KANPUR/ कानपुर के औद्योगिक इतिहास से जुड़ी प्रतिष्ठित ‘चांद छाप यूरिया’ फैक्ट्री एक बार फिर सुर्खियों में है। राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण (एनसीएलटी) से मंजूरी मिलने के बाद अदाणी ग्रुप ने कानपुर फर्टिलाइजर्स एंड केमिकल्स लिमिटेड (केएफसीएल) का नियंत्रण अपने हाथ में लेने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। इस घटनाक्रम से न केवल बंद पड़ी फैक्ट्री के दोबारा शुरू होने की उम्मीद जगी है बल्कि हजारों रोजगार और कानपुर के औद्योगिक पुनरुत्थान की संभावनाएं भी मजबूत हुई हैं। एनसीएलटी की स्वीकृति मिलने के बाद अदाणी समूह के तीन वरिष्ठ अधिकारी केएफसीएल परिसर पहुंचे और प्रशासनिक दस्तावेजों तथा महत्वपूर्ण फाइलों का परीक्षण शुरू किया। इसे अधिग्रहण प्रक्रिया का पहला बड़ा कदम माना जा रहा है। जानकारों का मानना है कि यदि अधिग्रहण प्रक्रिया पूरी हो जाती है तो कानपुर की यह ऐतिहासिक फैक्ट्री एक बार फिर उत्पादन शुरू कर सकती है। वर्तमान में प्लांट की उत्पादन क्षमता लगभग 22 हजार मीट्रिक टन उर्वरक प्रतिदिन बताई जाती है।
कानपुर फर्टिलाइजर्स एंड केमिकल्स लिमिटेड केवल एक उर्वरक फैक्ट्री नहीं बल्कि शहर की औद्योगिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा रही है। जब यह पूरी क्षमता के साथ संचालित हो रही थी, तब यहां 2400 से अधिक कर्मचारी कार्यरत थे। फैक्ट्री द्वारा निर्मित ‘चांद छाप यूरिया’ देश के प्रमुख उर्वरक ब्रांडों में गिना जाता था। किसानों के बीच इसकी अच्छी पहचान और विश्वसनीयता रही है। फैक्ट्री के पुनर्जीवित होने से प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से हजारों लोगों को रोजगार मिलने की संभावना है।
केएफसीएल के पास कानपुर में लगभग 243 एकड़ भूमि उपलब्ध है। यह जमीन रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है। विशेषज्ञों के अनुसार अदाणी समूह इस भूमि का उपयोग विश्वस्तरीय लॉजिस्टिक्स पार्क, वेयरहाउसिंग और भंडारण सुविधाओं के विकास के लिए कर सकता है। कानपुर की भौगोलिक स्थिति और परिवहन नेटवर्क को देखते हुए यह क्षेत्र उत्तर भारत का प्रमुख लॉजिस्टिक्स हब बन सकता है। केएफसीएल की सबसे बड़ी ताकत इसकी बुनियादी सुविधाएं हैं।
फैक्ट्री को ऊर्जा के लिए गैस आपूर्ति सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी गेल द्वारा की जाती रही है। उर्वरक उत्पादन में गैस सबसे महत्वपूर्ण कच्चे संसाधनों में से एक है। फैक्ट्री के समीप बहने वाली नहर से पानी की उपलब्धता सुनिश्चित होती है, जिससे उत्पादन प्रक्रिया को सुचारू रूप से संचालित किया जा सकता है। प्लांट परिसर में अपनी रेलवे लाइन भी मौजूद है। इससे कच्चे माल और तैयार उत्पादों का परिवहन आसान और कम खर्चीला हो जाता है। इन सभी सुविधाओं के कारण उद्योग विशेषज्ञ मानते हैं कि यह प्लांट दोबारा चालू होने की अच्छी संभावनाएं रखता है। सूत्रों के अनुसार अदाणी समूह ने वर्ष 2025 में इस प्लांट का निरीक्षण किया था। निरीक्षण के दौरान प्लांट की तकनीकी स्थिति, भूमि उपयोग और संभावित निवेश अवसरों का आकलन किया गया था। अब एनसीएलटी की मंजूरी मिलने के बाद अधिग्रहण प्रक्रिया तेजी से आगे बढ़ती दिखाई दे रही है।
जयप्रकाश एसोसिएट्स लिमिटेड और जेपी फर्टिलाइजर्स एंड इंडस्ट्रीज लिमिटेड की 100 प्रतिशत शेयरधारिता के अधिग्रहण को लेकर शेयर खरीद समझौता किया गया है। यही समझौता अदाणी समूह को केएफसीएल का नियंत्रण प्राप्त करने का कानूनी आधार प्रदान करता है।
इस प्रतिष्ठित उर्वरक इकाई की स्थापना वर्ष 1969 में इंडियन एक्सप्लोसिव लिमिटेड (IEL) के रूप में हुई थी। 1980 में इसका नाम इंपीरियल केमिकल इंडस्ट्रीज इंडिया (ICI) रखा गया। बाद में 1993 में गोयनका समूह ने डंकन कंपनी के नाम से इसका संचालन संभाला। बिजली आपूर्ति बाधित होने के कारण मार्च 2002 में उत्पादन बंद हो गया। बाद में समझौते के तहत उत्पादन फिर शुरू हुआ, लेकिन नेफ्था की कमी के कारण कुछ महीनों बाद दोबारा बंद हो गया। लगातार वित्तीय संकट और उत्पादन बाधाओं के चलते 2007 में इसे बीमार उद्योग घोषित कर दिया गया। 2010 में जेपी समूह के साथ समझौते के बाद 2013 में केएफसीएल नाम से उत्पादन दोबारा शुरू हुआ। लगभग एक दशक तक कंपनी अच्छा प्रदर्शन करती रही और लाभ भी कमाती रही। दिसंबर 2024 में गैस आपूर्ति को लेकर विवाद सामने आया। इसके बाद अप्रैल 2025 में उत्पादन पूरी तरह बंद कर दिया गया।
यदि अदाणी समूह इस परियोजना को सफलतापूर्वक पुनर्जीवित करता है तो इसका सीधा लाभ कानपुर और आसपास के क्षेत्रों को मिलेगा। स्थानीय स्तर पर रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे। ट्रांसपोर्ट, वेयरहाउसिंग, सप्लाई चेन और सहायक उद्योगों को भी बढ़ावा मिलेगा। इससे कानपुर की अर्थव्यवस्था को नई मजबूती मिल सकती है।
कभी कानपुर की औद्योगिक पहचान रही चांद छाप यूरिया फैक्ट्री के पुनर्जीवन की उम्मीद अब पहले से अधिक मजबूत दिखाई दे रही है। एनसीएलटी की मंजूरी और अदाणी समूह की सक्रियता ने बंद पड़े इस उद्योग में नई जान फूंक दी है। यदि योजनाएं सफल रहीं तो यह परियोजना न केवल हजारों रोजगार पैदा करेगी बल्कि कानपुर को एक बार फिर उत्तर भारत के प्रमुख औद्योगिक केंद्रों में स्थापित करने में अहम भूमिका निभा सकती है।



