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इंस्टाग्राम का एल्गोरिद्म बदल रहा है हमारा ड्रेसिंग सेंस

  • रील्स, इन्फ्लुएंसर और तेजी से बदलते फैशन ट्रेंड के बीच सवाल—हम अपनी पसंद पहन रहे हैं या स्क्रीन की पसंद?

कानपुर। सुबह अलमारी खोलने से पहले अगर आप मोबाइल खोलते हैं और कुछ मिनट इंस्टाग्राम पर बिताते हैं, तो संभव है कि आज क्या पहनना है, इसका एक विचार वहीं मिल जाए। किसी की रील में नई शर्ट, किसी वीडियो में जींस के साथ नया अंदाज, तो कहीं शादी या पार्टी के लिए तैयार पहनावे के सुझाव। कपड़े चुनने का तरीका बदल रहा है। पहले फैशन की प्रेरणा परिवार, दोस्तों, फिल्मों, पत्रिकाओं और बाजार से मिलती थी। अब मोबाइल की स्क्रीन दिन-रात नए पहनावे सामने रख रही है। यहीं से सवाल उठता है, इंस्टाग्राम सिर्फ फैशन दिखा रहा है या धीरे-धीरे हमारा ड्रेसिंग सेंस भी बदल रहा है।

इंस्टाग्राम का एल्गोरिद्म हमारी ऑनलाइन गतिविधियों के आधार पर काम करता है। जिस तरह की रील्स हम देखते हैं, जिन पोस्ट पर रुकते हैं, जिन्हें लाइक या सेव करते हैं, वैसा ही कंटेंट फीड में बढ़ने लगता है। मान लीजिए आपने चौड़ी पैंट या किसी खास तरह के कुर्ते से जुड़ी कुछ रील्स देखीं। कुछ ही समय बाद आपकी स्क्रीन पर वैसी ही और तस्वीरें, वीडियो और पहनावे के सुझाव आने लगेंगे। यह एक साधारण प्रक्रिया है, लेकिन इसका असर दिलचस्प है। कोई स्टाइल पहले अनजान लगती है, फिर बार-बार दिखाई देती है, परिचित बनती है और कभी-कभी पसंद भी। यानी हम अपनी रुचि का संकेत एल्गोरिद्म को देते हैं, लेकिन एल्गोरिद्म उसी रुचि को लगातार मजबूत करता रहता है।

एक ट्रेंड, हजारों अलमारियां

आज कॉलेज, कैफे, मॉल या किसी आयोजन में कई युवाओं के पहनावे में समानता दिखना आम होता जा रहा है। किसी दौर में ढीली शर्ट और चौड़ी पैंट, तो किसी समय एक जैसे मेल खाते परिधान या खास तरह के जूते और आभूषण अचानक हर जगह दिखाई देने लगते हैं। इसकी एक वजह फैशन ट्रेंड के फैलने की बदली रफ्तार है। पहले कोई स्टाइल बाजार तक पहुंचने और लोकप्रिय होने में महीनों लेती थी। अब एक रील कुछ ही समय में लाखों लोगों तक पहुंच सकती है। नतीजा यह है कि फैशन का जीवन भी छोटा होता जा रहा है। एक चलन लोकप्रिय होता है और उसके पूरी तरह अपनाए जाने से पहले दूसरा सामने आ जाता है।

इन्फ्लुएंसर बन गए नई पीढ़ी के स्टाइल गाइड

गेट रेडी विद मी, आज का पहनावा और एक ही कपड़े को अलग-अलग तरीके से पहनने वाले वीडियो ने फैशन को व्यक्तिगत अनुभव जैसा बना दिया है। अब फैशन सिर्फ मॉडल या फिल्मी सितारे नहीं दिखाते। एक इन्फ्लुएंसर अपने कमरे से वीडियो बनाकर यह बता सकता है कि दफ्तर, कॉलेज, पार्टी या शादी में क्या पहना जा सकता है। यही वजह है कि फैशन की खोज और खरीदारी का फासला भी घट गया है। एक रील में पहनावा पसंद आया, ब्रांड या उत्पाद की जानकारी मिली और खरीदारी की प्रक्रिया शुरू हो गई।

अब कपड़े सिर्फ पहनने के लिए नहीं चुने जाते

सोशल मीडिया ने पहनावे में एक नया सवाल जोड़ दिया है कि यह कैमरे पर कैसा दिखेगा? आरामदायक कपड़ा रोजमर्रा की जिंदगी के लिए बेहतर हो सकता है, लेकिन जरूरी नहीं कि वह तस्वीर या वीडियो में उतना प्रभावशाली लगे। दूसरी ओर, कुछ पहनावे वास्तविक जीवन से ज्यादा कैमरे के लिए बनाए हुए लगते हैं। यहीं से फैशन निजी पसंद के साथ डिजिटल छवि का हिस्सा भी बन गया है। कपड़ा शरीर पर कैसा दिखता है, इसके साथ यह भी मायने रखने लगा है कि वह स्क्रीन पर कैसा नजर आएगा।

असली पसंद और स्क्रीन की पसंद में फर्क

यह कहना गलत होगा कि इंस्टाग्राम तय कर रहा है कि हर व्यक्ति क्या पहनेगा। सोशल मीडिया ने फैशन के विकल्प बढ़ाए भी हैं। छोटे शहरों में बैठा कोई युवा भी दुनिया भर के नए स्टाइल देख सकता है और अपनी पसंद के अनुसार उन्हें अपना सकता है। लेकिन लगातार एक जैसे कंटेंट के बीच एक चुनौती जरूर पैदा होती है। क्या हमें कोई स्टाइल वास्तव में पसंद है, या वह सिर्फ इसलिए अच्छी लगने लगी है क्योंकि पिछले कई दिनों से हमारी स्क्रीन पर वही दिखाई जा रही है?

शायद यही आज के फैशन का सबसे बड़ा सवाल है।

इंस्टाग्राम हमें नए कपड़े, नए रंग और नए अंदाज दिखा सकता है। एल्गोरिद्म हमारी रुचि पहचान कर उसे और मजबूत कर सकता है। लेकिन व्यक्तिगत स्टाइल की असली पहचान तभी बची रहेगी, जब ट्रेंड को अपनाने से पहले हम यह तय करें कि वह स्क्रीन की पसंद है या सचमुच हमारी अपनी।

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