस्था करना। उस दौर में कानपुर उत्तर भारत का सबसे बड़ा औद्योगिक शहर माना जाता था। यहां एल्गिन मिल, लाल इमली, जेके समूह, कपड़ा मिलें, चमड़ा उद्योग, रेल कारखाने और रक्षा इकाइयों में हजारों मजदूर काम करते थे।ग्रामीण इलाकों से बड़ी संख्या में लोग रोजगार की तलाश में कानपुर आने लगे। लेकिन शहर में उनके रहने के लिए न तो पर्याप्त मकान थे और न ही मूलभूत सुविधाएं। मजदूर झुग्गियों, किराए के छोटे कमरों और अस्थायी बस्तियों में रहने को मजबूर थे। गंदगी, बीमारियां और भीड़भाड़ आम समस्या बन चुकी थी।उद्योगों में उत्पादन प्रभावित न हो और मजदूरों को न्यूनतम आवास सुविधा मिल सके, इसी सोच के साथ सरकार ने

श्रमिक आवास योजना पर काम शुरू किया। कानपुर की अधिकतर श्रमिक कॉलोनियां 1951-52 के आसपास बसाई गईं। इन कॉलोनियों को श्रम विभाग की निगरानी में विकसित किया गया। मकसद था कि फैक्ट्रियों में काम करने वाले मजदूरों को कम किराए पर रहने की सुविधा दी जाए। शहर के विभिन्न हिस्सों में श्रमिक बस्तियां विकसित की गईं, जिनमें शास्त्री नगर, बाबूपुरवा, जूही, गोविंद नगर, पुराना कानपुर, सेवाग्राम, चकेरी, जाजमऊ और दादानगर जैसे इलाके प्रमुख रहे। इन कॉलोनियों को इस तरह बसाया गया कि मजदूर फैक्ट्री क्षेत्रों तक आसानी से पहुंच सकें।

छोटे मकान, लेकिन हजारों परिवारों का सहारा

शुरुआती दौर में इन कॉलोनियों में एक और दो कमरे वाले छोटे मकान बनाए गए। वर्तमान सर्वे के अनुसार कानपुर की 16 श्रमिक बस्तियों में करीब 18 हजार कॉलोनियां हैं, जिनमें 14,529 एक कमरे वाले मकान, 3,486 दो कमरे वाले मकान शामिल हैं। उस समय ये मकान मजदूरों के लिए बड़ी राहत माने जाते थे। यहां पानी, नालियां और सीमित बिजली व्यवस्था दी गई थी।

हालांकि सुविधाएं साधारण थीं, लेकिन झुग्गियों की तुलना में यह जीवन बेहतर माना गया। श्रमिक कॉलोनियों की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि यहां रहने वाले परिवारों को मकानों का मालिक नहीं बनाया गया। श्रम विभाग मकानों का आवंटन करता था और मजदूरों से किराया लिया जाता था। यानी रहने का अधिकार मजदूरों के पास था, लेकिन जमीन और मकानों का स्वामित्व सरकार के पास रहा। यही व्यवस्था आगे चलकर सबसे बड़े विवाद की वजह बनी।

1995 के बाद बिगड़ने लगी व्यवस्था

समाचार रिपोर्ट के अनुसार 1995 तक श्रम विभाग कॉलोनियों का मेंटेनेंस करता रहा। बाद में यह व्यवस्था धीरे-धीरे कमजोर पड़ गई। हालांकि किराया 2011 तक लिया जाता रहा, लेकिन रखरखाव लगभग ठप होता चला गया। समय के साथ मकान जर्जर होने लगे, नालियां टूट गईं, अवैध कब्जे बढ़े, कई परिवारों ने मकान बेच दिए, कई जगह मूल आवंटी की जगह दूसरे लोग रहने लगे। सरकारी रिकॉर्ड और वास्तविक स्थिति में बड़ा अंतर पैदा हो गया। करीब सात दशक बीतने के बाद सबसे बड़ा विवाद मालिकाना हक को लेकर खड़ा हुआ। कई मूल आवंटियों की मृत्यु हो चुकी है। उनके परिवार पीढ़ियों से वहीं रह रहे हैं। कुछ मकान अनौपचारिक रूप से बेच दिए गए।

कई जगह किराएदार बस गए। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि मालिकाना हक किसे मिले, मूल आवंटी को, वर्तमान निवासी को, या सरकार कब्जा हटाए? इसी मुद्दे पर वर्षों से राजनीति और कानूनी लड़ाई चल रही है। जानकारी के अनुसार श्रमिक कॉलोनियों का मामला 1997-98 में बड़ा मोड़ लेकर आया जब यह हाईकोर्ट तक पहुंचा। अदालत ने सरकार से स्थिति स्पष्ट करने और कार्रवाई करने को कहा। उसी समय यह चर्चा शुरू हुई कि लंबे समय से रह रहे परिवारों को मालिकाना अधिकार दिए जाएं। उस दौर में 1978 की मूल लागत के आधार पर मूल्य तय करने की बात भी सामने आई थी। लेकिन नीति स्पष्ट न होने के कारण मामला वर्षों तक अटका रहा। पिछले कुछ वर्षों में श्रमिक कॉलोनियों का मुद्दा फिर राजनीतिक और सामाजिक रूप से महत्वपूर्ण हो गया। हजारों परिवारों की मांग है कि उन्हें उनके घरों का मालिकाना हक दिया जाए।
इसी बीच राज्य सरकार ने दिल्ली मॉडल, महाराष्ट्र मॉडल और अब ओडिशा मॉडल का अध्ययन शुरू किया। सरकारी टीम ने ओडिशा जाकर वहां की श्रमिक कॉलोनियों का अध्ययन किया। ओडिशा में लंबे समय से रह रहे श्रमिक परिवारों को नियमितीकरण और मालिकाना हक देने की प्रक्रिया लागू की गई थी। अब उत्तर प्रदेश सरकार भी उसी तर्ज पर नीति बनाने की तैयारी में है।

वर्तमान में कानपुर की 16 श्रमिक बस्तियों का सर्वे चल रहा है। इसमें मूल आवंटी कौन था, वर्तमान में कौन रह रहा है, मकान का उपयोग कैसा है, कहीं व्यावसायिक उपयोग तो नहीं, अवैध कब्जा तो नहीं जैसी जानकारियां जुटाई जा रही हैं। सरकार जून के पहले सप्ताह में लखनऊ में बैठक कर फाइनल रिपोर्ट तैयार करेगी। सूत्रों और नेताओं के बयानों के आधार पर माना जा रहा है कि सरकार मूल आवंटियों को प्राथमिकता दे सकती है, मामूली शुल्क लेकर फ्रीहोल्ड कर सकती है, अवैध कब्जों की जांच करा सकती है, व्यावसायिक उपयोग वाले मकानों पर अलग नीति बना सकती है

यदि सरकार मालिकाना हक देती है तो परिवार कानूनी रूप से घर के मालिक बन जाएंगे, संपत्ति की खरीद-बिक्री आसान होगी, बैंक लोन मिल सकेगा, पीढ़ियों से चल रही असुरक्षा खत्म हो सकती है। करीब 70 साल पुरानी इन श्रमिक कॉलोनियों का भविष्य अब सरकार की नई नीति पर टिका है। आने वाले महीनों में लिया जाने वाला फैसला हजारों मजदूर परिवारों के जीवन का सबसे बड़ा मोड़ साबित हो सकता है।

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