- आवास, पैमाइश, चकमार्ग और पेंशन जैसी शिकायतें लेकर उप मुख्यमंत्री तक पहुंचे लोग, कई मामलों में अधिकारियों को फोन कर देना पड़ा हस्तक्षेप
भारत 19 लखनऊ। प्रधानमंत्री आवास चाहिए, जमीन की पैमाइश करानी है, चकमार्ग चौड़ा कराना है, नाली बनवानी है या पेंशन का मामला अटका है, इन शिकायतों के निस्तारण के लिए तहसील से लेकर जिला मुख्यालय तक प्रशासनिक तंत्र है। बावजूद इसके सोमवार को ऐसी ही कई फरियादें लखनऊ में उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य के जनता दर्शन में पहुंची। जनता दर्शन में आए मामले सरकार के शिकायत निस्तारण तंत्र की जमीनी स्थिति पर सवाल खड़े करते हैं। सवाल यह नहीं है कि उप मुख्यमंत्री ने फरियादियों की बात सुनी या नहीं, बल्कि यह है कि जिन समस्याओं का समाधान जिले में हो सकता था, उनके लिए लोगों कोसत्ता के शीर्ष तक क्यों पहुंचना पड़ा। कई मामलों में उप मुख्यमंत्री को संबंधित अधिकारियों से फोन पर बात कर कार्रवाई के निर्देश देने पड़े।
आवास और पैमाइश से लेकर चकमार्ग तक शिकायतें
उप मुख्यमंत्री के जनता दर्शन में आगरा के शैलेंद्र, फिरोजाबाद के गंभीर सिंह और उन्नाव की लक्ष्मी प्रधानमंत्री आवास की मांग लेकर पहुंचे। यह योजना पात्रता और सत्यापन की प्रक्रिया से जुड़ी है, जिसका परीक्षण स्थानीय प्रशासन और संबंधित विभाग के स्तर पर होता है। फिर भी इन मामलों को लेकर फरियादियों को उप मुख्यमंत्री तक पहुंचना पड़ा। अमेठी के रामदास चकमार्ग चौड़ा कराने की मांग लेकर लखनऊ पहुंचे। जमीन की पैमाइश, चकमार्ग, नाली और सड़क निर्माण जैसी शिकायतें भी जनता दर्शन में सामने आईं। ये ऐसे विषय हैं जिनके लिए तहसील, राजस्व विभाग, पंचायत और जिला प्रशासन की अपनी जिम्मेदारियां और प्रक्रियाएं तय हैं। कुशीनगर की चम्पा देवी गंभीर हृदय रोग के इलाज और आर्थिक सहायता की मांग लेकर पहुंचीं। उप मुख्यमंत्री ने पीजीआई में उपचार और नियमानुसार सहायता उपलब्ध कराने के लिए अधिकारियों को निर्देश दिए। हरदोई से भाजपा जिलाध्यक्ष अजीत सिंह ‘बब्बन’ भी ग्राम महुईपुरी को स्मार्ट विलेज बनाए जाने का अनुरोध लेकर पहुंचे।
जनता दर्शन में फिर फोन पर सक्रिय हुई व्यवस्था
जनता दर्शन के दौरान उप मुख्यमंत्री ने फरियादियों की समस्याएं सुनीं और कई मामलों में संबंधित अधिकारियों से दूरभाष पर बात की। प्रमुख सचिव कृषि, मेट्रो एवं परिवहन विभाग, पुलिस आयुक्त प्रयागराज और लखनऊ के अलावा रायबरेली, देवरिया, झांसी और गोंडा के अधिकारियों को भी शिकायती पत्रों पर नियमानुसार त्वरित कार्रवाई के निर्देश दिए गए। यहीं इस पूरी तस्वीर की सबसे महत्वपूर्ण विडंबना भी सामने आती है। जिन जिलों के अधिकारियों को आखिरकार उप मुख्यमंत्री के हस्तक्षेप के बाद कार्रवाई करनी थी, शिकायतें पहले उन्हीं जिलों की व्यवस्था से होकर आई थीं। यदि संबंधित स्तर पर समयबद्ध सुनवाई और कार्रवाई हो जाती तो शायद फरियादियों को लखनऊ तक का सफर नहीं करना पड़ता।
शिकायत तंत्र मौजूद, फिर भी राजधानी क्यों पहुंची फरियाद
प्रदेश में जनसुनवाई के लिए तहसील, थाना, ब्लाक, जिला प्रशासन और विभागीय अधिकारियों की व्यवस्था है। ऑनलाइन शिकायत निस्तारण प्रणाली भी संचालित है। सरकार लगातार प्रशासन को जवाबदेह, संवेदनशील और जनता के करीब बताती रही है। लेकिन जनता दर्शन में पहुंचे मामलों ने इस व्यवस्था की दूसरी परत खोल दी। आवास, जमीन की पैमाइश, चकमार्ग और स्थानीय निर्माण जैसे मुद्दे सामान्य प्रशासनिक शिकायतों की श्रेणी में आते हैं। इनमें से हर मामला अधिकारियों की लापरवाही का प्रमाण हो, यह जरूरी नहीं, लेकिन इतने बुनियादी मामलों का सीधे उप मुख्यमंत्री तक पहुंचना स्थानीय शिकायत निस्तारण तंत्र की प्रभावशीलता पर सवाल जरूर खड़ा करता है। यह भी स्पष्ट नहीं है कि फरियादियों ने पहले अपने जिले में कहां-कहां शिकायत की, वहां क्या कार्रवाई हुई और किस कारण उन्हें लखनऊ आना पड़ा। सरकारी विज्ञप्ति इस बारे में कोई जानकारी नहीं देती। हालांकि, जनता दर्शन में मामलों का पहुंचना इतना जरूर बताता है कि स्थानीय स्तर पर उपलब्ध व्यवस्था हर फरियादी के लिए पर्याप्त साबित नहीं हुई।
गुड गवर्नेंस की असली परीक्षा नीचे की व्यवस्था
उप मुख्यमंत्री ने जनता दर्शन में संवेदनशीलता के साथ समस्याएं सुनीं और अधिकारियों को नियम संगत तथा त्वरित कार्रवाई के निर्देश दिए। व्यक्तिगत रूप से शिकायत सुनना और जरूरत पड़ने पर तत्काल हस्तक्षेप करना फरियादियों के लिए राहत का रास्ता बन सकता है। लेकिन शासन व्यवस्था की सफलता का पैमाना केवल यह नहीं हो सकता कि लखनऊ पहुंचने पर किसी फरियादी की सुनवाई हो जाए। असली परीक्षा यह है कि उसे लखनऊ आने की जरूरत ही न पड़े। जिस दिन प्रधानमंत्री आवास के पात्र को अपने जिले में जवाब मिल जाएगा, जमीन की पैमाइश के लिए तहसील के चक्कर नहीं काटने पड़ेंगे, चकमार्ग की शिकायत स्थानीय स्तर पर सुनी जाएगी और पेंशन या दूसरी बुनियादी समस्याओं के लिए सत्ता के शीर्ष तक पहुंचने की जरूरत नहीं होगी, उसी दिन शिकायत निस्तारण व्यवस्था को वास्तव में प्रभावी कहा जा सकेगा।

