- क्षेत्रीय अध्यक्ष की संगठन में रहते चुनावी तैयारी करने वालों को पद छोड़ने की नसीहत के बीच जिलाध्यक्ष और कई पदाधिकारी टिकट की दौड़ में शामिल, आर्यनगर, सीसामऊ, छावनी और कल्याणपुर में दावेदारों की लंबी कतार
Bharat 19/ राजीव सक्सेना, कानपुर। कानपुर में 2027 के विधानसभा चुनाव की दस्तक से पहले टिकट की दावेदारी ने संगठन के भीतर हलचल बढ़ा दी है। दिलचस्प यह है कि पार्टी के कानपुर-बुंदेलखंड क्षेत्रीय अध्यक्ष रामकिशोर साहू ने हाल ही में साफ किया था कि संगठन में रहते हुए चुनाव लड़ने की तैयारी करने वाले नेताओं को अपने पद से इस्तीफा दे देना चाहिए। बावजूद इसके वर्तमान और पूर्व जिलाध्यक्षों समेत संगठन के कई पदाधिकारी उनकी अनदेखी कर विधानसभा चुनाव की टिकट पाने की दौड़ में सक्रिय हैं। भाजपा में दावेदारों की लंबी कतार होने से पदाधिकारियों को डर है कि टिकट पाने में नाकामयाब होने की सूरत में सत्ता का रुतबा तो बरकरार रहेगा। दावेदारी पक्की करने के लिए वह दिल्ली और लखनऊ के बड़े नेता की परिक्रमा भी कर रहे हैं। सबसे ज्यादा दावेदारी आर्यनगर, सीसामऊ और छावनी सीटों के लिए है, इन सीटों पर पार्टी को पिछले दो चुनावों में शिकस्त झेलनी पड़ी थी। तीन सीटों के अलावा कल्याणपुर सीट से भी दावेदारी करने के लिए संगठन के कई पदाधिकारियों में जोर आजमाइश है।
2027 दूर, भाजपा में टिकट का हिसाब शुरू
विधानसभा चुनाव में अभी चार से पांच माह का वक्त है, लेकिन सत्तारूढ़ भाजपा में टिकट को लेकर हलचल कापी पहले से ही शुरू हो चुकी है। 2027 भी इससे अलग नहीं है। मौजूदा विधायक अपनी सीट पर पकड़ बनाए रखने की कोशिश में हैं तो पिछला चुनाव हार चुके नेता वापसी की तैयारी में जुटे हैं। इनके बीच संगठन के वर्तमान और पूर्व जिलाध्यक्षों के साथ जिला और प्रदेश इकाई के पदाधिकारी भी अपनी संभावना तलाश रहे हैं। टिकट की दावेदारी उन सीटों पर ज्यादा दिखाई दे रही है, जहां भाजपा पिछले चुनाव में जीत हासिल नहीं कर सकी थी। कानपुर में आर्यनगर, सीसामऊ और छावनी इसी श्रेणी में आती हैं। इन सीटों पर पार्टी के भीतर नए और पुराने चेहरों के बीच टिकट को लेकर जोर आजमाइश तेज है।
2017 की 47 सीटों से 2022 में 40 पर आई भाजपा
कानपुर-बुंदेलखंड क्षेत्र की चुनावी तस्वीर देखें तो 2017 में भाजपा का प्रदर्शन बेहद मजबूत रहा था। क्षेत्र की 52 विधानसभा सीटों में से भाजपा ने 47 सीटों पर जीत दर्ज की थी। केवल पांच सीटों पर पार्टी के प्रत्याशी चुनाव नहीं जीत सके थे। इनमें कानपुर की आर्यनगर, सीसामऊ और छावनी सीटें भी शामिल थीं। 2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा की अपनी सीटों की संख्या घटकर 40 रह गई। चुनावी गठबंधन के तहत पार्टी को कई सीटें अपने सहयोगियों के लिए भी छोड़नी पड़ी थीं। उसके सहयोगियों ने तीन सीटों पर जीत हासिल की, लेकिन भाजपा की अपनी सीटों का आंकड़ा 2017 की तुलना में कम रहा। कानपुर की आर्यनगर, सीसामऊ और छावनी सीटें इस चुनाव में भी भाजपा के हाथ नहीं आईं। ऐसे में 2027 के लिए इन सीटों पर उम्मीदवार का चयन पार्टी के लिए खासा अहम माना जा रहा है।
छह सीटें भाजपा के पास, घाटमपुर सहयोगी के खाते में
फिलहाल कानपुर में भाजपा के पास महाराजपुर, कल्याणपुर, गोविंद नगर, बिठूर, बिल्हौर और किदवई नगर विधानसभा सीटें हैं। घाटमपुर विधानसभा सीट भाजपा की सहयोगी पार्टी अपना दल के पास है। यहां सरोज कुरील विधायक हैं। कानपुर में भाजपा के मौजूदा विधायकों में सतीश महाना, नीलिमा कटियार, अभिजीत सिंह सांगा, राहुल बच्चा, सुरेंद्र मैथानी और महेश त्रिवेदी शामिल हैं। वहीं सलिल विश्नोई, सुरेश अवस्थी और रघुनंदन सिंह भदौरिया पिछला चुनाव हार चुके हैं। ये नेता भी फिर टिकट की दौड़ में हैं। 2022 में टिकट वितरण के दौरान कई नेताओं के टिकट कटने की नौबत बनी थी। अंतिम दौर में टिकट वितरण को लेकर अचानक पैदा हुई स्थिति के बीच पार्टी ने डैमेज कंट्रोल किया और कई नेताओं को फिर टिकट मिल गया था। इस बार भी टिकट को लेकर संगठन के भीतर गतिविधियां तेज हैं।
