– 75 जिलों में पहले चरण में 900 नए न्यायालयों को मंजूरी; 1.20 करोड़ से अधिक लंबित मुकदमों के बीच 9,084 पद होंगे सृजित, 693.59 करोड़ रुपये सालाना खर्च आएगा
भारत 19
लखनऊ। उत्तर प्रदेश की अधीनस्थ अदालतों में लंबित मुकदमों के भारी बोझ को कम करने की दिशा में प्रदेश सरकार ने बड़ा कदम उठाया है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक में पहले चरण में 900 नए न्यायालय स्थापित करने के प्रस्ताव को मंजूरी दी गई है। ये अदालतें प्रदेश के सभी 75 जिलों में मुकदमों की लंबित संख्या के आधार पर स्थापित की जाएंगी। सरकार के मुताबिक जिला अदालतों में 1,20,66,105 मुकदमे लंबित हैं।
237 अपर जिला जज, 391 सिविल जज सीनियर डिवीजन
900 नए न्यायालयों में 237 अपर जिला एवं सत्र न्यायालय, 391 सिविल जज सीनियर डिवीजन और 272 सिविल जज जूनियर डिवीजन स्तर की अदालतें शामिल होंगी। किस जिले में कितनी अदालतें स्थापित होंगी, इसका निर्धारण वहां लंबित मुकदमों की संख्या के आधार पर किया जाएगा। इसका मतलब यह है कि समान संख्या में अदालतें हर जिले में नहीं खुलेंगी। जिन जिलों में मुकदमों का दबाव ज्यादा है, वहां अतिरिक्त न्यायालयों की जरूरत के मुताबिक संख्या तय की जाएगी।
900 अदालतों के साथ 9,084 पदों का सृजन
नई अदालतों के संचालन के लिए 9,084 पदों को भी मंजूरी दी गई है। इनमें 6,656 नियमित और 2,428 आउटसोर्स पद शामिल हैं। न्यायिक अधिकारियों के अलावा स्टेनोग्राफर, रीडर, मुंसरिम, वरिष्ठ सहायक, कनिष्ठ सहायक और अन्य जरूरी कर्मचारियों की व्यवस्था भी इन अदालतों के साथ की जाएगी। सरकार पर इन अदालतों और संबंधित पदों के कारण करीब 693.59 करोड़ रुपये सालाना आवर्ती खर्च आएगा। इसके अलावा लगभग 8.72 करोड़ रुपये का अनावर्ती खर्च प्रस्तावित है। उपलब्ध विवरण के अनुसार इस राशि में अदालतों के लिए आवश्यक आधारभूत ढांचे का खर्च शामिल नहीं है।
हाईकोर्ट ने 9,149 अतिरिक्त अदालतों की जरूरत बताई थी
900 अदालतों की मंजूरी को प्रदेश में अतिरिक्त न्यायिक ढांचे के विस्तार की बड़ी योजना के पहले चरण के रूप में देखा जा रहा है। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने राष्ट्रीय अदालत प्रबंधन प्रणाली समिति के मानकों के आधार पर प्रदेश में 9,149 अतिरिक्त अदालतों की जरूरत का प्रस्ताव रखा था। हाईकोर्ट के एक रिकॉर्ड में इस प्रस्ताव और चरणबद्ध तरीके से अदालतें स्थापित करने की प्रक्रिया का उल्लेख है। इस लिहाज से मंगलवार को मंजूर 900 अदालतें प्रस्तावित जरूरत का शुरुआती हिस्सा हैं। आगे की अदालतों की स्थापना चरणबद्ध तरीके से होने की संभावना है।
भर्ती और ढांचा तैयार होने के बाद शुरू होगा संचालन
नई अदालतों की मंजूरी के साथ ही सभी अदालतें तत्काल काम करना शुरू नहीं करेंगी। उपलब्ध कैबिनेट विवरण के मुताबिक नए पदों पर भर्ती की प्रक्रिया मौजूदा स्वीकृत पदों की रिक्तियों को भरने और जरूरी आधारभूत सुविधाएं उपलब्ध होने के बाद शुरू की जाएगी। यानी लंबित मामलों में वास्तविक कमी का असर अदालतों के गठन, न्यायिक अधिकारियों और कर्मचारियों की नियुक्ति तथा जरूरी बुनियादी सुविधाएं तैयार होने के बाद दिखाई देगा।
मुकदमों के निस्तारण की क्षमता बढ़ाना मुख्य लक्ष्य
अदालतों की संख्या बढ़ने से न्यायिक अधिकारियों पर मामलों का दबाव कम करने और अधिक मामलों की सुनवाई संभव होने की उम्मीद है। सरकार का उद्देश्य अतिरिक्त न्यायालयों के जरिए मुकदमों के त्वरित निस्तारण की क्षमता बढ़ाना है। हालांकि केवल अदालतों की संख्या बढ़ना लंबित मामलों के तत्काल निस्तारण की गारंटी नहीं है; इसका असर नियुक्तियों, बुनियादी ढांचे और सुनवाई की वास्तविक क्षमता बढ़ने के बाद ही सामने आएगा।
जनता के लिए क्यों अहम है फैसला
लंबे समय से अदालतों में लंबित मामलों का असर मुकदमे के दोनों पक्षों पर पड़ता है। सुनवाई की तारीखें बढ़ने से समय और खर्च दोनों बढ़ते हैं। ऐसे में अतिरिक्त अदालतें स्थापित होने से नए और पुराने दोनों मामलों की सुनवाई के लिए न्यायिक क्षमता बढ़ाने का रास्ता खुलता है। खास तौर पर उन जिलों को लाभ मिलने की संभावना है जहां मुकदमों की संख्या अधिक है।


