- अखिलेश की चुनौती पर मुख्यमंत्री का पलटवार, बोले- चेलों से क्यों लड़ना, आमने-सामने मुकाबला करिए, 2027 से पहले अयोध्या सीट पर सियासी हलचल तेज, 2017 और 2022 में भाजपा ने दर्ज की थी जीत
भारत 19/ लखनऊ। उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले अयोध्या की सियासत गरमा गई है। समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को अयोध्या से चुनाव लड़ने की चुनौती दी तो योगी ने पलटवार करते हुए उन्हें भी इसी सीट से नामांकन करने का ऑफर दे दिया। मुख्यमंत्री ने कहा कि मुकाबला करना है तो आमने-सामने आइए, अपने समर्थकों के जरिए क्यों लड़ना? दोनों नेताओं के बीच जुबानी जंग के बाद अयोध्या विधानसभा सीट एक बार फिर प्रदेश की सियासत के केंद्र में आ गई है।
अखिलेश की चुनौती पर योगी का जवाब, ‘आप भी नामांकन करिए’
बलरामपुर में एक कार्यक्रम के दौरान मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अखिलेश यादव की चुनौती का जवाब देते हुए उन्हें अयोध्या से चुनाव लड़ने का ऑफर दिया। योगी ने कहा कि अखिलेश उन्हें अयोध्या से चुनाव लड़ने की चुनौती दे रहे हैं, इसलिए वह भी वहां से नामांकन करें और आमने-सामने मुकाबला करके अपनी किस्मत आजमाएं। मुख्यमंत्री ने सपा पर निशाना साधते हुए कहा कि मुकाबला करना है तो खुद मैदान में उतरना चाहिए। इससे पहले अयोध्या दौरे पर पहुंचे अखिलेश यादव ने कहा था कि भाजपा को इस सीट से उम्मीदवार तय करने में परेशानी हो रही है। उन्होंने मुख्यमंत्री को चुनौती दी थी कि यदि उन्हें अपनी लोकप्रियता पर भरोसा है तो वह खुद अयोध्या से चुनाव लड़कर दिखाएं। योगी के जवाब के बाद यह बयानबाजी 2027 के चुनाव से पहले दोनों दलों के बीच राजनीतिक मुकाबले का नया मुद्दा बन गई है।
अखिलेश का पलटवार, बोले- PDA का युवा प्रहरी ही काफी
योगी के ऑफर के बाद अखिलेश यादव ने भी जवाब दिया। उन्होंने 2024 के लोकसभा चुनाव में फैजाबाद सीट पर भाजपा की हार का जिक्र करते हुए कहा कि अयोध्या में भाजपा को हराने के लिए सपा का एक युवा ‘PDA प्रहरी’ ही काफी है। PDA से सपा का आशय पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक वर्गों से है। सपा ने अयोध्या विधानसभा सीट से तेज नारायण पांडेय उर्फ पवन पांडेय को अपना उम्मीदवार घोषित किया है। ऐसे में अखिलेश की चुनौती और योगी के जवाब को केवल दो नेताओं की बयानबाजी के बजाय 2027 के चुनाव से पहले उम्मीदवारों और सामाजिक समीकरणों को लेकर चल रही राजनीतिक तैयारी के संदर्भ में भी देखा जा रहा है।
अयोध्या सीट का चुनावी इतिहास : 2012 में सपा, फिर भाजपा की लगातार दो जीत
