इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पुलिस कमिश्नरेट प्रणाली में ‘शांति भंग’ संबंधी धाराओं के कथित दुरुपयोग पर कड़ा रुख अपनाते हुए महत्वपूर्ण निर्देश जारी किए हैं। अदालत ने एक मामले में 8 दिन की अवैध हिरासत को असंवैधानिक मानते हुए पीड़ित को ₹2 लाख मुआवजा देने और राशि दोषी अधिकारी के वेतन से वसूलने का आदेश दिया है।
PRAYAGRAJ/ प्रयागराज स्थित इलाहाबाद हाईकोर्ट ने नागरिकों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता को सर्वोच्च बताते हुए ‘शांति भंग’ की धाराओं के उपयोग को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। न्यायमूर्ति सिद्धार्थ और न्यायमूर्ति विनय कुमार द्विवेदी की खंडपीठ ने मंसूर अहमद उर्फ लल्लू की हेबियस कॉर्पस याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश जारी किया। अदालत ने कहा कि किसी भी व्यक्ति को वैधानिक प्रक्रिया का पालन किए बिना हिरासत में रखना संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है।
क्या था मामला?
याचिका के अनुसार, प्रयागराज के खीरी थाना क्षेत्र से मंसूर अहमद को पुलिस द्वारा हिरासत में लिया गया था। आरोप था कि उन्हें निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन किए बिना एक मुद्रित प्रोफार्मा आदेश के आधार पर जेल भेज दिया गया। सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता को लगभग 8 दिनों तक अवैध रूप से हिरासत में रखा गया, जो कानून और संविधान दोनों के विरुद्ध है।
किसे जिम्मेदार माना गया?
अदालत ने मामले में संबंधित तत्कालीन सहायक पुलिस आयुक्त (ACP) की भूमिका पर गंभीर टिप्पणी की। कोर्ट ने पीड़ित को ₹2 लाख मुआवजा देने का आदेश देते हुए स्पष्ट किया कि यह राशि संबंधित अधिकारी के वेतन से वसूली जाएगी। इसके साथ ही विभागीय कार्रवाई की संभावना भी जताई गई है।
फैसले में पूरे उत्तर प्रदेश के लिए कई महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश जारी किए गए हैं:
- शांति भंग की कार्रवाई में बाहरी जमानतदार की अनिवार्यता समाप्त।
- संबंधित व्यक्ति ₹20,000 के व्यक्तिगत बंधपत्र (Personal Bond) पर रिहा हो सकेगा।
- यदि कोई व्यक्ति बंधपत्र भरने से इनकार करता है, तो उसका ऑडियो-वीडियो रिकॉर्ड तैयार करना होगा।
- 24 घंटे से अधिक अवैध हिरासत की स्थिति में राज्य सरकार को ₹25,000 प्रतिदिन की दर से मुआवजा देना होगा।
- बाद में यह राशि दोषी अधिकारी के वेतन से वसूल की जा सकेगी।
- संबंधित अधिकारियों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई भी की जा सकती है।
BNSS की कौन-सी धाराएं हैं लागू?
BNSS धारा 126
यदि किसी व्यक्ति से शांति भंग होने या लोक शांति प्रभावित होने की आशंका हो, तो कार्यपालक मजिस्ट्रेट उससे शांति बनाए रखने के लिए बंधपत्र भरने का आदेश दे सकता है।
BNSS धारा 129
यह धारा धारा 126 के तहत शुरू की गई कार्यवाही की जांच और सुनवाई की प्रक्रिया निर्धारित करती है।
BNSS धारा 170
यदि पुलिस अधिकारी को यह विश्वास हो कि कोई व्यक्ति संज्ञेय अपराध करने वाला है और अपराध रोकने के लिए गिरफ्तारी आवश्यक है, तो बिना वारंट गिरफ्तारी की जा सकती है।
भारतीय न्यायपालिका पहले भी निवारक गिरफ्तारी और शांति भंग संबंधी धाराओं के उपयोग को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणियां कर चुकी है।
Madhu Limaye v. Sub-Divisional Magistrate (1970)
सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि सार्वजनिक शांति बनाए रखना आवश्यक है, लेकिन प्रशासनिक शक्तियों का प्रयोग नागरिक स्वतंत्रता के सम्मान के साथ होना चाहिए।
Joginder Kumar v. State of Uttar Pradesh (1994)
अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल गिरफ्तारी की शक्ति होना पर्याप्त नहीं है; गिरफ्तारी के लिए उचित कारण भी आवश्यक है।
Arnesh Kumar v. State of Bihar (2014)
सुप्रीम कोर्ट ने अनावश्यक गिरफ्तारियों पर चिंता जताते हुए कहा कि गिरफ्तारी अंतिम उपाय होनी चाहिए।
क्यों महत्वपूर्ण है यह फैसला?
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार यह निर्णय नागरिक अधिकारों, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और पुलिस जवाबदेही के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। फैसले का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि शांति व्यवस्था बनाए रखने के नाम पर किसी व्यक्ति के संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन न हो।
इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह फैसला उत्तर प्रदेश में ‘शांति भंग’ संबंधी कार्रवाई की प्रक्रिया को अधिक जवाबदेह और पारदर्शी बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। हालांकि प्रत्येक मामला अपने तथ्यों और परिस्थितियों पर निर्भर करेगा, लेकिन अदालत के निर्देश भविष्य में अवैध हिरासत और प्रक्रियात्मक त्रुटियों को रोकने में अहम भूमिका निभा सकते हैं। अब निगाहें इस बात पर रहेंगी कि संबंधित विभाग इन निर्देशों का पालन किस प्रकार सुनिश्चित करते हैं।



