– ममता बनर्जी की याचिका पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से अंतिम फैसला लेने की वास्तविक समयसीमा बताने को कहा; दोनों पक्षों को सबूत रखने का उचित मौका देने के साथ सुनवाई लंबी न खिंचने पर जोर, अगली सुनवाई 28 सितंबर को
भारत 19
नई दिल्ली। तृणमूल कांग्रेस (TMC) के नाम और चुनाव निशान को लेकर चल रहे विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को चुनाव आयोग से पूछा कि वह दोनों गुटों के दावों पर अंतिम फैसला कितने समय में कर सकता है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने आयोग से ऐसी वास्तविक समयसीमा बताने को कहा, जिसमें दोनों पक्षों को अपना पक्ष और सबूत रखने का पर्याप्त अवसर मिले, लेकिन मामला अनावश्यक रूप से लंबा भी न खिंचे।
ममता बनर्जी ने चुनाव आयोग के उस अंतरिम आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है, जिसके तहत आयोग ने ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस नाम और ‘फूल-घास’ चुनाव निशान को फिलहाल फ्रीज कर दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने इस स्तर पर चुनाव प्रक्रिया पर रोक लगाने के बजाय विवाद के अंतिम निपटारे की समयसीमा पर आयोग से जवाब मांगा है। मामले की अगली सुनवाई 28 सितंबर को होगी।
आयोग बताएगा अंतिम फैसला कब तक संभव
सीजेआई सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने चुनाव आयोग की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता डीएस नायडू से अंतिम निर्णय की समयसीमा बताने को कहा। अदालत का जोर इस बात पर रहा कि दोनों पक्षों को निष्पक्ष अवसर मिलना चाहिए, लेकिन विवाद को अनिश्चितकाल तक लंबित नहीं रखा जा सकता। अदालत ने आयोग से ऐसी समयसीमा बताने को कहा है जो व्यावहारिक और संतुलित हो। यानी आयोग को दोनों पक्षों के साक्ष्य और दावों की जांच के लिए पर्याप्त समय मिले, लेकिन प्रक्रिया अनावश्यक रूप से आगे न खिंचे।
सिब्बल बोले, चुनाव के बीच आया अंतरिम आदेश
ममता बनर्जी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने आयोग के अंतरिम आदेश पर सवाल उठाते हुए कहा कि मामला लंबे समय तक लंबित रहने के बाद चुनाव प्रक्रिया के बीच ऐसा आदेश आया। उनका तर्क था कि इससे उनकी ओर से तत्काल प्रभावी कानूनी उपाय तलाशने की स्थिति मुश्किल हो गई। हालांकि सिब्बल ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि वह 6 अक्टूबर को होने वाले उपचुनाव पर रोक की मांग नहीं कर रहे हैं। उनकी मांग विवाद की शीघ्र सुनवाई और आयोग से अंतिम निर्णय कराने पर केंद्रित रही।
सुप्रीम कोर्ट ने आयोग के अंतरिम आदेश पर क्या कहा
सुनवाई के दौरान पीठ ने यह भी संकेत दिया कि आयोग के पास दोनों गुटों के आमने-सामने दावे की स्थिति में अंतरिम व्यवस्था करने का अधिकार है या नहीं, इस पहलू को भी देखा जाना होगा। अदालत ने फिलहाल अंतरिम आदेश को सही या गलत ठहराने के बजाय अंतिम निर्णय की प्रक्रिया और समयसीमा पर ध्यान केंद्रित किया।
दोनों गुटों को मिले अलग नाम और निशान
17 सितंबर के अंतरिम आदेश में आयोग ने दोनों गुटों को मूल ‘ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ नाम और ‘फूल-घास’ निशान के इस्तेमाल से रोक दिया था। इसके बाद उपचुनाव के लिए वैकल्पिक नाम और निशान आवंटित किए गए। ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट को ‘ममता ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ और ‘फुटबॉल खिलाड़ी’ निशान दिया गया, जबकि दूसरे गुट को ‘डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस’ और ‘लिफाफा’ निशान आवंटित किया गया। यह व्यवस्था फिलहाल आगामी उपचुनावों के लिए अंतरिम है। मूल पार्टी नाम और आरक्षित चुनाव निशान पर अंतिम अधिकार का फैसला अलग से होना है। विवाद का निर्धारण चुनाव चिह्न (आरक्षण एवं आवंटन) आदेश, 1968 के पैराग्राफ 15 के तहत किया जाना है।
6 अक्टूबर के उपचुनाव से पहले बढ़ा महत्व
यह विवाद पश्चिम बंगाल की नंदीग्राम और रेजीनगर विधानसभा सीटों पर 6 अक्टूबर को प्रस्तावित उपचुनाव से पहले सामने आया है। इसी वजह से नाम और निशान को लेकर आयोग की अंतरिम व्यवस्था का तत्काल चुनावी प्रभाव पड़ा है। अब 28 सितंबर की सुनवाई में चुनाव आयोग को यह बताना होगा कि वह दोनों गुटों के दावों पर अंतिम निर्णय के लिए कितना समय चाहता है। सुप्रीम कोर्ट का आज का आदेश मूल नाम या निशान पर किसी गुट के पक्ष में अंतिम फैसला नहीं है; फिलहाल अदालत ने प्रक्रिया को समयबद्ध करने की दिशा में आयोग से जवाब मांगा है।