अयोध्या विधानसभा सीट का चुनावी इतिहास भाजपा और समाजवादी पार्टी के बीच मुकाबले की तस्वीर पेश करता है। वर्ष 2012 में सपा के तेज नारायण पांडेय उर्फ पवन पांडेय ने भाजपा के लल्लू सिंह को 5,405 वोटों से हराकर जीत दर्ज की थी। इसके बाद 2017 में भाजपा के वेद प्रकाश गुप्ता ने सपा के पवन पांडेय को 50,440 वोटों के बड़े अंतर से पराजित किया। 2022 के विधानसभा चुनाव में भी वेद प्रकाश गुप्ता ने अपनी सीट बरकरार रखी, लेकिन इस बार जीत का अंतर घटकर 19,990 वोट रह गया। उन्हें 1,13,414 वोट मिले, जबकि सपा के पवन पांडेय को 93,424 वोट हासिल हुए। बसपा के रवि प्रकाश 17,706 वोटों के साथ तीसरे स्थान पर रहे।
इस तरह भाजपा ने 2017 और 2022 में लगातार जीत दर्ज की, जबकि सपा दोनों चुनावों में प्रमुख चुनौती बनी रही। 2024 के लोकसभा चुनाव में फैजाबाद सीट से सपा के अवधेश प्रसाद की जीत ने अयोध्या क्षेत्र की राजनीति को राष्ट्रीय चर्चा में ला दिया। हालांकि, लोकसभा और विधानसभा चुनावों का क्षेत्र तथा चुनावी गणित अलग होता है। इसलिए फैजाबाद लोकसभा का नतीजा अयोध्या विधानसभा सीट के संभावित परिणाम का सीधा संकेत नहीं माना जा सकता।
जातीय और सामाजिक समीकरण : कई समुदायों की भूमिका अहम
अयोध्या विधानसभा क्षेत्र के सामाजिक समीकरण में ब्राह्मण, मुस्लिम, वैश्य, यादव, अनुसूचित जाति, चौहान, निषाद, ठाकुर और कुर्मी समेत कई समुदाय महत्वपूर्ण माने जाते हैं। वर्ष 2021 की एक मीडिया पड़ताल में ब्राह्मण मतदाताओं की संख्या करीब 45 हजार, मुस्लिम मतदाताओं की 44 हजार, अनुसूचित जातियों की 43 हजार, वैश्य समुदाय की 42 हजार और यादव मतदाताओं की करीब 36 हजार बताई गई थी। इसी रिपोर्ट में चौहान समुदाय के लगभग 33 हजार और निषाद समुदाय के करीब 24 हजार मतदाताओं का अनुमान दिया गया था। ये पुराने मीडिया-आधारित अनुमान हैं, आधिकारिक जातिवार मतदाता आंकड़े नहीं। इन्हें 2027 के चुनाव की वर्तमान मतदाता संख्या के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
भाजपा के लिए राम मंदिर, अयोध्या का विकास और हिंदुत्व से जुड़ा विमर्श चुनावी चर्चा के प्रमुख विषय रह सकते हैं। वहीं सपा PDA के सामाजिक गठजोड़, स्थानीय उम्मीदवार पवन पांडेय और 2024 के फैजाबाद लोकसभा नतीजे को राजनीतिक संदेश के रूप में सामने रख सकती है। हालांकि, किसी समुदाय को किसी एक पार्टी का पक्का मतदाता मानना सही नहीं होगा। उम्मीदवार की स्थानीय पकड़, पार्टी संगठन, रोजगार, कारोबार, मुआवजा, बुनियादी सुविधाएं और स्थानीय समस्याएं भी मतदान को प्रभावित कर सकती हैं। अयोध्या की राजनीति में धार्मिक पहचान के साथ स्थानीय विकास और मतदाताओं की अपेक्षाएं भी महत्वपूर्ण हैं। ऐसे में 2027 के चुनाव में दोनों दलों की रणनीति, उम्मीदवारों की स्वीकार्यता और क्षेत्रीय मुद्दे इस सीट की राजनीतिक दिशा तय करने में भूमिका निभाएंगे।
क्या योगी और अखिलेश अयोध्या से आमने-सामने होंगे?
फिलहाल दोनों नेताओं के बीच बयानबाजी को चुनावी चुनौती के रूप में देखा जा रहा है, लेकिन इसे तय मुकाबला नहीं माना जा सकता। योगी आदित्यनाथ ने अखिलेश यादव को अयोध्या से नामांकन करने का ऑफर दिया है, लेकिन दोनों नेताओं में से किसी के भी इसी सीट से चुनाव लड़ने की अंतिम स्थिति औपचारिक उम्मीदवार घोषणा के बाद ही स्पष्ट होगी।