छावनी में शिवराम सिंह की दावेदारी चर्चा में
दक्षिण जिला अध्यक्ष शिवराम सिंह छावनी विधानसभा सीट से बड़े दावेदार माने जा रहे हैं। इस सीट पर रघुनंदन सिंह भदौरिया लगातार दो चुनाव हार चुके हैं। ऐसे में शिवराम सिंह का नाम प्रमुखता से सामने आ रहा है। शिवराम सिंह दो बार से पार्टी के जिलाध्यक्ष हैं। वह रघुनंदन सिंह भदौरिया की तरह ही क्षत्रिय समाज से आते हैं। संगठन में उनकी सक्रियता और लगातार दो बार जिलाध्यक्ष रहने को उनकी दावेदारी के मजबूत पक्ष के तौर पर देखा जा रहा है।
सीसामऊ-आर्यनगर में टिकट को लेकर सबसे ज्यादा हलचल
कानपुर की सीसामऊ और आर्यनगर सीटों पर टिकट को लेकर सबसे ज्यादा दावेदारी दिखाई दे रही है। सीसामऊ से पूर्व विधायक राकेश सोनकर एक बार फिर टिकट के लिए दावा कर रहे हैं। वह इस सीट पर भाजपा को जीत दिलाने वाले एकमात्र नेता रहे हैं। भाजपा 1996 के बाद से सीसामऊ में जीत हासिल नहीं कर सकी है। पूर्व जिलाध्यक्ष सुनील बजाज सीसामऊ और आर्यनगर दोनों सीटों पर प्रयास कर रहे हैं। वह फिलहाल कानपुर उद्योग व्यापार मंडल के जिला अध्यक्ष भी हैं। उत्तर जिला में करीब एक साल अध्यक्ष रहे दीपू पांडेय भी सीसामऊ और आर्यनगर दोनों सीटों पर अपनी दावेदारी कर रहे हैं। वहीं वर्तमान जिलाध्यक्ष अनिल दीक्षित भी पीछे नहीं हैं। वह सीसामऊ और आर्यनगर के अलावा कल्याणपुर विधानसभा सीट पर भी टिकट की दावेदारी कर रहे हैं। यानी जिन नेताओं के कंधों पर संगठन की जिम्मेदारी है, उनमें से कुछ के लिए अब संगठन की जिम्मेदारी के साथ विधानसभा पहुंचने की संभावनाएं भी राजनीतिक चर्चा का हिस्सा हैं।
घाटमपुर में उपेंद्र पासवान की दावेदारी
ग्रामीण जिला इकाई के अध्यक्ष उपेन्द्र पासवान भी टिकट की दौड़ में शामिल हैं। वह घाटमपुर विधानसभा सीट से चुनाव जीत चुके हैं और एक बार फिर इसी सीट से अपनी दावेदारी कर रहे हैं। हालांकि घाटमपुर में भाजपा के सामने गठबंधन की राजनीतिक मजबूरी है। पिछली बार पार्टी ने यह सीट अपने सहयोगी दल अपना दल के लिए छोड़ दी थी। सरोज कुरील यहां से विधायक हैं। ऐसे में अपना दल को साथ लेकर चलने की बाध्यता के कारण घाटमपुर में भाजपा का अपना प्रत्याशी उतारना फिलहाल मुश्किल माना जा रहा है।
संगठन की कुर्सी से विधानसभा की टिकट तक
कानपुर में टिकट की दावेदारी की तस्वीर अब काफी हद तक साफ होने लगी है। मौजूदा विधायक अपनी सीट बचाने में जुटे हैं, पूर्व विधायक वापसी की कोशिश में हैं और संगठन के वर्तमान-पूर्व पदाधिकारी भी अपनी राजनीतिक जमीन तलाश रहे हैं। पूर्व जिलाध्यक्ष सुरेंद्र मैथानी पहले से गोविंद नगर से विधायक हैं। बाकी वर्तमान और पूर्व जिलाध्यक्षों के सामने संगठन की जिम्मेदारी और चुनावी दावेदारी के बीच संतुलन का सवाल है। यही इस बार भाजपा की टिकट कवायद का सबसे दिलचस्प पहलू भी है। एक तरफ संगठन में रहते हुए चुनावी तैयारी करने वालों को पद छोड़ने की नसीहत है, दूसरी तरफ संगठन के कई चेहरे खुद विधानसभा टिकट की दौड़ में नजर आ रहे हैं। ऐसे में कानपुर में 2027 के टिकट की लड़ाई सिर्फ संभावित प्रत्याशियों के बीच नहीं, बल्कि संगठन की भूमिका और चुनावी महत्वाकांक्षा के बीच भी दिखाई दे रही है।

